प्रशासनिक सुधारों की है दरकार

आज के समय में सरकार की वो भूमिका नहीं रह गयी है जिसकी आज़ादी के समय परिकल्पना की गयी थी. आज जिस तरह निजी सेक्टर और दूसरे नागरिक संगठन समाज की ज़रूरतों को पूरा करने में लगे हुए हैं, उसे देखते हुए सरकार को अपनी भूमिका सिर्फ आवश्यक जिम्मेदारियों के निर्वहन तक ही सीमित कर देनी चाहिए. बड़ी सरकारी मशीनरी और हानि में चलने वाली सार्वजनिक इकाइयों से राष्ट्रीय कोष को लगातार नुकसान होता है. ऋण में रहना तो किसी भी तरह से हमारी सरकार के लिए हितकारी नहीं है. इसीलिए आवश्यक है की हम राज्य सरकारों और उनके द्वारा चालित इकाइयों को छोटा करें और उनका प्रदर्शन सुधारे.

सरकार पर आने वाले वित्तीय भार का प्रमुख हिस्सा होता है वेतन बिल, पेंशन और ब्याज भुगतान. पिछले कुछ वर्षों से राज्यों का वेतन बिल उनके संपूर्ण राजस्व व्यय का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा बना हुआ है और ब्याज भुगतान संपूर्ण राजस्व प्राप्ति का 25 प्रतिशत हिस्सा खाता आ रहा है. बारहवें वित्त आयोग के अनुसार राज्यों को अपनी भर्ती और वेतन पॉलिसी ऐसी बनानी चाहिए कि वो सरकार के राजस्व खाते पर सेंध ना लगाए. इस दिशा में सरकारी मशीनरी का आकार बहुत महत्वूर्ण होता है.

जवाहरलाल नेहरु नैशनल अरबन रुरल मिशन के अंतर्गत राज्यों में प्रशासनिक सुधार आने चाहिए. इन सुधारों के अंतर्गत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम, सेवानिवृत्ति से होने वाली रिक्तियों को ना भरा जाना,  सेवानिवृत्ति की उम्र घटाना, सर्विंग अधिकारियों को ही विभिन्न पोस्ट पर तैनात करना ना कि रिटायर्ड लोगों को, कठोर वर्क कांट्रेक्ट का सर्जन, अतिरिक्त/भार रुपी स्टाफ की छटनी और अन्य उपायों से सरकारी संस्थापनाओं को छोटा और कुशल बनाना है.

दुर्भाग्यवश पांचवे वेतन आयोग के प्रशासनिक सुधार सम्बंधित सुझावों की तो अनदेखी कर दी गयी पर वेतनों को और बढ़ा दिया गया जिस से राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा. आयोग ने कहा था कि सिविल सर्विस को 30 प्रतिशत तक कट किया जाए पर उस पर अधिक अमल नहीं किया गया. बाज़ार की सच्चाइयों को मद्देनज़र रखते हुए वेतन बढ़ाना ज़रूरी है पर अगर साथ ही साथ दूसरे सुधारों से भी सरकार का प्रदर्शन ठीक किया जाए, तो ये पूरे देश के विकास के लिए अच्छा होगा.

सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की बात करें तो नुकसान में चलने वाली इकाइयों को या तो बंद कर देना चाहिए या फिर फ़ौरन विनिवेश की दिशा में बढ़ते हुए सरकार को अपना हिस्सा इकदम कम कर देना चाहिए. जो इकाइयाँ लाभ अर्जित करने की स्थिति में लग ही नहीं रही हैं उन का पूर्णतया निजीकरण कर देना चाहिए. विलयन, पुनर्गठन, आकार घटाना और विभिन्न सरकारी कामकाज की आउटसोर्सिंग कुछ अन्य उपाय हैं जिनसे सार्वजनिक उद्यमों में सुधार आ सकता है.

- स्निग्धा द्विवेदी