लीड स्कूल सॉल्युशनः कहानी एक शिक्षक को सबसे अच्छा मित्र देने की

सिंगापुर में सात वर्ष तक प्रवास करने और प्रॉक्टर एंड गैम्बल लिमिटेड में काम करने के बाद दस साल पहले सन् 2007 में मैं भारत लौट आया। भारत में शिक्षा की तस्वीर बदलने की इच्छा मुझमें बलवती हो रही थी क्योंकि हमारे बच्चों को यहां मिलने वाली शिक्षा की खराब गुणवत्ता से मैं बेहद असंतुष्ट था। शिक्षा के प्रारूप को समझने के लिए मैनें भारत की गिनी चुनी लिस्टेड एजुकेशन कंपनियों में से एक – ज़ी लर्न लिमिटेड के साथ मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर पांच वर्ष तक जुड़ा रहा। इससे मुझे शिक्षा के स्कूल और प्री स्कूल वाले प्रारूप के बारे में विस्तृत समझ प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरी पाठचर्या (करिकुलम) तैयार करने व अध्ययन अध्यापन (पेडागॉजी) कला में गहरी रूचि थी और मैनें अपनी टीम के साथ मिलकर छोटे बच्चों की प्रगति और गणित व विज्ञान पढ़ाने व सीखने के लिए नवाचार (इनोवेटिव) युक्त तरीकों को विकसित किया।

पांच वर्ष पूर्व वर्ष 2012 में मुझे यह अहसास हुआ कि मेरा सारा काम केवल बड़े शहरों व उच्च मध्य वर्ग के अभिभावकों तक ही सीमित रह जाता था। इसलिए मैनें ज़ी लर्न को छोड़ दिया और सह संस्थापिका स्मिता देवड़ा के साथ मिलकर गुजरात के एक गांव में पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के लिए स्कूल की स्थापना की। हमारा लक्ष्य ऐसे छात्रों की समस्या का समाधान तलाशना था जिनके लिए न तो वहां अच्छी शिक्षा उपलब्ध थी न ही घर पर उन्हें पढ़ाई में सहयोग करने वाला कोई था। हर किसी के द्वारा हमसे जो सबसे पहला प्रश्न किया जाता था वह यह था कि हमें वहां पढ़ाने के लिए शिक्षक कहां से मिलेंगे? हम अपने अध्यापकों को प्रशिक्षित कैसे करेंगे? हम उन्हें अपने साथ रोक कर कैसे रख सकेंगे?

सभी लोगों के मन में यह आम धारणा थी कि छात्रों के सीखने का सीधा संबंध अध्यापकों द्वारा अपने छात्रों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से होता है। यदि शिक्षक कक्षा में अनुपस्थित रहता है तो बिल्कुल पढ़ाई नहीं हो सकती। यदि शिक्षक उपस्थित रहता है लेकिन कक्षा में पढ़ाता नहीं है तो बहुत थोड़ी पढ़ाई होगी। यदि शिक्षक परंपरागत रट्टा लगवाने वाली पद्धति (अधिकांश शिक्षक इसी वर्ग से आते हैं) से पढ़ाई कराता है तो रटा रटाया ज्ञान मिलेगा। जब शिक्षक अपने स्वयं की सशक्त विषय सामग्री और शिक्षण कौशल का प्रयोग छात्रों को सीखने के उनके स्वयं की प्राथमिकता वाले तरीके जैसे कि श्रव्य, दृश्य अथवा प्रयोगात्मक (कर के सीखना) तरीके से सीखने में सहायता करता है तब जाकर छात्र सुदृढ़ तरीके से शिक्षा ग्रहण कर पाता है। इस प्रकार प्राप्त की गई शिक्षा सदैव याद रहती है और परीक्षा हो जाने के बाद बाहरी दुनिया में इस्तेमाल भी होती है।

