अंबेडकर के बहाने स्वहित साधने का प्रयास

बीते दिनों राष्ट्रीय शैक्षिक,अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के राजनीतिक विज्ञान के पुस्तक में डा.भीमराव अम्बेडकर व पं.जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति वाले एक कार्टून के प्रकाशन ने बवाल मचा दिया। अचानक से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आए इस कार्टून की सभी सियासी दलों द्वारा जमकर निंदा की गयी। सदन में जोरदार हंगामा किया गया और पुस्तक में कार्टून शामिल करने के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ गुस्से का प्रदर्शन किया गया। यहां तक कि उनके कार्यालय में तोड़फोड़ भी की गई। मजे की बात यह है कि विरोध करने वालों में वे राजनैतिक दल भी सक्रिय तौर पर शामिल रहें जिन्होंने इससे पहले अंबेडकर से जुड़े किसी भी मुद्दे पर इतनी एकजुटता कभी प्रदर्शित नहीं की। उधर, आनन फानन में मानव संसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने न केवल कार्टून पर आधिकारिक तौर पर खेद जताया बल्कि उसे पाठ्यपुस्तक से हटाने की भी घोषणा कर दी।

इस कार्टून ने संविधान निर्माता डा.अंबेडकर के समर्थकों को कितनी ठेस पहुंचाई इस बात का तो पता नहीं लेकिन इस कार्टून की आड़ में विगत लगभग एक वर्ष से ऐसे हमलों को झेल रहे नेताओं और सियासतदारों को अपने मन की भड़ास निकालने का मौका अवश्य मिल गया। दरअसल,पिछले एक साल के दरम्यान पहले रामदेव व फिर अन्ना हजारे के आंदोलनों में सियासतदारों पर कटाक्ष करते कार्टूनों की भरमार लग गई थी। सोशल मीडिया के मजबूती से उभरने के बाद तो लोगों को जैसे नेताओं पर अपना गुस्सा उतारने का मंच ही मिल गया। आए दिन किसी न किसी राजनेता विशेषकर सत्तापक्ष के नेताओं के एक से बढ़कर एक कार्टून फेसबुक,ट्वीटर आदि पर अवतरित होने लगे। लंबे समय से इसकी काट ढूंढने में जुटे राजनेताओं को अंबेडकर के कार्टून ने एक बढ़िया मौका उपलब्ध करा दिया। पहले से ही सोशल मीडिया पर लगाम कसने का मौका तलाशने व गाहे बगाहे इस संबंध में बयान देने वालों को जैसे मनचाही मुराद मिल गई। इंटरनेट के नियमन व यूजरों पर नकेल कसने की तैयारी की जाने लगी। इसी के साथ राजनैतिक दलों द्वारा सभी प्रकार के कार्टूनों को पुस्तकों से निकालने की मांग कर दी गई। इसके पूर्व प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा एक कार्टूनिस्ट को जेल भेज कार्टून बनाने वालों के खिलाफ दमनकारी नीतियों की आधिकारिक शुरुआत की जा चुकी थी। लेकिन ममता के कदम की चहूंओर हो रही आलोचनाओं को देख किसी ने उस समय इसका समर्थन नहीं किया। कार्टून का विरोध करने वालों के पास शायद ही इस बात का जवाब होगा कि गत पांच वर्षों से पाठ्यपुस्तक में शामिल इस कार्टून पर अचानक ही गुस्सा क्यों फूटा?

एक कारण,डा.अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान के साठ वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में शायद कार्टून के बहाने ही सही बाबा साहेब के प्रति कृतज्ञ देशवासियों व समर्थकों को एकजुट कर वोट बैंक में परिवर्तित करना ही हो सकता है। अन्यथा संविधान निर्माता के समर्थकों द्वारा उसी संविधान में देश वासियों को प्रदत्त वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन किए जाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। कार्टून का विरोध कर रहे लोगों में से शायद कुछेक गिने चुने लोगों को ही पता होगा कि कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा जब इस कार्टून की रचना की गई थी तब नेहरू व अंबेडकर दोनों जीवित थे और न तो दोनों में से किसी ने इसपर आपत्ति जताई और ना ही उनके समर्थकों ने। वह भी तब जबकि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा जैसे अधिकार की बात उस समय तक महज कोरी कल्पना ही थी। इस तरह यह समझना अत्यंत कठिन है कि जो चीज,जिस व्यक्ति के लिए बनाई गई और उसे ही आपत्तिजनक नहीं लगी तो फिर उसके समर्थकों को कैसे लग सकती है। तो क्या लोकतंत्र के पुरोधा के समर्थक तानाशाही हो गए हैं,क्योंकि स्वयं बाबा साहेब के शब्दों में ही 'राजनीति में व्यक्ति-पूजा पतनशीलता और तानाशाही प्रवृत्तियों की ओर जाने का सुनिश्चित मार्ग है।'अब यह देश की जनता और संविधान के पहरुओं पर निर्भर करता है कि वे लोकतंत्र के हिमायती हैं या तानाशाही के समर्थक। हालांकि हाल फिलहाल की घटनाएं तो जनता की,जनता द्वारा,जनता के लिए चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार के तानाशाही रवैये को ही प्रदर्शित करती है।

- अविनाश चंद्र