आकाश टेबलेट में जनता के पैसे डुबोने से बेहतर है छात्रों को वाउचर दिए जाएं

राजनीतिज्ञ औद्योगिक क्षेत्र के विजेता उत्पादों को चुनना और उन्हें ,सब्सिडी देना पसंद करते हैं । भ्रष्ट राजनीतिज्ञ विजेताओं की मदद करने के लिए उनसे रिश्वत लेते हैं। लेकिन बुद्धिमान और ईमानदार राजनीतिज्ञों को विश्वास होता है कि किउन्होंने वह दिमाग और नजरिया पाया है जो बाजार से आगे जाकर सोच सकते है।

शिक्षा और सूचना तकनीक मंत्रालय के मंत्री कपिल सिब्बल बुद्धिमान और ईनामदार हैं ।इसलिए बार-बार नाकाम होने के बावजूद वे इस या उस शैक्षणिक खिलौने को बढ़ावा देकर लोगों को चुंधियाने का मोह रोक नहीं पाते।

हाल ही में उन्होंने घोषणा की कि जुलाई में बेहद सस्ती टेबलेट आकाश -2 को लांच किया जाएगा। लेकिन इसका जोरदार स्वागत नहीं हुआ ? कारण यह है कि आकाश पहले भी एक बार नाकाम साबित हो चुका है।पिछले अक्तूबर में सिबल ने  सैकंडरी कक्षाओं के छात्रों के लिए आकाश का पहला संस्करण जारी करके विश्वस्तर पर सुर्खियां बटोरीं थीं।

उसका कांट्रैक्ट डाटाविंड को गया था। जिसे 46 डालर प्रति टैबलेट के हिसाब से सप्लाई करनी थी। इसमें सरकार 11 डालर की सब्सिडी देनेवाली थी इसलिए छात्रों को केवल 35 डालर में मिल रही थी। सिबल तब गर्व के साथ दावा कर रहे थे कि इस तरह लोगों तक सस्ते में कंप्यूटर पहुंच जाएगा।

गरीब लोग कीमतों का बहुत खयाल रखते हैं। लेकिन किसी चीज का सस्ता होना उसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं है।टाटा की नैनों कार को एक लाख की कार के तौर पर प्रचारित किया गया लेकिन वह फ्लाप रही। उपभोक्ता चाहता है कि केवल सस्ता होना काफी नहीं  उसके पैसे का उसे मूल्य मिले लेकिन नैनो के साथ ऐसा नहीं था।

आइए इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के युग में चलते हैं। सरकार ने बेहद सस्ते जनता कपड़े और साबुन के उत्पादन के लिए सब्सिडी देना शुरू किया था। लेकिन उनकी क्वालिटी अच्छी नहीं थी इसलिए दोनों योजनाएं फ्लाप रहीं।

राजनीतिज्ञ चाहते थे कि कंप्यूटर आम लोगों तक पहुंचे इसलिए सरकार ने 2004 में हाथ में पकड़े जा सकनेवाले कंप्यूटर सिंप्यूटर को प्रोत्साहन देना शुरू किया। उसकी कीमत उस समय के हिसाब से बहुत कम 240 डालर रखी गई थी। सरकार को उम्मीद थी कि कम से कम 50000 कंप्यूटर तो बिकेंगे लेकिन उन कंप्यूटरों को कोई खरीदार नहीं मिला।

इसके बाद 2005 में सरकार ने कम दाम के दूसरे क्प्यूटर मोबिलिस को बढ़ावा देना शुरू किया जिसकी कीमत 200 डालर रखी गई थी।उसे भी कपिल सिबल ने ही लांच किया था जो उस समय विज्ञान और तकनीकी मंत्री थे। उन्होंने घोषणा की थी कि भारत ने पीसी तकनीक के भविष्य में छलांग लगा दी है। लेकिन किसी को पता नहीं कि मोबिलिस पता नहीं कहां गायब हो गया।

क्यों ? ये उत्पाद बहुत सस्ते थे लेकिन उन पर खर्च पैसे का मूल्य ग्राहक को नहीं मिलता।तकनीक लगातार बदल रही है और बेहतर दामों में बेहतर कंप्यूटर मिल रहे  हैं ।जबकि जिस उत्पाद को राजनीतिज्ञ चुनते है और उसके लिए सब्सिडी देते हैं वह पहले ही जल्दी ही  पुराना पड़ जाता है।

केवल सिबल ही नहीं कई नेताओं ने 100 डालर में सस्ता लैपटाप देने का सपना देखा। अब एपल आईपैड ले आया है उसके सामने लैपटाप अचानक खर्चीला और पुराना लगता है।इसलिए सरकार ने अपना फोकस सस्ते लैपटाप से हटाकर बहुत सस्ते टेबलेट पर कर लिया है। इससे आकाश का जन्म हुआ।