दुर्भाग्य से ऐसे शिक्षक बेहद कम और गिनी चुनी संख्या में ही उपलब्ध हैं। जब हमने शिक्षकों की भर्ती करनी शुरू की तो हमें भी इस अभाव से दो चार होना पड़ा। बीए, एमए और बीएड जैसे डिग्री धारक अभ्यर्थी हमारे पास पहुंचते तो लेकिन बमुश्किल वे अंग्रेजी के एक वाक्य को भी बोल पाते। सामान्य विज्ञान की अवधारणाएं और गणित विषय के सामान्य सिद्धांत की उनकी समझ भी बेहद कमजोर थी। शिक्षण की उनकी क्षमता किताबों को पढ़ाने और अनुवाद कर छात्रों को समझाने तक ही सीमित थी। अतः हमने भी वहीं काम किया जो अन्य लोग करते हैं – शिक्षकों का प्रशिक्षित करने का काम।

पहले वर्ष हमने उन्हें पाठ्य सामग्री और अध्याय के बाबत प्रशिक्षित किया, हमने उन्हें लक्ष्य निर्धारित करने के बाबत प्रशिक्षण दिया, हमने क्लास रूम (कक्षा) प्रबंधन, विषय ज्ञान, अध्यापक नेतृत्व आदि का भी प्रशिक्षण दिया। अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के क्रम में हमें अत्यधिक समय और ऊर्जा खर्च करनी पड़ी। लेकिन प्रशिक्षण सत्र के पश्चात इसे लेकर हमें काफी अच्छा फीडबैक भी प्राप्त हुआ। प्रशिक्षण कार्य के दौरान पूरे समय अध्यापक सक्रिय होकर इससे जुड़े रहे और उन्हें कुछ नया और रोचक सीखने को मिला इस मान्यता के समापन के बाद वे खुशी खुशी लौटे।

लेकिन जल्द ही हमें दो और समस्याओं से जूझना पड़ाः
1. प्रशिक्षण के बाद क्लासरूम में यह अभ्यास मूर्त होता कम ही दिखा। हमें अध्यापकों पर कड़ी निगरानी रखने की जरूरत थी ताकि यह सुनिश्चित हो सके वे कक्षाओं में ठीक वैसा ही पढ़ा रहे हैं जैसा कि उन्हें प्रशिक्षण दिया गया था। निगरानी रखने के बावजूद बहुत कम अध्यापक अध्याय योजना तैयार कर रहे थे। बहुत कम अध्यापक संसाधनों की तैयारी करते थे और बहुत कम अध्यापक उन गतिविधियों को अंजाम देते थे जो गतिविधियां उन्हें प्रशिक्षण के दौरान सिखाई गई थीं। जब कारणों की पड़ताल की गई तो जिन कारणों को बताया गया उनमें सबसे अधिक बार समय की कमी की बात बताई गई।
2. इसके साथ ही अध्यापकों के छोड़कर जाने की उच्च दर के कारण हमेशा नए लोगों को प्रशिक्षित करने की जरूरत बनी रहती थी। इस कारण उपलब्ध संसाधन लगातार कम हो रहे थे। अध्यापिकाओं के छोड़कर जाने के बहुत सारे कारणों में से अध्यापिकाओं के पतियों का शहर छोड़कर दूसरी जगह जाना, अध्यापिकाओं का विवाह होना, गर्भवती होना और कई बार कुछ सौ रुपए अधिक वेतन का मिलना होता था। अध्यापिकाओं के जाने का मतलब उनके साथ उनके प्रशिक्षण में हुए निवेश का जाना भी होता था।

संक्षेप में कहें तो, शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का काम दीर्घकालीन और प्रभावी रणनीति नहीं था। हमारा विचार एक मानक मापदंड तय करने और इसे सभी स्कूलों में लागू करने का था लेकिन ऐसे वाकयों के बाद हमें नए दृष्टिकोण से सोचने की जरूरत थी।

