उत्तरी अफ्रीका क्रांति और भारतीय लोकतंत्र

ट्यूनीशिया और मिस्त्र की घटनाओं के बाद भारत में भी लोग पूछने लगे है कि इस देश में ऐसी क्रांति क्यों नहीं आ सकती? भारत के भी हालात तो ऐसे ही है, जिनमें एक बड़ी उथल-पुथल की जरूरत है। बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, दमन तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के समर्पण की जिन पीड़ाओं ने वहां की जनता को उद्वेलित किया, उनसे भारत के लोग भी कम त्रस्त नहीं है। पिछले दिनों भीषण महंगाई, भयंकर बेकारी, किसानों की निरंतर आत्महत्याओं और घोटालों के एक से एक बढ़ चढ़ कर उजागर होते कारनामों ने पूरे देश के जनमानस को बुरी तरह बेचैन किया। किंतु क्या करें - ऐसी एक बेबसी व दिशाहीनता लोगों के मन में छाई है।

अरब / उत्तरी अफ्रीका देशों और भारत की हालातों में काफी समानताएं होते हुए भी एक बड़ा फर्क है। वहां तानाशाही हैं, किंतु भारत में एक लोकतंत्र चल रहा है। चुनाव का पांच साला त्यौहार बीच-बीच में यहां आता रहता है। सरकारें बदलती भी हैं, किंतु हालातें नहीं बदलती है। बेन अली या होस्नी मुबारक के रूप में एक तानाशाह को हटाने का लक्ष्य यहां नहीं है जो आम जनता को एकजुट कर दें। लोकसभा से लेकर पंचायतों तक होने वाले चुनाव एक तरह से सेफ्टी वाल्व है जो लोगों को बदलाव का दिलासा देते रहते हैं और उनके बीच के तेज-तर्रार नेतृत्व को लूट के टुकड़ों का भागीदार बनाकर समाहित करते रहते हैं। हालांकि आम लोग इसको भी समझने लगे है, किंतु इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।

यह करीब-करीब साफ हो चला है कि भारतीय लोकतंत्र टिकाऊ तो रहा है किंतु भारतीय जनता की तकलीफों और आकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है। जनपक्षीय बदलावों के बजाय यह यथास्थिति को बनाए रखने का एक जरिया बन गया है। यह चुनाव धन, बल, जातिवाद, सांप्रदायिकता व मौकापरस्ती का खेल बन गए है। लोकसभा तथा विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र में लाखों मतदाता होते है जिन्हें प्रभावित करने का काम बड़े धनपति और बड़े दलों के संगठित गिरोह ही कर पाते है। इतने बड़े चुनाव क्षेत्र दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं होते।

फिर लोकतंत्र का मतलब महज चुनाव नहीं होता। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व खबरपालिका - इसके ये चारों पाये आम जनता के सेवक और अनुचर होना चाहिए, किंतु मामला उल्टा है। प्रशासनिक ढांचे का कायापलट, पुलिस-कचहरी के ढांचे में बुनियादी बदलाव, सरकारी हिंसा व दमनकारी कानूनों का खात्मा, लोगों का सशक्तिकरण और इसके लिए घोर गरीबी तथा अशिक्षा का खात्मा, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं में कमी, लोक भाषाओं की स्थापना व प्रतिष्ठा, लोकोन्मुखी व निष्पक्ष मीडिया, सत्याग्रह व सिविल नाफरमानी की गुन्जाईश व इज्जत - इन जरूरी बातों को सुनिश्चित करके ही लोकतंत्र को सार्थक बनाया जा सकता है। अंग्रेजी राज से विरासत में मिले एवं साम्राज्य की जरूरत के हिसाब से बने घोर केन्द्रीकृत ढ़ांचे को पूरी तरह पलटकर राजनैतिक, प्रशासनिक, आर्थिक विकेन्द्रीकरण का काम भी जरूरी था, किन्तु उल्टे इस अवधि में केन्द्रीकरण बढ़ा है।

यह कहा जा सकता है कि भारत की जनता को सरकारें बदलने का मौका तो मिलता है। फिर भी हालातें नहीं बदलती तो समस्या जनता में जागरूकता की कमी, भारतीय राजनीति की गिरावट या विकल्पहीनता में है। लोकतंत्र के ढ़ांचे का दोष नहीं है। जो चुने जाते हैं, उन पर पांच साल तक मतदाताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। सत्ता के केन्द्रों व जनता के बीच दूरी भी काफी है।

छः दशक बाद भारतीय लोकतंत्र की समीक्षा करने और इसके अच्छे तत्वों को संजोते हुए इसके ढ़ांचे में बुनियादी बदलाव करने का वक्त आ गया है। इसके लिए भी जनक्रांति की जरूरत होगी।

-सुनील कुमार