पीड़ा की अनुभूति और नैतिकता

जब से मुक्त अर्थव्यवस्था की शुरूआत हुई है पाठकों के कानों पर बार-बार एडम स्मिथ नामक अर्थशास्त्री का नाम बार-बार पड़ने लगा  है। मराठी साहित्य में जो स्थान ज्ञानेश्वरी का है वही स्थान अर्थशास्त्र में उनके द्वारा 1776 में लिखी गई पुस्तक `राष्ट्र की संपत्ति`(Wealth of Nations) नामक पुस्तक का है। स्मिथ ने श्रम विभाजन, विशेषज्ञता जैसे प्राथमिक सिद्धांतों से लेकर मूल्य, बाजार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, और मुक्त अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर अत्यंत प्रवाहपूर्ण भाषा में और विस्तारपूर्वक उस पुस्तक में अपने विचार प्रगट किए हैं। व यह कहा जा सकता है कि 'व्यासोच्छिष्टम् जगत सर्वम्` की तर्ज पर स्मिथ ने 220 वर्ष पहले अर्थशास्त्र के हर मुद्दे को छुआ है। मुक्त अर्थव्यवस्था के आलोचक आर्थिक स्वतंत्रता का समर्थन करनेवालों को यह ताना मारते है – लगता है आप Laissez – faire; यानी जो मन में आए सो करो वाले हैं। वह एडम स्मिथ के संदर्भ में ही कहते हैं। एडम स्मिथ का जन्म 1723 में हुआ था। मात्र 29 वर्ष की उम्र में वे नीतिशास्त्र के प्रोफेसर बन गए थे।

राष्ट्रों की संपत्ति - पुस्तक प्रकाशित हुई और उन्हें तुरंत शोहरत मिल गई। उस पर केवल ब्रिटेन ही नहीं यूरोपीय देशों में भी काफी चर्चा हुई। राष्ट्र की संपत्ति इस विश्व प्रसिद्ध पुस्तक में मनुष्य की अहम् प्रेरणाओं और आर्थिक प्रेरणा का विवेचन है। एडम स्मिथ का अत्यंत क्रांतिकारी सिद्धांत यह था कि जिसे आर्थिक प्रेरणा के अनुरूप जीने की आजादी मिलेगी उस व्यक्ति और वह राष्ट्र का भौतिक जीवन समृद्ध होगा। इस कारण बहुत से लोगों को यह गलतफहमी हुई कि एडम स्मिथ का सारा अर्थशास्त्र केवल स्वार्थ प्रेरित मनुष्य के –सिद्धांत पर आधारित है। वामपंथी लोग तो अक्सर आलोचना करते हैं कि स्मिथ की सारी सोच मुनाफे के लिए पागल लोगों के बारे में है।

लेकिन 'राष्ट्र की संपत्ति' के प्रकाशन से 17 वर्ष पहले यानी 1759 में एडम स्मिथ ने नैतिक भावना का सिद्दांत पुस्तक प्रकाशित की थी। इस पुस्तक ने तब काफी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। लेकिन बाद में - राष्ट्र की संपत्ति - को इतनी चुंधिया देनेवाली सफलता मिली कि कई लोग- नैतिक भावना का सिद्धांत - पुस्तक को भूल गए।

नैतिक आचरण यानी क्या? सभी संस्कृतियों में माना गया है कि मनुष्य को न्याय, उदारता और विवेक से अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। इन तीनों गुणों के समुच्चय को महत्वपूर्ण माना गया है। यदि हम केवल विवेक, केवल उदारता या न्यायबुद्धि से चलने के बारे में सोचने लगें तो जिंदगी वहुत विकराल रूप धारण कर सकती है। लेकिन इससे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आर्थिक प्रेरणा से संचालित अहंकारी व्यक्ति न्याय, विवेक और उदारता के रास्तों के बारे में सोचता भी क्यों है। वह जो मिले, जहां भी से मिले उसे छीनकर जीतने, उपभोग करने की जिद वह क्यों नहीं करता? यदि स्वार्थ ही मूलभूत प्रेरणा है दया, करुणा और दातृत्व आदि भावनाओं का उदय कैसे होता है?

शुद्ध स्वार्थ की भावना से भी नैतिक भावना का उदय हो सकता है। स्वार्थबुद्धि भी केवल अपने नाक के आगे न देखनेवाली और केवल इसी क्षण का विचार करनेवाली नहीं हो सकती। हम भरपेट खा रहे हैं और आसपास के लोग भूखे हैं वे टकटकी लगाकर हमारी थाली की ओर देख रहे हैं तो इससे सुस्वादु भोजन का आनंद भी कम होता है और आसपास के लोगों को कुछ देकर ही अन्न ग्रहण करने की भावना पैदा होती है। व्यापक स्वार्थ की कल्पना भोजन करने से पहले दरवाजे के बाहर जाकर – कोई भूखा प्यासा याचक हो तो वह भोजन करने आए- ऐसा जोर से  ऐलान करके और आए हुए याचक की भूख शांत करने के बाद ही मुंह में निवाला लेने -की परंपरा तक भी जा सकती है।

