यही है राइट च्वाइस...

‘देर आए, दुरुस्त आए’। यह मुहावरा केंद्र सरकार की सब्सिडी के बदले सीधे बैंक में “कैश ट्रांसफर” योजना पर बिल्कुल सटीक बैठता है। सिर्फ जरूरतमंदों को सब्सिडी का लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई कैश ट्रांसफर योजना अपने प्रायौगिक चरण में ही सकारात्मक परिणाम देने लगी है। बात चाहे राजस्थान के अलवर जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सब्सिडाइज्ड रेट पर कैरोसिन तेल बांटने की जगह सब्सिडी के बराबर की धनराशि सीधे बैंक में जमा करने के कदम की हो या कर्नाटक के मैसूर जिले में गैस सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी के बराबर कैश ट्रांसफर की। दोनों मामलों में जिस तरह के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहें हैं वे काफी उत्साहजनक हैं।

दरअसल, उक्त दोनों इलाकों में कैश ट्रांसफर स्कीम के कारण सब्सिडाइज्ड वस्तुओं की खपत में क्रमशः 40-70 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। राजस्थान के अलवर जिले की कोटकासिम तहसील के बीबीरानी गांव में जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत प्रतिमाह वितरित होने वाले 80 किलोलीटर कैरोसिन तेल की खपत महज 14 किलोलीटर प्रतिमाह तक सिमट गई वहीं कर्नाटक के मैसूर में प्रतिदिन बुक होने वाले सिलेंडरों की संख्या 35 हजार से घटकर मात्र 20 हजार रह गई। कैस ट्रांसफर स्कीम के प्रायौगिक चरण में प्राप्त उक्त आंकड़ों की समीक्षा से जो अर्थ सहज ही निकलते हैं वह यह इस बात की ही तस्दीक करते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से वितरित होने वाली वस्तुओं का एक बड़ा हिस्सा पात्रों की बजाए कालाबाजारियों के पास पहुंचता है।

ये कुछ उदाहरण बताते हैं कि सब्सिडी देने में किस तरह गड़बडिय़ां हो रही हैं। सरकार ढाई लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी हर साल देती है। यह मौटे तौर पर खाद,  खाद्य,  गैस, कैरोसीन, स्कॉलरशिप, बुढ़ापा पेंशन, मनरेगा और स्वास्थ्य बीमा मिशन के तहत दी जाती है। हो यह रहा है कि सरकार के खजाने से तो पूरा पैसा निकल रहा है लेकिन वो जरूरतमंद की जेब में नहीं जा रहा है और जमकर फर्जीवाड़े हो रहे हैं। सरकार अगर तेल, गैस, राशन की चीनी आदि का मूल्य बढ़ाकर सब्सिडी के बोझ को कम करती है तो उसे सियासी नुकसान होता है। जैसा कि हाल ही में डीजल के दाम पांच रुपए बढ़ाने और गैस सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित करने के फैसलों पर उसे देश भर में विरोध झेलना पड़ा लेकिन अगर सरकार आधार कार्ड बना कर सब्सिडी का सीधे कैश ट्रांसफर करती है तो इससे पारदर्शिता आएगी। जरूरतमंद तक लाभ पहुंचेगा और सब्सिडी का बोझ भी अपने आप कम हो सकेगा।

उधर, लोकहित के नाम पर सब्सिडी का भार सभी को उठाना पड़ता है चाहे व्यक्ति उस वस्तु का उपभोग करता हो अथवा नहीं। अब (यूआईडी) आधार कार्ड के कारण पात्रों व अपात्रों के बीच फर्क करने का असंभव सा प्रतीत होने वाला कार्य संभव होने लगा है। वास्तव में होता यह है कि एक व्यक्ति सरकारी मशीनरी की मिलीभगत से एक से अधिक राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, गैस कनेक्शन इत्यादि प्राप्त कर लेता है और न केवल मार्केट में वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा कर देता बल्कि सब्सिडी का भी जमकर दुरूपयोग करता है। उधर, जरूरतमंदों के लिए वस्तुएं या तो उपलब्ध नहीं होती या मजबूरीवश इसके लिए उन्हें ज्यादा मूल्य चुकाना पड़ता है। इस स्थिति से निबटने के लिए प्रस्तावित कैश ट्रांसफर स्कीम के तहत सब्सिडी के बराबर धनराशि सीधे बैंक में जमा कराने की तैयारी है जिसके लिए आधार कार्ड नंबर के आधार पर उपभोक्ता का बैंक अकाउंट खुलवाया जाएगा। इसके अतिरिक्त किसी भी सुविधा को प्राप्त करने के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता शुरू कर देने से आधार कार्ड में दर्ज फिंगर प्रिंट, आंखों की पुतलियों का रिकार्ड आदि दर्ज होने के कारण एक ही व्यक्ति के लिए अलग-अलग नाम से एक से अधिक कार्ड व कनेक्शन लेना संभव नहीं होगा। और तो और एक बार बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर देने के बाद एक व्यक्ति के लिए अलग अलग नाम से बैंक अकाउंट खुलवाना भी संभव नहीं हो सकेगा।

उधर, राशन की दुकान तक सामग्री पहुंचाने का खर्च और अन्य प्रशासनिक खर्चों में भी कमी आएगी। यह लागत भी अच्छी खासी होती है। उदाहरण के लिए, एक किलो गेंहू यदि राशन की दुकान में करीब बीस रुपए का मिलता है लेकिन इसे किसान से खरीदने, एफसीआई के गोदाम में रखने और वहां से राशन की दुकान तक पहुंचाने में करीब इतने ही पैसे खर्च हो जाते हैं। अब आधार कार्ड के आधार पर पैसा बैंक में जमा होने से इस खर्च में भी कमी आएगी। कुल मिलाकर यह एक तरह का गेम चेंजर आइडिया है, जिसके दूरगामी फायदे होने तय हैं। सरकार अपने वोटबैंक को फायदा भी दे पाएगी और उसे दाम बढ़ाने का खतरा भी नहीं उठाना पड़ेगा।

सब्सिडी पर खर्च कम होने पर सरकार बचे हुए पैसे को शिक्षा, स्वास्थ्य सहित अन्य योजनाओं पर पैसा खर्च कर सकती है। इसके अतिरिक्त अब गांव वालों को राशन की दुकान तक भी नहीं जाना होगा और वहां से खाली हाथ लौटना नहीं पड़ेगा। वो बाजार से दाल, गेहूं, चीनी, तेल खरीद सकेंगे। इसके लिए उसके बैंक खाते में सरकार पैसा डालेगी। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। इसके लिए साठ करोड़ जनता के आधार कार्ड बनने हैं, इन सबके बैंक खाते खोले जाने हैं। अभी तक देश में सब्सिडी पाने वालों में से 58 फीसदी के पास ही बैंक खाते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में तो कार्ड बनने का सिलसिला शुरू ही नहीं हुआ है।

अगली जुलाई तक योजना को पूरे देश भर में लागू कर पाना संभव नहीं दिखता लेकिन इस दिशा में जितनी जल्दी आगे बढ़ा जाए, उतना ही फायदा जनता और सरकार दोनो होगा और साथ ही चुनावी फसल भी सरकार काट सकेगी। ब्राजील में ऐसी योजना काफी सफल रही है फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता।

- अविनाश चंद्र