काफी सोच विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हम अपने शिक्षकों से काफी ज्यादा अपेक्षा कर रहे थे। हम उनसे विशेषीकृत अवधारणाओं, ब्लूम के वर्गीकरण, विविध बुद्धिमता और छात्र केंद्रीत सीख को समझने की उम्मीद कर रहे थे। हम उनसे उनकी कक्षा से पहले बढ़िया अध्याय योजना और संसाधनों की तैयारी की उम्मीद कर रहे थे। हम उनसे छात्रों के रिजल्ट का विश्लेषण करने और सुधारात्मक कदम उठाने की उम्मीद कर रहे थे। हम उनसे ऐसी अपेक्षा छात्रों की उपस्थिति, डायरियां लिखने, नोटबुक चेक करने और रजिस्टर भरने के काम के अतिरिक्त कर रहे थे। ऐसा उन स्कूलों में तो संभव है जहां अध्यापकों के पास गैर शैक्षणिक कार्यों के लिए पर्याप्त समय होता है, जहां अध्यापक अत्यधिक अभिप्रेरित व सक्षम होते हैं और जहां कक्षा में अध्यापक व छात्रों की संख्या का अनुपात कम होने के कारण उनका भार कम होता है, जबकि अधिकांश स्कूलों में अध्यापकों के पास ऐसा करने का न तो समय होता है न उद्देश्य और न ही यह सब करने की क्षमता होती है।

संक्षेप में कहें तो मरणाधीन व्यक्ति से चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे। उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान करना बहुत कठीन कार्य था, क्योंकि ऐसा करने के लिए अध्यापक को बहुत अधिक काम करना पड़ता है। शिक्षिकाएं प्रायः अपने काम के बोझ को कम करने के लिए किताबों की पाठ्य सामग्री का रट्टा लगवाने जैसे उपायों का रास्ता अपना लेती थीं। हमें कुछ ऐसा काम करने की जरूरत थी जिससे अध्यापक उत्कृष्ट शिक्षण का कार्य आसानी पूर्वक कर सकें। कैसा हो यदि समस्त अध्यापन कला से संबंधित अभ्यास कार्य एक अध्याय योजना में शामिल कर अध्यापकों को उपलब्ध करा दिया जाएं? कैस हो यदि अध्यापकों की जरूरत के सभी संसाधन पहले से डिजाइन कर उन्हें उपलब्ध करा दिए जाएं? यदि अध्यापन का काम आसान हो जाए तो अध्यापक खराब अध्यापन क्यों करेगा? ऐसे खाकों में खींचे गए प्रश्नों के कारण ही हम ‘लीड’ स्कूल सॉल्युशन विकसित कर सकें।

हमने टीचर ऐप नामक ऐप डिजाइन किया जो हाथ में समा सकने वाली (हैड हेल्ड) मशीन के माध्यम से एक्सेस किया जा सकता था। इस ऐप में हमने पाठ्यचर्या (करिकुलम) में समाहित विस्तृत पाठ्य सामग्री सम्मिलित कर दी। शिक्षिकाओं ने इस बाबत फीडबैक देते हुए इस योजना को शानदार तो बताया लेकिन उनका यह भी कहना था कि योजना को मूर्त रूप देने के लिए संसाधन तलाशने और इकट्ठा करने में उन्हें बहुत समय बिताना पड़ता है। उसके बाद उन्हें सामग्री (डेटा) को कम्प्यूटर अथवा प्रोजेक्टर में ट्रांसफर करने के लिए पेन ड्राइव्स की आवश्यकता पड़ती थी। इससे मनमुटाव की सी स्थिति पैदा होने लगी जिससे योजना का पालन कम होने लगे। इसलिए हमने अब टीचर ऐप को अपग्रेड किया और सभी श्रव्य दृश्य (ऑडियो विजुअल) सामग्री को उसी में समाहित कर दिया। साथ ही हमने सभी आवश्यक भौतिक संसाधनों से युक्त एक स्कूल किट डिजाइन किया और इसे शिक्षकों को भेजा ताकि इसके लिए उन्हें खोजबीन और अलग से तैयारी करने की जरूरत न पड़े। 