सिबल ने डाटाविंड कंपनी को 10000 लैपटाप का आर्डर देकर सुरूआत की। इस बीच डाटाविंड ने आकाश का 60 डालर में व्यापारिक संस्करण निकाला  और दस लाख से ज्यादा ग्राहकों ने उसकी बुकिंग कराई।

लेकिन परीक्षण के दौरान यह बात सामने आई कि क्वालिटी में गड़बड़ है। इसके बाद सिबल ने आकाश को तिलांजलि देकर उसके बेहतर संस्करण आकाश 2 को अपनाया। पूर्व विज्ञान सलाहकार अशोक पार्थसारथी कहते हैं कि इस प्रक्रिया में न जाने कितना पैसा बर्बाद हो गया  और पता नहीं कुछ हफ्तों बाद निर्माण के बाद नया डिजाइन किस रूप में सामने आएगा।

पहली टेबलेट में बुरी तरह से नाकाम होने के बाद भी डाटाविंड ही आकाश 2 का भी सप्लायर है। इस बीच जिन हजारों लोगों ने मूल आकाश की बुकिंग की थी उन्हें न तो टेबलेट मिली न पैसा वापस मिला।

यदि आकाश में गड़बड़ियां न भी हों तो भी उससे पैसे का मूल्य नहीं मिलता।कई भारतीय कंपनियों ने सस्ती टेबलेटस बनाईं हैं जो 99डालर या उससे ज्यादा की हैं।लेकिन कोई भी हिट नहीं हुई क्योंकि उपभोक्ता एपल के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयार हैं।

आकाश के लिए बड़ी संख्या में हुई बुकिंग को वास्तविक मांग समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। टाटा की नैनो के लिए बहुत एडवांस बुकिंग हुई थी लेकिन जब यह बात फैली कि उसमें पैसे का मूल्य नहीं मिल रहा तो सारी बुकिंग गायब हो गई।

इतिहास बताता है कि तकनीक और कीमतें इतनी तेजी से बदलती हैं कि किसी सरकार को विजेताओं को चुनना नहीं चाहिए। पीसी जगह लैपटाप ने ले ली लेकिन उसपर नोटबुक भारी पड़ी लेकिन अब टेबलेट ने नोटबुक को पीछे छोड़ दिया है।न तो सरकार न ही कोई और यह जानता है कि कल कौनसी तकनीक सफल होगी।

भारतीय विश्लेषक मानते हैं कि ई-बुक अगली विजेता होगी।लेकिन यह निश्चित है कि उसे सबसे बड़ी चुनौती तेजी से विकसित हो रहे सेलफोनों से है।अब वह वो सारे काम कर सकते हैं जो एक कंप्यूटर करता है। सेलफोन 15डालर से शुरू होते हैं फिर हमारे देश में कालिंग रेट भी काफी कम है।

टेबलेट के लिए महंगे वायरलैस प्लग इन,और महंगी वायरलैस सर्विस की जरूरत होती है। इससे पैसे का मूल्य नहीं मिल पाता।सेलफोन सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी काम करते हैं।उनके लिए थोड़ी बहुत बिजली की जरूरत होती है। उन्हें ट्रैक्टर की बैटरी से भी चार्ज हो  जाता है।

टेबलेट को ज्यादा बिजली की जरूरत होती है और इसके अलावा हेल्प सेंटर्स का विस्तृत नेटवर्क जरूरी है।यदि मकसद मनोरंजन नहीं शिक्षा है तो सेलफोन ज्यादातर वे सब काम करता है जो टेबलेट कर सकती है।

यदि सरकार कंप्यूटिंग को लोगों तक ले जाना चाहती है उन्हें विजेताओं को बाजार के भरोसे छोड़ देना चाहिए। सरकार सोचती है कि वह बड़े पैमाने पर आर्डर देकर बडे स्तर की अर्थव्यवस्था पैदा कर सकती है लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था सरकारी आर्डरों से पैदा होने वाली अर्थव्यवस्था से ज्यादा बड़े स्तर की अर्थव्यवस्था पैदा कर सकती है।

सरकार केवल आकाश 2 या उन्य किसी उपकरण  के लिए 11डालर की सब्सिडी देने के बजाय सभी छात्रों को 11डालर का वाउचर दे सकती है ताकि वे अपनी पसंद का उपकरण खरीद सकें।यह सिबल की आकाश 2 देने की महत्वाकांक्षा जैसा महानतापूर्ण नहीं होगा लेकिन इससे अब तक मिली  नाकामी और पैसे की बर्बादी से बचा जा सकता है।

- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर

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