यूआईडी के मायने

केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का एक बड़ा अनुरोध ठुकराए जाने के बाद नंदन नीलेकणी के निर्देशन में काम कर रहा भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) लगातार सवालों के घेरे में आ गया है। एक सवाल यह उठाया जा रहा है कि यूआईडीएआई उन कई वित्तीय निगरानी और नियंत्रणों से बाहर है जो किसी भी सरकार के कामों में लागू होते हैं। हो सकता है ऐसा इसलिए हो क्योंकि इसकी समूची व्यवस्था को सावधानीपूर्वक कुछ इस तरह तैयार किया गया है  कि वह न्यूनतम परेशानियों और कष्टकारी प्रक्रियाओं के साथ काम कर सके।

चूंकि ये सवाल अब उठाए जा रहे हैं जबकि इस संस्था को बने हुए भी कुछ वर्षों का समय बीत गया है तो हो सकता है इसका संबंध सरकार के मौजूदा हालात से भी हो। हो सकता है इससे संबंधित भ्रम ने उन लोगों का हौसला बढ़ाया हो जिन्होंने पहले इसलिए चुप रहना मुनासिब समझा हो क्योंकि इस परियोजना को ताकतवर लोगों का वरदहस्त प्राप्त था और अब वे अपने संदेहों को अधिक मुखर ढंग से उठा रहे हों। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि जो लोग यूआईडीएआई को चला रहे हैं वे ऐसी नियमित वित्तीय जांच प्रक्रिया से गुजरने के अनिच्छुक होंगे जिससे सभी बड़े संस्थानों, चाहे वे निजी हों या सार्वजनिक, को गुजरना पड़ता है। इन्फोसिस के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी नीलेकणी पूरे सोच विचार के साथ इस परियोजना से जुड़े थे और उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि ईष्र्यालु और अधिकारों की श्रेष्ठता के लिए उलझने वाले लोगों से किस तरह निपटा जाए।

कुल मिलाकार देखा जाए तो जो सवाल उठाए जा रहे हैं उनका कोई खास मतलब नहीं बनता। जहां कुछ लोग यह पूछ रहे हैं कि क्या इस परियोजना पर जो धन राशि खर्च की जा रही है यह योजना उसके लायक हैं, वहीं ग्रामीण विकास जैसे कुछ सरकारी विभाग अपनी खुद की बायोमेट्रिक्स आधारित पहचान प्रणाली लाने पर विचार कर रहे हैं। सबसे अधिक उचित परिणाम पाने के लिए होना यही चाहिए कि एक संस्था पहचान प्रणाली पर काम करे जिसे बाद में अलग-अलग योजनाओं में इस्तेमाल में लाया जा सके। इस परियोजना को लेकर पहले दिन से ही निजता का मामला उठाया जा रहा है और नीलेकणी ने भी इसे स्वीकार करते हुए कहा था कि देश को निजता की रक्षा करने के लिए एक नीति की आवश्यकता है।

इस सवाल को एक बार फिर दोहराया जा रहा है। विकसित देशों में दूसरों की पहचान चोरी करने और धोखाधड़ी के कामों में उसका इस्तेमाल होने के मद्देनजर यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि क्या हर किसी के निजी आंकड़ों को एक केंद्रीय व्यवस्था के पास रखना बुद्घिमानी भरा कदम है? बायोमेट्रिक प्रणाली के अचूक होने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। एक ओर जहां पहचान चोरी के जरिए धोखाधड़ी के मामले पश्चिमी देशों में सामने आए हैं वहीं हमारे देश में मुख्य मुद्दा है फर्जी राशन कार्ड के जरिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली में होने वाली धोखाधड़ी। इस बात में कोई शक नहीं है कि हमारे देश में बायोमेट्रिक्स आधारित व्यवस्था परिपूर्ण भले ही न हो लेकिन वह किसी और व्यवस्था की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण सुधार होगी।

इस तरह फर्जीवाड़े से नष्ट होने वाली धनराशि बचेगी जो परियोजना की लागत पर उठाए जा रहे सवालों का जवाब है। हालांकि कुछ वास्तविक संदेह भी हो सकते हैं। इनमें यूआईडी और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बीच संबंध का मामला भी है। इसका लक्ष्य अवैध प्रवासियों की समस्या से निपटना है। जिन लोगों को यूआईडी पसंद है लेकिन रजिस्टर नहीं (इससे कुछ समुदायों को परेशानी हो सकती है) वे लोग तो यही चाहेंगे कि दोनों को अलग रखा जाए।

-- बिजनेस स्टैण्डर्ड