मनमोहन एक राष्ट्रीय त्रासदी

मनमोहन सिंह का उत्थान और पतन आधुनिक समय की त्रासदी है। इसे उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में दर्ज किया गया है। कई लोगों ने कहा कि ऐसी किताब तो तब लिखी जानी चाहिए जब मुख्य पात्र काल-कवलित हो गए हों या कम से कम अपने पद पर न हो। ऐसी किताब चुनाव के दौरान तो नहीं ही प्रकाशित की जानी चाहिए। खैर, यह किताब भाजपा के लिए यूपीए-2 सरकार को लताडऩे के लिए वक्त पर मिला तोहफा सिद्ध हुई।
 
मनमोहन सिंह के उदय की कहानी तो भारतीय बच्चों की कई पीढिय़ों को प्रेरित करती रहेगी। 12 वर्ष की उम्र तक एक लड़का धूलभरे ऐसे गांव में बढ़ता है जहां न बिजली है न घरों में नल का पानी। न अस्पताल है और न सड़क। वह मीलों पैदल चलकर स्कूल जाता है और लालटेन की रोशनी में पढ़ता है। मगर 22 वर्ष का होते-होते वह कैम्ब्रिज पहुंच जाता है और वहां से पीएचडी के लिए ऑक्सफोर्ड चला जाता है। अंतत: वह देश का वित्तमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बन जाता है। 
 
उसके बाद उन ऊंचाइयों से उसका पतन होता है। यूपीए-2 सरकार के मुखिया के नाते मनमोहन एक  निष्प्रभावी और भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व करते हैं। महंगाई बढ़ती है, आर्थिक वृद्धि घटती है, बेरोजगारी फैलती है और लोगों को बेहिसाब परेशानियां भुगतनी पड़ती हैं। उनके मंत्री बार-बार उनका अपमान करते हैं पर वे सत्ता से चिपके रहते हैं और इस तरह प्रधानमंत्री पद की गरिमा को कम कर देते हैं। 
 
एक ऐसे अच्छे आदमी का पतन देखना हृदय विदारक घटना है, जो बुद्धिमान होने के साथ विनम्र भी है। हम कारणों और स्पष्टीकरणों की खोज करने लगते हैं। मनमोहन सिंह का दोष था उनका संकोची, अत्यधिक विनम्र और अपनी बात जोर न देनेे का लगभग भीरू होने जैसा स्वभाव। किंतु उन्हें ऐसे पद पर नियुक्त कर दिया गया, जिसमें दृढ़निश्चय और अपनी बात जोरदार ढंग से रखने की जरूरत होती है। फिर सत्ता के दो केंद्र होने ने त्रासदी और बढ़ा दी। प्रधानमंत्री सरकार के नेता थे और सोनिया गांधी पार्टी की नेता थीं। अपने पद के लिए मनमोहन सोनिया गांधी के एहसानमंद थे और इसलिए वे अपनी मर्जी के मालिक नहीं थे। वे अपने मंत्रियों को नियुक्त नहीं कर सकते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय में अपना स्टाफ तक नहीं रख सकते थे। नौकरशाही को समझ में नहीं आता था कि वह किससे आदेश ले। इसके कारण सरकार को लकवा मार गया। यह उस कहानी का सारांश है जो संजय बारू ने बताई है।  
 
पर बारू एक अच्छे अर्थशास्त्री भी हैं। इसलिए मुझे निराशा हुई कि वे इस तथ्य की गहराई में नहीं गए कि क्यों यूपीए की सुधार समर्थक 'ड्रीम टीम' ने आर्थिक सुधार लागू नहीं किए? 1991 से धीमी रफ्तार से लेकिन लगातार जारी सुधार 2004 आते-आते बिल्कुल ठप हो गए। धीमी रफ्तार वाले सुधारों ने भी यूपीए-1 के कार्यकाल में देश को दुनिया की दूसरी सबसे तेज अर्थव्यवस्था बना दिया था। असल में यह पूर्व में किए सुधारों का परिणाम था और मनमोहन को वाजपेयी से विरासत में अच्छी अर्थव्यवस्था मिली थी।
 
यूपीए-2 की कई समस्याओं की जड़ें यूपीए-1 में शुरू किए गए कल्याणकारी कार्यक्रमों ( जैसे कर्ज माफी और बढ़ती सब्सिडी) पर जरूरत से ज्यादा खर्च में थीं। यदि इच्छा शक्ति होती तो  कम से कम  'नीचे की ओर लटक रहे फलों' को ही तोड़ लिया जाता, जैसी की रघुराम राजन ने आर्थिक सुधारों के अच्छे नतीजों को उपमा दी थी। हताशाभरे पिछले एक साल में पी. चिदंबरम ने निर्णायक कदम उठाकर बताया कि यदि पूरे दस साल ये सुधार किए गए होते तो क्या हासिल नहीं किया जा सकता था। 
 
