ब्लाग ही वैकल्पिक मीडिया है

देश में लगभग 6 करोड़ लोग हैं जो नियमित इंटरनेट का उपयोग करते हैं. देश की कुल जनसंख्या के लिहाज से यह संख्या कुछ खास नहीं है लेकिन संसाधनों की उपलब्धता को देखें तो यह संख्या कम भी नहीं है. छह करोड़ लोगों की इस संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी भी हो रही है. ऐसे समय में ब्लॉग का जन्म और प्रसार वैकल्पिक मीडिया की तलाश में लगे लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.

कुछ लोगों की मेहनत, समझ और सूझबूझ का परिणाम है कि यह तकनीकी रूप से लगातार और अधिक सक्षम और कारगर होता जा रहा है.

एक बात पक्की है कि जिस वैकल्पिक मीडिया की बात हम लोग करते आ रहे थे वह यही है. जहां अभिव्यक्ति की इतनी अधिक स्वतंत्रता है कि आप गाली-गलौज भी कर सकते हैं. लेकिन क्या हमें इस स्वतंत्रता का दुरूपयोग करना चाहिए या फिर सचमुच हमारे पास हिन्दी में लिखने के लिए कुछ ऐसा है ही नहीं जो समूह के हित के लिए हम लिख सकें? आमतौर पर हम इस माध्यम को अपनी कला, हुनर, बुद्धि, भड़ास आदि निकालने के लिए कर रहे हैं. पितामह ब्लागरों से लेकर नये-नवेले ब्लागरों तक एक बात साफ तौर पर दिखती है कि शुरूआत जहां से होती है वहां से सीढ़ी उत्थान की ओर नहीं पतन की ओर घूम जाती है. यह अनर्थकारी है.

ब्लाग की दुनिया में कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अव्वल तो हम सूचना के बारे में जानते ही नहीं है. जिन सूचनाओं से हम अपनी विद्वता का सबूत देते हैं वे मूलतः टीवी, अखबार और इंटरनेट की जूठन होती है. यानी हम भी उसी खेल के हिस्से होकर रह जाते हैं जिनके आतंक से बाहर आने के लिए हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे भारी-भरकम शब्दों की माला जपते हैं. देश के कुछ अखबार और टीवी चैनल खबरों की परिभाषा बदलने में लगे हुए हैं. यह उनकी समझ और मजबूरी हो सकती है, हमारे सामने क्या मजबूरी है? कोई मजबूरी नहीं दिखती. यह तो शुद्धरूप से हमारी समझ है कि हम इस वैकल्पिक मीडिया का क्या उपयोग कर रहे हैं.

हिंदी ब्लाग दुनिया खंगालने के बाद कुछ ब्लाग ऐसे दिखते हैं जिनमें काम की जानकारी होती है. ज्यादातर अपनी भड़ास निकालते हैं. गुस्सा है तो जरूर निकालिए. लेकिन उसको कोई तार्किक रूप दीजिए. उसका कोई आधार बनाईये. आप गुस्सा हैं इसमें दो राय नहीं लेकिन आपके गुस्से से मैं भला क्यों गुस्सा हो जाऊं? लिखनेवाले वाले का धर्म है कि वह अपने गुस्से को पी जाए. वह गुस्सा उसके लिखने में ऐसे उतर आये कि पढ़ने वाले की भौंहे तन जाए. इसके साथ ही एक काम और करना चाहिए. अपने आस-पास ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिन्हें ब्लाग का रास्ता दिखाया जा सकता है. मैं इस दुनिया में कुछ ही महीने पुराना हूं. मैंने अब तक चार लोगों को ब्लाग बनाने और चलाने के लिए प्रेरित किया है और वे चारों आज ब्लाग की दुनिया में शामिल हो चुके हैं. मुझे लगता है कि अगर हम ऐसे दो-चार लोगों को जोड़ सकें जो आगे भी दो-चार लोगों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं तो परिणाम आशातीत आयेंगे. आप बताईये अपने-आप को कौन अभिव्यक्त नहीं करना चाहेगा. शुरूआत में कुछ ब्लागर मित्रों ने मुझे प्रोत्साहित न किया होता, मेरी तकनीकी तौर पर मदद न की होती तो मैं भी जैसे घूमते-फिरते यहां पहुंचा था वैसे ही टहलते-घूमते बाहर चला जाता. उन्हीं मित्रों के सहयोग का परिणाम है कि मैं यहां टिक गया और ब्लाग में मुझे वैकल्पिक मीडिया नजर आने लगा है.

टीवी ने खबरों के साथ जैसा मजाक किया है उससे खबर की परिभाषा पर ही सवाल खड़ा हो गया है. मैं कहीं से यह मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि टीवी और पत्रकारिता का कोई संबंध है. हमें किसी से ज्यादा गहराई की उम्मीद नहीं करनी चाहिए लेकिन यह भी नहीं हो सकता कि कोई इतना हल्का हो जाए कि उसके होने-न-होने का मतलब ही समाप्त हो जाए. टीवी चैनल  खेलते हैं टीआरपी के लिए. यह टीआरपी जो संस्थाएं तय करती हैं वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टीवी चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.

ब्लागर इसमें हस्तक्षेप कर सकते हैं. खबर की परिभाषा ठीक बनाए रखना है तो हमें यह करना भी चाहिए. नहीं तो कल जब ब्लागरों की दुनिया इतनी बड़ी हो जाएगी कि इसका ओर-छोर नहीं होगा तब यह कमी दंश के रूप में चुभेगी कि काश उस समय सोच लिया होता, दुर्भाग्य से तब हम समय के बहुत आगे निकल चुके होंगे. हमारी समझ ब्लागजगत का सीमांकन कर चुका होगा और हम खुद को ही छला हुआ महसूस करेंगे.

-संजय तिवारी