एयर इंडिया का संकट

देश का राष्ट्रीय वायुवाहक एयर इंडिया संकट में है। पिछले चार वषों में सरकार ने कंपनी को 16,000 करोड़ रुपये की रकम उपलब्ध कराई है। यह रकम 500 रुपये प्रति परिवार बैठती है। इसका मतलब यह हुआ कि देश के हर परिवार से यह रकम वसूल कर एयर इंडिया को उपलब्ध कराई गई है। इतनी बड़ी राशि झोंकने के बाद भी कंपनी का घाटा थम नहीं रहा है।

घाटे का एक कारण जरूरत से ज्यादा उड्डयन कंपनियों का बाजार में प्रवेश करना है। जैसे नुक्कड़ पर पान की चार दुकाने खुल जाएं तो ग्राहक बंट जाते हैं और इनमें से कुछ दुकाने शीघ्र ही बंद हो जाती हैं, परंतु इसे अर्थव्यवस्था के लिए नुकसान नहीं मानना चाहिए। पान की वे दुकाने ही बंद होंगी, जिनके पान की क्वालिटी खराब होगी और ग्राहकों के साथ व्यवहार अच्छा नहीं होगा। कुशल दुकान लाभ कमाती है और खस्ताहाल दुकान बंद हो जाती है। नई कंपनियों का प्रवेश करना, प्रतिस्पर्धा का गरमाना और अकुशल कंपनी का बंद होना यह सब पूंजीवाद का सामान्य अंग है। किंगफिशर एयरलाइन का बंद होना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अब एयर इंडिया उसी मुहाने पर खड़ी है। एयर इंडिया के घाटे में चलने के दो कारण हैं। तात्कालिक कारण 2007 में इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया का विलय है। दोनों पूर्व कंपनियों का चरित्र अलग-अलग था, जैसे चाय और नीबू पानी। इंडियन एयरलाइंस छोटे जहाज का इस्तेमाल करती थी और कम दूरी पर उड़ान भरती थी, जबकि एयर इंडिया बड़े जहाज और लंबी दूरी की उड़ान भरती थी। इंडियन एयरलाइन के पायलटों के वेतन कम थे। दोनों कंपनियों के विलय के बाद इंडियन एयरलाइंस के पायलटों ने बराबर वेतन की मांग की। इसे मंजूर न किए जाने पर असंतोष व्याप्त हो गया। दूसरा कारण सरकारी कंपनियों की मौलिक अकुशलता है। नेतागण एयर इंडिया पर दबाव बनाते हैं कि उनके शहर से विमान सेवा शुरू की जाए या इन रूटों पर उड़ने वाले हवाई जहाजों की संख्या बढ़ाई जाए। इन राजनीतिक रूटों पर कंपनी को घाटा होता है। सरकारी कर्मियों का मनमौजी स्वभाव भी आड़े आता है।

लोग बताते हैं कि साठ के दशक में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अगले दिन ही कर्मियों की कार्यशैली मस्त हो गई। उन्हें भरोसा हो गया कि अब काम करें या न करें, नौकरी तो सुरक्षित है। वेतन वृद्धि और पदोन्नति पर भी कोई असर नहीं पड़ने वाला। इसी लिए एयर इंडिया के पायलट अपनी सुविधा के अनुसार उठते हैं। पायलट साहब एयरपोर्ट नहीं पहुंचे तो उड़ान में देर हो जाती है। सुबह एक फ्लाइट में देरी होने से पूरे दिन कार्यक्रम बिगड़ जाता है और देरी का सिलसिला जारी रहता है। कभी-कभी खबर आती है कि एयर इंडिया के स्टाफ ने ओवर ड्यूटी करने से मना कर दिया, जिस कारण हवाई जहाज उड़ान ही नहीं भर पाया। एयर इंडिया के विमानों का उपयोग कम किया जाता है। कापा सेंटर फार एविएशन के अनुसार एयर इंडिया के 127 एयरक्राफ्ट में से करीब सौ ही उड़ाए जाने के काबिल हैं। इन सौ का उपयोग भी दूसरी कंपनियों की तुलना में कम है। पिछले समय में एयर इंडिया की कार्यकुशलता में कुछ सुधार हुआ है। उड्डयन में कंपनी का कुछ हिस्सा 14 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया है। एयरक्राफ्ट के उपयोग में भी सुधार हुआ है। परंतु मैं इन सुधारों को महत्व नहीं देता हूं। जैसे कि मौसम अच्छा होने पर कैंसर का रोगी उठकर चल पड़े तो उसे सुधार नहीं कहा जा सकता। यह अकुशलता दूसरे देशों की एयरलाइनों में भी व्याप्त है।

