बेहतर हो कि आर्थिक सोच बदलें

इसमें कोई शक नहीं कि आम आदमी पार्टी के आने से भारतीय राजनीति में उम्मीद जग गई है नए सिरे से राजनीतिक सवालों को देखने की। भ्रष्टाचार, परिवारवाद और झूठे वायदों ने राजनीतिक माहौल में जो निराशा फैलाई है देश भर में, वह थोड़ी कम हुई है। आप के नेता यह जानते हैं, सो हर तरह से दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे अन्य राजनेताओं जैसे नहीं हैं। मतगणना के दिन आप के बड़े नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर नतीजों का इंतजार करते दिखे। इस बात की खूब तारीफ की टीवी के पंडितों ने। जीत का जश्न मनाया आप ने जंतर-मंतर पर आम कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ। यह भी बहुत बड़ी बात है, अगर आप यह याद रखें कि ऐसा किसी दूसरे राजनीतिक दल में नहीं होता है। चुनाव खत्म होने के फौरन बाद बड़े नेता गायब हो जाते हैं ऐसे कि आम लोगों से मिलना-जुलना तक बंद कर देते हैं।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आप ने आम आदमियों को खड़ा किया दिल्ली में बड़े-बड़े लोगों के खिलाफ और इन आम आदमियों ने उन्हें जबर्दस्त शिकस्त दी। ऊपर से आप ने दिखाया कि चुनाव जीतने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये की जरूरत नहीं है। दावा करते हैं आप के नेता कि उन्होंने दिल्ली के चुनाव के लिए बीस करोड़ रुपये इकट्ठा किए और इससे ज्यादा नहीं हुआ उनका खर्च। ये सब अच्छी बातें हैं, बहुत ही अच्छी बातें।

मुझे तकलीफ है तो सिर्फ आप की आर्थिक नीतियों से। उनका घोषणापत्र जब मैंने पढ़ा, तो ऐसा लगा कि मैं कांग्रेस के दशकों पुराने घोषणापत्र पढ़ रही हूं। वही जो इंदिरा गांधी के समय तैयार किए जाते थे और जब देश में आम सहमति थी कि समृद्धि भारत में तभी आएगी, जब अर्थव्यवस्था और विकास की सारी जिम्मेदारी अधिकारियों और राजनेताओं के हाथों में हो। ऐसा लगता है कि जिन्होंने आप का घोषणापत्र तैयार किया है, वे पूरी तरह भूल गए हैं कि उन दिनों भारत का क्या हाल था। गरीबी इतनी थी देश भर में कि मध्यवर्ग का नामो-निशान नहीं था। रोजगार के अवसर इतने कम थे कि सरकारी नौकरी मिलना नौजवानों के लिए सबसे बड़ा सपना था।

आज अगर भारत बिल्कुल बदल गया है, तो उसका अहम कारण है कि देश में आर्थिक सुधार हुए, नई नीतियां आईं और लाइसेंस राज हटाया गया। इसके बाद भारतीय उद्योगपतियों ने निजी क्षेत्र में लाखों नौकरियां पैदा कीं। अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि, जो कभी तीन प्रतिशत से ऊपर नहीं गई थी, वह नौ फीसदी तक पहुंच गई थी, और ऐसा होने से देश में आया महा परिवर्तन। 

ऐसा लगता है कि आप के बड़े नेताओं को इन तब्दीलियों के बारे में मालूम नहीं है, इसलिए जब भी आर्थिक मुद्दों पर बात करते हैं ये लोग, डटकर मुखालफत करते हैं उद्योगपतियों और निजी निवेशकों की। आप के नेता बार-बार बात करते हैं राजनेताओं और उद्योगपतियों द्वारा देश को लूटने की। यही कारण है कि वे जनलोकपाल विधेयक को देश की सभी समस्याओं का समाधान मानते हैं।

आप के घोषणापत्र में जिक्र किया गया है बिजली-पानी और रोटी, कपड़ा व मकान के मुद्दों की, और इनके हल जो पेश किए गए हैं, उन्हें पढ़कर मुझे ऐसा लगता है कि मैं किसी कॉलेज के लड़के का निबंध पढ़ रही हूं। यानी कह तो दिया कि दिल्ली के नागरिकों को बिजली मिलेगी आधे दाम पर और 700 लीटर पानी मिलेगा मुफ्त में हर घर को, लेकिन यह नहीं बताया कि पैसा कहां से आएगा इन नेमतों को हकीकत में तब्दील करने के लिए। घोषणापत्र में वायदा है कि बेहतरीन नए स्कूल और अस्पताल बनाए जाएंगे और झुग्गी-बस्तियों में बनेंगे पक्के मकान, लेकिन इन चीजों के लिए पैसा कैसे आएगा अगर अर्थव्यवस्था में निजी निवेशकों को दूर भगाया जाएगा?

जिस आर्थिक यथार्थ से लगता है, आप के बड़े नेता बिल्कुल अंजान हैं, वह यह कि दुनिया का ऐसा कोई भी देश नहीं है, जहां खुशहाली और समृद्धि आई हो, जब अर्थव्यवस्था की बागडोर पूरी तरह रही है अधिकारियों और राजनेताओं के हाथों में। सोवियत संघ टूटा इसी आर्थिक गलती के कारण, और आज अगर चीन दुनिया के समृद्ध देशों में गिना जाता है, तो इसलिए कि मार्क्सवाद को कूड़ेदान में फेंक दिया गया है

 

- तवलीन सिंह (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

साभारः अमर उजाला