रास्ता बीच से होकर जाता है

मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत के बाद बवंडर सा मचा हुआ है। इंश्योरेंस सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत होने पर अलग बवाल है। दो एकदम विपरीत ध्रुवों की राय सामने आ रही है। सरकारी पक्ष कह रहा है कि विदेशी निवेश आने से रोजगार बढ़ जायेगा, उपभोक्ताओं का भला होगा। कोल्ड स्टोरेज बनेंगे। फल अन्न की बरबादी रुकेगी। सरकार विरोधी पक्ष का कहना है कि भारत तबाह हो जायेगा, रोजगार खत्म हो जायेंगे। उपभोक्ता लुट जायेंगे। दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोण हैं, रास्ता कहीं बीच से होकर जाता है।

ये आर्थिक मसले हैं, इन पर तथ्य हमारे सामने हैं, इन पर तथ्यपरक तरीके से विचार होना चाहिए। जो भी भारतीय अर्थव्यवस्था के हित में हो, वो होना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था के हित इसमें हैं, कि अर्थव्यवस्था के संसाधनों के इस्तेमाल अधिकतम कुशलता के साथ हों। जो अधिकतम कुशलता के साथ संसाधनों का इस्तेमाल करेगा, वही अंत में सफल होगा। अर्थव्यवस्था यहां किसी का रोजगार बचाने के लिए नहीं है। श्रेष्ठ सेवा या वस्तु का निर्माण जो करेगा, वही अंत में उपभोक्ता के लिए बेहतर हो पायेगा। विदेशी और देशी पूंजी से बड़ा सवाल यह है कि कौन बेहतर परिणाम दे रहा है। मसला देशी बनाम विदेशी का भी नहीं है। मसला बेहतर काम का है, जो करेगा, वह बचेगा। नोकिया फिनलैंड की कंपनी है, विदेशी कंपनी है, पर इसे दूसरी विदेशी कोरियन कंपनी सैमसंग पीट रही है हैंडसेट मार्केट में। भारतीय उपभोक्ता धुआंधार सैमसंग के हैंडसेट खरीद रहे हैं, क्योंकि ये नोकिया से बेहतर उत्पाद सस्ते भावों पर पेश कर रही है। देशी विदेशी का मसला नहीं है, मसला है कि कौन बढ़िया माल सस्ते भावों पर दे पा रहा है।

रिटेल में विदेशी कंपनियों जैसे वालमार्ट के आते ही भारतीय कारोबारी पिट जायेंगे, स्थानीय कारोबारियों की दुकानें बंद हो जायेंगी, ये आशंकाएं ऐसा मानकर चलती हैं कि स्थानीय कारोबारी अक्षम, लाचार, निकम्मे टाइप के लोग हैं, जो कारोबार करना नहीं जानते हैं। अब तक नतीजे ये बताते हैं कि भारत में पहले से ही बड़े रिटेलर मौजूद हैं बिग बाजार, रिलायंस फ्रेश, बिरला के मोर स्टोर्स, इनकी हालत बहुत अच्छी हो, ऐसा दिखायी नहीं पड़ता। इनकी वजह से एक भी छोटी रिटेल की दुकान की बंद हुई हो, ऐसा भी दिखायी नहीं पड़ता। आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि रिलायंस फ्रेश को हाल में 247 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। भारती का रिटेल कारोबार 266 करोड़ रुपये का घाटा दिखा रहा है। आदित्य बिरला के मोर स्टोर्स का घाटा 423 करोड़ रुपये का है। बिग बाजार गले तक कर्ज में डूबा हुआ है।

यादों पर जरा सा जोर डालें, तो याद आयेगा कि कुछ समय पहले एक और बड़ा रिटेलर हुआ करता था-सुभिक्षा। इसके सैकड़ों स्टोर हुआ करते थे, ये बंद हो गये। सिर्फ बड़े भर हो जाने से बाजार में चलने की गारंटी नहीं हो जाती। इसके उलट एक भी छोटा कारोबारी घाटे में दुकान चलाता हुआ नहीं दिखता है। वालमार्ट ऐसी कौन सी तोप चला पायेगी, जो रिलायंस फ्रेश या बिग बाजार ने नहीं चलायी। और अगर वालमार्ट कुछ एकदम सस्ता उपभोक्ताओं को दे पाने में समर्थ होती है, तो फिर यह उपभोक्ताओं के लिए अच्छा है। छोटे कारोबारियों को फिर उस का मुकाबला करने के लिए सोचना पड़ेगा। मसला यह है कि मुकाबले, प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ता का भी भला है, अर्थव्यवस्था का भी भला है। देशी विदेशी मुकाबले से डर ही लगा होता, तो टेलीकाम बाजार में विदेशी वोडाफोन कंपनी ना होती, एमटीएनल और बीएसएनएल से ही कस्टमर परेशान हो रहे होते। प्रोफेसर अरविंद पंगारिया इस संबंध में अपनी बात एक रोचक उदाहरण से रखते हैं। वह कहते हैं कि सचिन तेंदुलकर आज सचिन तेंदुलकर इसलिए हैं कि हर बालर को, विश्व के किसी भी बालर को, किसी भी पिच पर खेलने की सामर्थ्य उनकी विकसित इसलिए हुई कि वह हर बालर के खिलाफ, हर पिच पर खेले। खुद को तैयार किया, खुद को मजबूत किया। वह अगर तय कर लेते कि सिर्फ भारतीय बालरों के साथ खेलेंगे। विदेशियों से मुकाबला ना करेंगे, तो वह चाहे कुछ भी होते, आज के सचिन तेंदुलकर ना होते।