आज हम जेब काटकर, डाका डालकर, लूटमार करके अपनी जरूरत की चीजें हासिल कर सकते है। लेकिन यदि सभी इसी तरह व्यवहार करने लगे तो अपराध और बल जबरी बहुत लाभ की नहीं रह जाएगी। तब  लोग संपत्ति के बंटवारे के बारे में ज्यादा सुसंस्कृत, न्यायपूर्ण और विवेक पर आधारित व्यवस्था स्वीकार करते हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि निस्वार्थ लगनेवाला व्यवहार दीर्घकालीन स्वार्थ  का व्यवहार होता है। आज भी बहुत से अर्थवादी और भौतिकवादी इस तरह से ही अपनी बात को पेश करते हैं। लेकिन ढाई सौ साल पहले एडम स्मिथ ने इस चमत्कार की व्याख्या की थी। यह दुर्भाग्य की बात है कि इसकी आमतौर पर उपेक्षा ही की गई। रास्ते में पड़े आदमी को देखकर बहुतों की इच्छा होती है कि उसकी मदद की जाए। काम की व्यस्तता या किन्हीं अन्य बाधाओं का बहाना बनाकर ज्यादातर लोग निकल जाते हैं। मदर टेरेसा एकाध कोई ही होती है। फिर भी इस बारे में कोई संदेह नहीं कि सहानुभूति की भावना मन में पैदा होती है। कई लोगों को दुर्घटना से पीडित आदमी को देखना अच्छा नहीं लगता। डाक्टर जब आपरेशन कर रहा हो तब पास खड़े होकर देखने पर कई लोगों को चक्कर आ जाते हैं। इन कोमल भावनाओं का उदगम कहां से होता है? एडम स्मिथ ने 250 साल पहले इसका उत्तर दिया था।

आदमी का मस्तिष्क प्रजनन, पोषण और संरक्षण के लिए आवश्यक जानकारी इकट्टा करता रहता है। उनका वर्गीकरण करके उनको संग्रहित करके रखता है। अलग-अलग घटनाओं में कार्यकारण की खोज करता है। और नए अनुभवों के प्रकाश में पहले के निष्कर्ष बदलता रहता है। सामान्य जिंदगी में व्यवहारों की धकापेल में जिंदगी गुजारनेवालों के बुद्धि के व्यवहार में ज्यादातर यही काम होता रहता है। लेकिन मनुष्य की बुद्धि की एक और प्रवृत्ति होती है। उसके पास निर्जीव चीजों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए अलग तंत्र है और सजीवों के बारे में जानकारी लेने के लिए अलग तंत्र।

दूसरे मनुष्य के बारे में विचार करते समय मस्तिष्क का काम करने तरीका ऐसा होता है कि हम मन में यह तस्वीर बनाते हैं कि हम उस व्यक्ति की जगह होते तो हमें क्या लगता, हमारी क्या हालत हुई होती ऐसा विचार मन में आने के कारण सहानुभूति, करुणा, उदारता, और दया आदि भावनाएं पैदा होती हैं। दुर्घटना में घायल हो कर पड़े व्यक्ति को देखकर यह कल्पना आना स्वाभाविक है – ऐसे घाव मुझे होते तो? डाक्टर जब घाव सीता है तब उसे देखकर यह संवेदना पैदा होती है कि टांके मेरे ही बदन में पड़ रहे हैं। और वह विचार असह्य होने के कारण गश आ जाता है।

दूसरे व्यक्ति के बारे में विचार करते समय परकाया प्रवेश करना मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। दूसरे का दुख और वेदना जाननेवाले संत महात्मा दुसरे के दुख से दुखी होते हैं तो बह साधना के जरिये हासिल महानता के कारण यह कल्पना सही नहीं है। वरन संत महात्मा सहानुभूति की प्राकृतिक भावना को संरक्षित करते हैं। इसलिए ही कहा गया है – वैष्णवजन तो तेणे कहिए। जो पीर पराई जाने रे।। आम लोग व्यवहार में इस प्रवृत्ति का पोषण करते हैं तो खूनी, चोर, डकैत उसे पूरी तरह उखाड़ फेंकते हैं।

परकाया प्रवेश की अनुभूति करने  की क्षमता कम ज्यादा हो सकती है। केवल मनुष्यों के बारे में ही नहीं तो पशु पक्षियों, कीट पतंगों तक सभी के बारे में परकाया प्रवेश के द्वारा सुख-दुख की अनुभूति लेनेवाले लोग होते हैं। वृक्ष, वल्लरियों से बातचीत करनेवाले लोग भी होते हैं। इसके विपरित आपने जैसे मनुष्य योनि में जन्मे प्राणी के बारे में संवेदना पैदा न हो इसलिए परकाया प्रवेश की इंद्रिय को बंद कर दिया जाए ऐसी कोशिश भी की जा सकती है। भाई –भाई में कोई झगड़ा हो और उसमें से एक का कुछ बुरा हो तो उसका दुख मन को नहीं छुए ऐसी कठोरता भी तैयार की जा सकती है।– दलितों को हमारी बराबरी क्यों करनी चाहिए? ऐसा कहनेवाले अपनी प्राकृतिक संवेदना को अनुभव करने वाले इंद्रिय को बधिया कर देते हैं। हिन्दू –मुस्लिम दंगों में – अपने कितने लोग मरे और उनके कितने? ऐसा विचार करनेवाले एक समाज के प्रति अपनी इस इंद्रिय को पंगु बना देते हैं।पाकीस्तानी और चीनी का नफरतपूर्ण ढंग से उल्लेख करके उस समाज के साथ जुड़े परकाया प्रवेश के रिश्ते को जानबूझकर तोड़ा जाता है।

मनुष्य की प्रकृति एक आयामी नहीं है उसमें जिस तरह आर्थिक प्रवृत्ति है उसी तरह प्रकृति प्रदत्त करुणा की भावना भी है। इस भावना को शास्त्रीय आधार देनेवाले एडम स्मिथ केवल Laissez – faire यानी जिसके मन में जो आए सो करे इसके लिए इतिहास में मशहूर हो यह भाग्य की विडंबना कही कही जाएगी।

- शरद जोशी