विश्व हिंदी दिवसः एक डोर में सबको जो बांधे, वो हिंदी है

एक डोर में सबको जो है बाँधती, वह हिंदी है।
हर भाषा को सगी बहन जो मानती, वह हिंदी है।

भरी-पूरी हों सभी बोलियां, यही कामना हिंदी है।
गहरी हो पहचान आपसी, यही साधना हिंदी है।

तत्सम, तद्भव, देश विदेशी, सब रंगों को अपनाती,
यही भावना हिंदी है।

दुनिया में कुल 6809 भाषाएं अस्तित्व में हैं। लेकिन इनमें से 90% भाषाओं को बोलने अथवा इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 1 लाख से भी कम है। 10 लाख या उससे अधिक लोगों द्वारा लिखने, पढ़ने, बोलने अथवा समझी जाने वाली भाषाओं की संख्या 150 से 200 के बीच ही है। अकेले भारत में 17 सौ से अधिक भाषाएं और बोलियां हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में 122 मुख्य भाषाएं और 1599 सहयोगी भाषाएं हैं। 30 भाषाएं ऐसी हैं जो 10 लाख से अधिक लोगों के द्वारा संचार (लिखने/पढ़ने/बोलने या समझने) के कार्य में लायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त 122 भाषाएं ऐसी हैं जिनका प्रयोग 10 हजार लोगों के द्वारा किया जाता है। 

दुनिया भर में 60 करोड़ से अधिक लोगों के द्वारा लिखने, पढ़ने व आम-बोल चाल के लिए प्रयुक्त की जाने वाली ‘हिंदी’ भाषा  विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। मैंडरिन (चीनी) और अंग्रेजी का स्थान क्रमशः पहला और दूसरा है। 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी। तब से इस दिन को हिंदी दिवस के तौर पर मनाने की शुरुआत हुई। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए 10 जनवरी 1976 को नागपुर में पहले विश्व हिदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन में 30 राष्ट्रों के 122 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद इस सम्मेलन का आयोजन मॉरिशस, त्रिनिडाड और टोबैगो, अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई देशों में किया गया। वर्ष 2006 में पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने विश्व हिंदी दिवस मनाने की घोषणा की और इसके लिए इसी दिन (10 जनवरी) को चुना। भारत सहित अमेरिका, नेपाल, फिजी, मॉरिशस, दक्षिण अप्रीका, युगांडा, सूरीनाम आदि देशों में बड़ी तादात में लोग हिंदी भाषा का प्रयोग पढ़ने, लिखने अथवा बोलने के लिए करते हैं। 

वर्तमान में हिंदी की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की कर रही है। यहां तक कि अन्य भाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं द्वारा हिंदी पर उन्हें समाप्त किए जाने का आरोप भी लगने लगा है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं था। 80 और 90 के दशक में एक दौर वह भी था जब अंग्रेजी द्वारा हिंदी को निगल लिए जाने का डर पैदा हो गया था।

लेकिन यह अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि कहें कि हिंदी को जीवित रखने में बाजार, वैश्विकरण और बॉलिवुड का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वैश्विकरण जिसे हिंदी सहित अन्य भाषाओं को निगल जाने वाला दानव साबित करने की होड़ मची थी उसी वैश्विकरण ने कम्प्यूटर, इंटरनेट, सैटेलाइट टीवी चैनलों आदि का उपहार दिया। यह उपहार हिंदी के लिए वरदान साबित हुआ। वैश्विकरण ने बाजार और बाजार ने उपभोक्ता संतुष्टि प्रथम के सिद्धांत से परिचय कराया। भूमंडलीकृत उपभोक्ता व्यवस्था के तहत एक ओर यदि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, सेवाओं तथा संसाधनों के मुक्त आदान.प्रदान की छूट मिली है तो दूसरी ओर देश की भाषा के विकास का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। विश्व बाज़ार में हिन्दी यदि बिकती है और यदि उसके प्रयोक्ता है तो भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी का भविष्य काफी उजवल प्रतीत होता है। इस मूलमंत्र के तहत देशी और विदेशी सैटेलाइट टीवी चैनलों ने हिंदी और भारतीयता से ओतप्रोत कार्यक्रमों आदि का निर्माण और प्रसारण शुरु कर दिया।

इस दौरान भारतीय फिल्मों ने भी दुनियाभर में अपनी सृजनात्मकता का डंका बजाया। बाजार के कारण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की पहुंच असीमित निवेश और अत्याधुनिक तकनीकि तक हुई। लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि वे प्रांत और क्षेत्र जो हिंदी के प्रति दोयम भाव रखते थे वहां भी इसे खूब प्रशंसक मिले। लोकप्रियता और यहां मिलने वाले अथाह पैसे ने गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों को भी अपने से जोड़ा और इस प्रकार उनके प्रशंसकों तक जुड़ाव और हिंदी के फैलाव का मौका मिला। आश्चर्य नहीं कि गैर हिंदी भाषी राज्य बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के दर्शक भी शाहरुख खान और सलमान खान के भी उतने ही बड़े प्रशंसक हैं जितने कि दिल्ली, पंजाब और अन्य उत्तर भारतीय प्रदेशों के दर्शक। इसी प्रकार रजनीकांत, नागार्जुन और महेश बाबू अब उत्तर भारत में भी खासे लोकप्रिय हैं।
इंटरनेट, स्मार्टफोन, गूगल की हिंदी सेवा व लगभग सभी वेबसाइटों व ऐप के हिंदी संस्करण ने भी हिंदी को खूब लोकप्रियता दिलायी है। वैश्विक बाजार में भारत की मजबूत स्थिति ने विदेशों में और विदेशियों से भी हिंदी को उचित आदर और सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आजादी.मी