इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं अकाऊंटेब्लिटी की जरुरत

नीति आयोग द्वारा तैयार किया गया स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स इन दिनों राष्ट्रव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस इंडेक्स में अप्रत्याशित जैसा कुछ भी नहीं है। यह इंडेक्स पूर्व में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर हुए शोधों और उनके आंकड़ों की एक प्रकार से पुष्टि भर ही करता है। वैसे यह इंडेक्स शिक्षा का अधिकार कानून के उन प्रावधानों की भी कलई खोलता है जो स्कूलों को लर्निंग आऊटकम की बजाए बिल्डिंग और प्ले ग्राउंड के आधार पर मान्यता प्रदान करता है। जबकि दुनियाभर के शोध लर्निंग आऊटकम और क्लासरूम के साइज़ के बीच किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार करते हैं। नीति आयोग द्वारा जुटाए गए आंकड़ें भी इसकी पुष्टि ही करते हैं। जारी इंडेक्स के मुताबिक ऐसे राज्यों के सरकारी स्कूलों में भी छात्रों का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है जहां इंफ्रास्ट्रक्चर व अन्य सुविधाएं बहुत अच्छी नहीं है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, केरल, असम, उत्तराखंड जैसे राज्य इसके उदाहरण हैं। जबकि ऐसे राज्य जिन्होंने अपने बजट का बड़ा हिस्सा सिर्फ स्कूल भवनों व अन्य सुविधाओं पर खर्च किया है वहां छात्रों के सीखने का स्तर काफी खराब रहा है। शानदार स्कूल बिल्डिंग, स्वीमिंग पूल सहित अन्य सुविधाएं प्रदान कर देशभर में सुर्खियां बटोरने वाली दिल्ली सहित पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

मजे की बात यह है कि तीसरी, पांचवी व आठवीं कक्षा के छात्रों के बीच भाषा और गणित विषय को लेकर किए गए अध्ययन में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान हर वर्ग में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य रहे। जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक फोकस करने वाले दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य सभी वर्गों में फिसड्डी रहे।

यही कारण है कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा की इच्छा रखने वाले छात्रों व अभिभावकों का मोह सरकारी स्कूलों के प्रति भंग होता जा रहा है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उन्हें निजी स्कूलों में भेजना चाहता है। आरटीई ने इस काम में उनकी खूब मदद भी की है। यदि देश की राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो वर्ष 2011-12 से 2018-19 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या में तो वृद्धि हुई लेकिन इनमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या लगातार कम होती गयी। वर्ष 2011-12 में दिल्ली सरकार के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 16.53 लाख थी जो 2014-15 में बढ़कर 17.01 लाख हो गयी। लेकिन वर्ष 2015-16 में स्कूलों में नामांकन घटकर 16.70 लाख और 2018-19 में 16.48 लाख तक पहुंच गया। जबकि स्कूलों की संख्या वर्ष 2011-12 में 1,160 से बढ़कर 2018-19 में 1,229 हो गयी। इसी प्रकार नगर निगम के स्कूलों में वर्ष 2011-12 में जहां 9.96 लाख छात्र थे वहीं 2018-19 आते आते इनकी संख्या 7.41 लाख रह गयी।

उधर, दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2011-12 में 2,026 से बढ़कर 2018-19 में 2,671 हो गयी। इतना ही नहीं इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या जो वर्ष 2011-12 में 13.78 लाख थी वो वर्ष 2018-19 आते आते बढ़कर 18.61 लाख हो गयी।

कहने का तात्पर्य यह है कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्र सरकारी स्कूलों को छोड़कर प्राइवेट स्कूलों का रुख कर रहे हैं। दरअसल, आरटीई के सेक्शन 12, जो सभी निजी स्कूलोँ के लिए उनकी सीट का 25% हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्लूएस) व सुविधाहीन वर्ग (डिसएडवांटेज ग्रुप) के बच्चोँ के लिए आरक्षित कराता है; ने पहले से ही खाली हो रहे सरकारी स्कूलोँ के पुराने ट्रेंड को और बढ़ावा दे दिया है। इससे राज्य सरकारोँ को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2015-16 में सिर्फ राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में ही ऐसे 24,000 सरकारी स्कूलों को बंद करना पड़ा जिनमेँ बच्चोँ के नामांकन की संख्या घटकर 10 से भी कम पहुंच गई थी।

इस तरह स्कूलोँ के बंद होने से सरकार की अयोग्यता उजागर होती है, ऐसे में राज्य सरकारेँ अपनी शर्मिंदगी छिपाने के लिए आरटीई के ही सेक्शन 19 का सहारा ले रही हैं जो गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करने की बात करता है। चूंकि स्कूलों को मान्यता प्रदान करने का आधार ही भारी भरकम निवेश आधारित है इसलिए 50 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक फीस लेने वाले छोटे बजट स्कूलों के लिए यह संभव नहीं हो पाता। यही कारण है कि अक्सर बजट स्कूल्स चार से छह कमरों के किराए के भवन में संचालित होते हैं। जबकि सरकारी स्कूलों में प्रतिछात्र प्रतिवर्ष खर्च की राशि घोषित तौर पर दोगुने से अधिक है जबकि इसमें भवन आदि का खर्च शामिल कर लिया जाए तो यह राशि बढ़कर 50 स 60 हजार के बीच हो जाती है।

गुणवत्ता युक्त शिक्षा के मामले में प्रतिस्पर्धी प्राइवेट स्कूलों से काफी पीछे रहने के बावजूद सरकारी स्कूलों का प्रतिछात्र मासिक खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वोटरों को आकर्षित करने के लिए सरकारें बड़े बड़े स्कूल भवन, खेल के मैदान आदि का निर्माण करती हैं जबकि शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी का ध्यान नहीं होता। छात्रों के सीखने के खराब परिणामों के लिए एक रटा रटाया जवाब उनके आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आने और पहली पीढ़ी के छात्र होना दिया जाता है। जबकि यही छात्र जब बजट स्कूलों में दाखिला लेते हैं तो उनका प्रदर्शन कहीं बेहतर होता है। देश और यहां के निवासियों के उज्जवल भविष्य के लिए यह जरूरी है कि सरकार अपने स्कूलों को भी स्वायतता प्रदान करे और छात्रों के बेहतर प्रदर्शन के लिए किसी की जवाबदेही तय करे।

- अविनाश चंद्र