मनरेगाः राजनीतिक साहस नहीं रहा सरकार में

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।
 
दिल्ली की हार से भाजपा ने यह बिल्कुल गलत निष्कर्ष निकाल लिया है। दिल्ली में भाजपा की हार का कारण यह कतई नहीं रहा है कि आप पार्टी ने दिल्ली में फ्री बिजली और पानी देने का वायदा किया था। हकीकत यह है कि भाजपा को दिल्ली में उच्च, मध्यम और निम्न तीनों ही वर्ग में आप से कम वोट मिले हैं।
 
यह सिर्फ फ्री बिजली या पानी के वादों के कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उच्च और मध्यम वर्ग को इसका फायदा नहीं मिला है। सच यह है कि 9 माह के कार्यकाल में भाजपा ने अपने चुनावी वायदों जैसे भ्रष्टाचार, काले धन और रोजगार सर्जन की दिशा में कुछ नहीं किया था। मई 2014 के बाद से कई विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ऎसा लगने लगा था कि उनमें भी कांग्रेस की तरह अहंकार आ गया है। इसलिए दिल्ली के लोगों ने भाजपा को सबक सिखाने के लिए आप को वोट दिया है, जिससे भाजपा से लड़ने के लिए भी कोई पार्टी रहे।
 
मनरेगा को जारी रखने की कतई जरूरत नहीं थी। मनरेगा को 30 हजार करोड़ से अधिक बजट का जो आवंटन किया गया है वह किसानों के कृषि प्रशिक्षण, सड़क निर्माण, सिंचाई सुविधाओं और स्वच्छ भारत अभियान के टॉयलेट आदि के निर्माण लिए किया जाता तो बेहतर होता। आखिर इन कामों के लिए भी तो लोगों को रोजगार दिया ही जाएगा। अभी मनरेगा में जो काम होता है उससे किसी स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण नहीं हो सकता।
 
मनरेगा में अधिक से अधिक लोगों को काम दिए जाने के उद्देश्य से यह प्रावधान जोड़ा गया है कि इस योजना के अंतर्गत भारी मशीन और महंगी निर्माण सामग्री आदि का इस्तेमाल नहीं हो सकता। मिट्टी, पत्थर आदि से ही निर्माण कार्य किया जाता है। इसलिए मनरेगा में अगर कोई सड़क बनती भी है तो वह एक ही बारिश में धुल जाती है। किसी भी स्थाई बुनियादी ढांचे जैसे पक्की सड़क, नहर आदि खोदने का काम इसमें नहीं होता और निम्न गुणवत्ता वाली परिसपंत्तियों को निर्माण ही इसमें होता है।
 
इस योजना के क्रियान्वयन में सरकार अब भी परिवर्तन तो कर सकती है पर इसमें वह राजनीतिक साहस नहीं बचा है। सरकार को लगता है कि अगर वह ऎसा कुछ करेगी तो उसे गरीब विरोधी समझ लिया जाएगा। बजट के बाद सरकार पर ऎसे आरोप पहले ही लग चुके हैं कि सारा पैसा कॉर्पोरेट के पास जा रहा है।
 
मनरेगा की दूसरी खामी है कि यह उस योजना से भी खराब है जिसकी नकल के आधार पर यह बनाई गई। महाराष्ट्र में 1970 से एक "रोजगार गारंटी योजना" चली आ रही थी जो कि मनरेगा लागू होने के बाद बंद हुई है। इस योजना के अंतर्गत हर उस जरूरतमंद को सिर्फ 100 दिन नहीं, सालभर काम देने का प्रावधान था, जो कोई भी सरकार के पास काम मांगने जाता था। पर इसमें एक ही शर्त थी कि इसमें मजदूरी बाजार भाव से कम रखी गई थी।
 
यह भी एक तरह की सब्सिडी ही थी, पर इस तरह की योजनाओं को "क्लीन सब्सिडी" कहा जाता है। क्योंकि इसमें अपने आप ही सिर्फ जरूरतमंद ही काम मांगने आते थे। इसमें काम करने वाले श्रमिक बाजार में बेहतर मजदूरी की तलाश भी करते रहते थे। जैसे ही उनको बाजार में अच्छी मजदूरी मिल जाती, वे यहां काम छोड़ देते। जबकि काम की गारंटी कानून से पोषित हो रही मनरेगा योजना हकीकत में न तो काम की गारंटी सुनिश्चित करती है (सिर्फ 100 दिन काम की गांरटी है) और न ही वर्ष भर न्यूनतम आय का सहारा ही बन सकती है।
 
न्यूनतम मजदूरी बाजार से ज्यादा निश्चित करने और कानूनन काम की गारंटी का अधिकार दिए जाने से मनरेगा में काम पा सकने वाले अब बाजार में काम ढूंढ़ने का प्रयास ही नहीं करते। जबकि इन लोगों को 100 दिन के बाद काम से हटाया जाता है, जो कि पुरानी स्कीम में नहीं होता था। साथ ही, पुरानी स्कीम में जो निर्माण कार्य होते थे वो भी स्थाई होते थे। इसलिए मनरेगा को वर्तमान रूप में जारी रखने का औचित्य नहीं है। 
 
 
- पार्थ जे शाह (सेटर फॉर सिविल सोसायटी)
साभारः राजस्थान पत्रिका