अर्थव्यवस्था बचने बचाने का गेम नही है। मुकाबले करके सामर्थ्य बढ़ाने का मैदान है। अर्थव्यवस्थाएं सदिच्छाओं से नहीं चलतीं, कुछ ठोस कारकों से चलती हैं। जनवरी, 1956 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में भाषण करते हुए कहा था कि जहां तक मैं कल्पना करता हूं भविष्य में सचमुच बड़े बड़े उद्योग संपूर्ण रुप से सरकारी स्वामित्व में आ जायेंगे। निचले दर्जे के और छोटे उद्योग सहकारी प्रणाली पर चलेंगे। नेहरु विजनरी नेता थे, पर पूरे सम्मान के साथ कहना पड़ेगा कि वह गलत साबित हुए। बड़े बड़े उद्योग सरकारी स्वामित्व से दूर गये। निजी क्षेत्र का वर्चस्व बढ़ा। निजी क्षेत्र देशी या विदेशी, दोनों को चुनौती मिली तो सहकारिता क्षेत्र से, वह भी हर जगह नहीं। बिहार में सहकारिता का मतलब माफिया हो गया, गुजरात में सहकारिता का मतलब अमूल की सफलता हो गया।

अमेरिकी कंपनी वालमार्ट का मुकाबला भावुक बयानों और स्वदेशी समर्थन के भाषणों से नहीं किया जा सकता। इस देश ने स्वदेशी के नाम पर बहुत छद्म देखा है। इस मुल्क में एक कारोबारी हैं रमेश चौहान। चौहान साहब एक जमाने में थम्स अप जैसे सुपर ब्रांड के मालिक थे। यह पेप्सी के भारत आगमन का बहुत विरोध करते थे। स्वदेशी की अवधारणा के गहरे पैरोकार होते थे चौहान साहब। एक दिन पता लगा कि चौहान साहब ने अपना थम्स अप दूसरी बहुराष्ट्रीय कंपनी कोका कोला को बेच दिया। ये कारोबार था। वालमार्ट का मुकाबला बाबा रामदेव करें अपने बेहतर उत्पादों से, या कोई और सहकारिता संगठन करे अपने बेहतर उत्पादों से। पर उपभोक्ताओं को चुनने में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जो बेहतर सामान और सेवा दे, वह बाजार में रहेगा। दिखावे के लिए अमेरिका के नाम से भी बिदकने वाला चीन इस बात को बहुत पहले समझ चुका है। चीन में पहला वालमार्ट स्टोर 1996 में खुला था। अभी चीन में वालमार्ट की करीब 370 इकाइयां हैं। करीब एक लाख से ज्यादा नौकरियां चीन में वालमार्ट ने पैदा की हैं।

वालमार्ट निश्चय ही भारत में मुनाफा कमाने के लिए आ रही है, ठीक वैसे जैसे भारतीय कंपनियां टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज या इनफोसिस अमेरिका में मुनाफा कमाने जाती हैं। हर देश के कानून के हिसाब से ही हर कंपनी को कारोबार करना होता है। कानून में लोचा-पेंच हैं, तो उनका फायदा रिलायंस भी उठायेगी और वालमार्ट भी। पर कुल मिलाकर ये नहीं समझना चाहिए कि मल्टीब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत एफडीआई की घोषणा भर से तमाम विदेशी कंपनियां भारत में आ जायेंगी। ऐसा नहीं हुआ है कि तमाम विदेशी रिटेल कंपनियों ने भारत आने की धड़ाधड़ घोषणाएं कर दी हैं। बिजनेस है, बिजनेस की तरह से होगा। किसी विदेशी कंपनी को भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास करने की नहीं पड़ी है। वह तो अपनी कुशलता से ही होगा। पर फिजूल में विदेशी निवेश, विदेशी कंपनियों से डरना भी एक आत्मविश्वासी अर्थव्यवस्था को शोभा नहीं देता।

डा. आलोक पुराणिक (लेखक दिल्ली विश्विद्यालय में अध्यापनरत हैं और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
साभारः हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सहारा 

आलोक पुराणिक