क्या भारत में प्रासंगिक है थैचर का आर्थिक मॉडल - हां

थैचरिज्म सरकार, बाजार व नागरिक संगठनों की उपयुक्त भूमिका वाले दर्शन पर आधारित था। सरकार को केवल उन्हीं कार्यों को करना चाहिए जो बाजार व नागरिक संगठन प्रभावी ढंग से नहीं कर सकते। और मुक्त प्रतियोगिता बाजार का बेहतर नियामक और उपभोक्ताओं का बेहतर संरक्षक है।

लेडी थैचर के क्रांतिकारी सुधारों को उनके उपयोगिताओं और सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण के साथ स्वतंत्र नियामकों जैसे ऑफगैस, ऑफटेल व राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण, ढील और व्यापार का उदारीकरण और विशाल असंख्य नौकरशाही वाले यूरोपिय संघ में शामिल होने की अनिच्छा आदि के दार्शनिक ढांचे द्वारा आसानी से समझा जा सकता है।

पीएसयू का निजीकरण

भारत के संदर्भ में क्या ये विचार आज प्रासंगिक हैं? पीएसयू के निजीकरण से शुरू करते हैं। आंकड़ों में गुम होने और केंद्र सरकार व राज्य सरकार के अधीन के तमाम पीएसयू के बारे में बात करने की बजाए स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड (एसआईएल) जैसे छोटे से पीएसयू के विवरण पर ध्यान केंद्रीत करते हैं।

सरकार ने हाल ही में इसके लिए 2 सौ करोड़ रूपए का पुनरुद्धार पैकेज मंजूर किया है। 2008 से 2012 के दौरान पिछले पांच वर्षों में कंपनी को क्रमशः 22 करोड़, 28 करोड़, 28 करोड़, 17 करोड़ व 20 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। कुल मिलाकर यह घाटा 115 करोड़ का हुआ। कंपनी में 12 सौ कर्मचारी काम करते हैं।

पुनरुद्धार पैकेज

पिछले पांच वर्ष में घाटे और पुनरुद्धार पैकेज का कुल योग 315 करोड़ होता है। इस प्रकार एसआईएल की एक नौकरी देश को 26.25 लाख की पड़ती है। कितने कर्मचारी इतना पैसा लेकर खुशी खुशी सेवानिवृति लेना पसंद करेंगे?

जमीन और उपकरणों आदि को बेचकर कुछ कमाई की जा सकती है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि यह उस नई कंपनी के लिए जगह खाली कर देगी जिसके उत्पादों की उपभोक्ताओं के बीच ज्यादा मांग है। इसके अतिरिक्त, अगले पांच से सात वर्षों के दौरान फिर से पुनरुद्धार पैकेज की आवश्यकता पड़ेगी। क्या यह समझ पाना कि भारत के लिए निजीकरण सही है, इतना कठिन है।  

थैचर का एक और विचार – पीएसयू को बहुजन के लिए बेच दें और उन सेक्टरों के लिए स्वतंत्र नियामकों की स्थापना करें। हम, पीएसयू बेचे बिना पहले से ही इन ओर उन्मुख हैं।

बयानबाजी के गुर

निलामी प्रकरण के बावजूद, यहांतक कि अर्द्ध स्वतंत्र दूरसंचार नियामक ने ऐसे नियमन माहौल का निर्माण किया है जिससे दुनिया मे सबसे सस्ती मोबाइल फोन सेवा भारत में संभव हो सकी। विचार कीजिए, यदि ट्राई पूर्णतया स्वतंत्र हो और स्पेक्ट्रम की निलामी का अधिकार इसके पास हो तो क्या होगा?

पीएसयू राज के अधीन बर्बाद हो रहे कोयला, खनन, तेल और गैस व अन्य संसाधनों के साथ भी ऐसा किया जा सकता है।

थैचर के साथ हिटलर या स्टालिन के साथ सतही तुलना में मत फंसिए। ये वास्तव में उनके सिद्धांतों के सकारात्मक प्रभावों को छिपाने के लिए किए जाने वाले महज बयानबाजी के गुर हैं।

युवा थैचर के विचारों पर एफ. ए. हायक के अनुनायियों द्वारा स्थापित लंदन की एक थिंकटैंक संस्था, द इंस्टिच्यूट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर का गहरा प्रभाव पड़ा। भारत में भी अब हायकियन थिंक टैंक संस्थाएं हैं लेकिन इसे अपनी आयरन लेडी का इंतजार है।

 

- पार्थ जे. शाह (अध्यक्ष, सेंटर फॉर सिविल सोसायटी)

साभारः बिजनेस लाइन

 

Is Thatcher’s economic model relevant to India? - YES

Thatcherism was based on a philosophy of the appropriate role for the state, markets and civil society. The state should undertake only those functions that the market or civil society effectively cannot. And free competition is a better regulator of markets and protector of consumers.

The revolutionary reforms of the Lady Thatcher could be easily understood from this philosophical framework — privatisation of utilities and public sector companies with the establishment of independent regulators such as Ofgas, Oftel and National Rivers Authority; deregulation and trade liberalisation; and reluctance to join the EU, a mammoth unaccountable bureaucracy.

http://www.thehindubusinessline.com/opinion/is-thatchers-economic-model-relevant-to-india-yes/article4610772.ece

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