दूसरा सवाल यह है कि क्यों यूपीए सरकार ने आर्थिक वृद्धि और समानता के बीच गलत अदला-बदली की? 2004 में जीत के बाद कांग्रेस ने नतीजा निकाला कि खुले बाजार वाले सुधार गरीबों को फायदा नहीं पहुंचा पा रहे हैं। इसलिए उसने 'समावेशी विकासÓ के लुभावने नारे के तहत कल्याणकारी कार्यक्रमों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। सड़कें बनाने की बजाय यूपीए सरकार की ऊर्जा गरीबों को 100 दिन का रोजगार व सस्ती बिजली दिलाने और किसानों का कर्ज माफ करने जैसे कामों में खर्च होने लगी। नई परियोजनाओं को मंजूरी देना लगभग ठप हो गया, ज्यादातर पर्यावरण के नाम पर।
 
मनमोहन हमारे महान आर्थिक सुधारक थे। ऊंची आर्थिक दर के महत्व की समझ उनके खून में थी। उन्होंने इस पर से सरकार का फोकस हटने ही कैसे दिया? उन्होंने ढांचागत विकास में आई तेजी को धीमा क्यों पडऩे दिया? हर देश पर्यावरण का ध्यान रखता है पर इसके लिए कोई सैकड़ों परियोजनाएं नहीं रोक लेता।
 
बेशक, मनमोहन सिंह को काम कराने में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव की भूमिका को ध्यान में रखना था। 1991-1993 में जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे तो एएन वर्मा ने आर्थिक सुधार लागू करने में उनकी मदद की थी। वर्मा ने हर हफ्ते एक नया सुधार लागू करने के लिए सचिवों की संचालन समिति की गुरुवार की मशहूर बैठकों का बहुत अच्छा उपयोग किया था। ब्रजेश मिश्र तो अटलबिहारी वाजपेयी के लिए और भी कारगर साबित हुए थे। वर्मा और मिश्र दोनों जोखिम लेने वाले लोग थे। फिर मनमोहन ने टीके नायर को क्यों स्वीकार किया, जो जोखिम लेने के खिलाफ होने के साथ वामपंथी रुझान वाले हैं? प्रधानमंत्री की विफलता में यह महत्वपूर्ण कारक है। उनकी मदद करने की बजाय नायर ने उन बाधाओं को और बढ़ाया जो प्रधानमंत्री आर्थिक सुधार लागू करने में महसूस कर रहे थे।
 
परिदृश्य बिल्कुल अलग हो सकता था। एक मजबूत प्रधानमंत्री विश्व बैंक की बिज़नेस वातावरण संबंधी 134वीं रिपोर्ट को चुनौती के रूप में लेता। मनमोहन को ऐसे तरीके खोज निकालने थे, जिससे बिज़नेस शुरू करने के लिए जरूरी करीब 70 मंजूरियां ( जी हां 70, योजना आयोग की नई उत्पादन नीति के मुताबिक) खत्म हो जातीं।  इन्हें जोड़कर सिंगल विंडो में बदल देते जैसा की हमारे प्रतिस्पद्र्धी देशों ने किया है। इसकी बजाय हमारी कुख्यात लालफीताशाही देश की यही छवि बनाती रही कि शायद भारत ईमानदारी से व्यवसाय करने के लिए सबसे खराब देश है। इसके साथ हमारा 'इंस्पेक्टर राज' छोटे उद्यमियों के लिए लगातार परेशानियां खड़ा करता रहा।
 
बारू की किताब का आखिरी सबक। हम मतदाता नेताओं में  बुद्धिमत्ता को जरूरत से ज्यादा तवज्जों देने की आम गलती करते हैं जबकि इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि दृढ़निश्चय और एटीट्यूड ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। बिजनेस लीडर्स की भरती के समय भी हम यही गलती करते हैं। ऊंची अकादमिक उपलब्धियों वाला दावेदार हमें ज्यादा प्रभावित करता है, जो ठीक नहीं है। जब तक हमें अपनी गलती का पता लगता है, बहुत देर हो चुकी होती है। व्यक्तिगत मामले में तो एक व्यक्ति का नुकसान होता है, लेकिन जब प्रधानमंत्री डगमगाता है, यह राष्ट्रीय त्रासदी होती है।
 
 
गुरचरन दास, प्रसिद्ध स्तंभकार और लेखक
- साभारः दैनिक भास्कर
गुरचरण दास