एक रपट के अनुसार फ्रांस की एयर फ्रांस, इटली की अलिटालिया, बेल्जियम की सबेना, ग्रीस की ओलिंपिक और स्पेन की आइबेरिया को भी सरकारी मदद देकर जिंदा रखा गया है। जापान की राष्ट्रीय एयरलाइन 2009 में दिवालिया हो गई थी। तत्पश्चात कर्मचारियों की भारी छंटनी की गई थी। अब छोटे और नए आकार में यह पुन: चालू हुई है। आशय है कि भीषण स्पर्धा में सरकारी कंपनियां असफल हैं। प्रश्न उठता है कि फिर दूसरी सरकारी कंपनियां सफल क्यों हैं? मेरा मानना है कि इनकी सफलता का प्रमुख कारण एकाधिकार है। जैसे स्टेट बैंक की शाखाओं का पूरे देश में जाल बिछा हुआ है। मैं दिल्ली में रहता था। फिर उत्तराखंड में रहने लगा। यहां मेरे गांव के पास स्टेट बैंक की ही अकेली ब्रांच थी। मजबूरन मुङो दिल्ली में अपना खाता स्टेट बैंक में ही खुलवाना पड़ा ताकि दोनों शाखाओं के बीच मनी ट्रांसफर आसानी से हो सके।

मेरा मानना है कि सरकारी कंपनी के सफल होने की संभावना नगण्य है। इनका मूल चरित्र अकुशलता और आरामतलबी का होता है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस बात को सही समझा था। अरुण शौरी के नेतृत्व में कई अकुशल सरकारी कंपनियों का निजीकरण कर दिया गया था, जैसे बालको का। निजीकरण का अर्थ होता है कि कंपनी की बागडोर को निजी उद्यमी के हाथों सौंप दिया जाए और कंपनी पर सरकारी नियंत्रण समाप्त कर दिया जाए। फार्म्युला है कि उद्यमी बड़ा है और सरकार छोटी। मनमोहन सिंह की सरकार ने निजीकरण के स्थान पर विनिवेश की नीति को लागू किया है। विनिवेश में सरकारी सरकारी कंपनी के कुछ शेयरों को बेच दिया जाता है। कंपनी का नियंत्रण मंत्री और सचिव महोदय के हाथों में ही रहता है। ऊपर से विनिवेश से मिली रकम को खर्च करने का मौका इन्हें मिल जाता है। सरकार का दायरा छोटा करने के स्थान पर विनिवेश की रकम को खर्च करने में सरकार के दायरे को बड़ा कर दिया है।

एयर इंडिया समेत तमाम सरकारी कंपनियों का निजीकरण कर देना चाहिए, खासतौर पर घाटे में चलने वाली कंपनियों का। मिली रकम का नए जरूरी क्षेत्र में निवेश करना चाहिए जैसे अंतरिक्ष अन्वेशन, जेनेटिक रिसर्च, स्वास्थ्य पर्यटन, पैटियट मिसाइल के उत्पादन इत्यादि में। सरकार को वहीं निवेश करना चाहिए जहां जोखिम अथवा पूंजी की कमी के कारण निजी उद्यमी बढ़ने का साहस न कर सकें। उड्डयन जैसे क्षेत्र में निजी उद्यमी सक्षम हो चुके हैं। इससे सरकार को पीछे हटकर नए उद्यमियों के प्रवेश का रास्ता सुलभ करना चाहिए। विशेष बात यह कि मंत्रियों के लिए अपने क्षेत्र में जाने को आसान बनाने के लिए गरीबों से टैक्स वसूल नहीं करना चाहिए।

 

- डा. भरत झुनझुनवाला (लेखक आर्थिक मामलों के विश्लेषक हैं)

साभारः दैनिक जागरण