और चूंकि राष्ट्रीय प्रकाशकों की किताबें हमारे छात्रों के लिए उपयुक्त नहीं थीं, इसलिए हमने एनसीईआरटी के खाके को ध्यान में रखते हुए अपने स्वयं के पाठ्य और कार्य पुस्तकों (वर्कबुक) को तैयार किया। इस काम में हमें 3 साल लग गए लेकिन अंततः, लीड स्कूल सॉल्युशन ने शिक्षकों के लिए उत्कृष्ट शिक्षण का कार्य करना सरल बना ही दिया। अब शिक्षकों को और अधिक की चाहत होने लगी थी क्योंकि उन्होंने प्रौद्योगिकी और केंद्रीकृत डिजाइन के फायदों को देख लिया था। पुनः आगे मिली प्रतिक्रिया (फीडबैक) के आधार पर, हमने ऐप के माध्यम से डेटा के मूल्यांकन कार्य कैप्चर किया और ऐप के जरिए इसकी समीक्षा करते हुए डेटा के आधार पर किए जाने वाले उपचारात्मक योजनाएं तैयार की।

अब विस्तृत गणना के लिए माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल की सहायता लेने की कोई ज़रूरत नहीं थी! हमने लीड टीचर ऐप में अध्यापकों की उपस्थिति का डेटा कैप्चर करने के फीचर को भी सक्रिय कर दिया जिससे अब अलग रजिस्टरों को बनाए रखने की कोई जरूरत नहीं थी! और अंत में, माता-पिता को समान साझेदारों के रूप में शामिल करने के लिए, हमने एक लीड पेरेंट ऐप भी विकसित किया। संदेशों के सभी आदान प्रदान और सूचनाएं अब डिजिटल रूप से भेजी जा सकती हैं। शिक्षकों को अब 35 डायरी भरने की कोई जरूरत नहीं है! धीरे-धीरे, 4 वर्षों में, हमने एक लीड स्कूल सॉल्युशन तैयार किया जो व्यापक और सभी हितधारकों के लिए तैयार था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने शिक्षकों के कार्य को आसान बनाया और उन्हें अपने मुख्य काम – उत्कृष्ट शिक्षण, पर ध्यान देने की आजादी दी!

इस पहल के परिणाम आश्चर्यजनक थे! वहीं स्थानीय शिक्षक जो पहले व्याख्यान विधि (लेक्चर मेथड) से रट्टा मारने वाली पढ़ाई करा रहे थे, लीड ऐप का प्रयोग कर बेहतर शिक्षक बन गए। छात्रों के सीखने की क्षमता में भी सुधार हुआ। हमारे स्कूलों के छात्रों ने अंग्रेजी साक्षरता के क्षेत्र सिर्फ एक साल में 1.6 साल में हासिल की जाने वाली वृद्धि प्राप्त कर दिखाई। गणित में, क्लास की औसत प्रगति एक वर्ष में 51% से बढ़कर 63% हो गई है। इन सबके बाबत शिक्षिकाओं की टिप्पणी थी कि उत्कृष्ट तरीके से सिखाने का काम कितना आसान हो गया?

उनकी कक्षाएं अब बहुत अधिक संलग्न (इंगेज्ड) हो गई थीं और वे अपने छात्रों को सीखता देख बहुत खुश थीं। स्कूलों के पास भी पहले से बेहतर डेटा था। वे देख सकते हैं कि कौन सा क्लास अच्छा कर रहा था और छात्रों के परिणामों (रिजल्ट) के आधार पर कौन सी शिक्षिका अच्छी तरह से शिक्षण कर रही थी। इसके बाद हमारा कुछ प्रशिक्षण कार्य उन शिक्षिकाओं पर केंद्रीत हो गया जिनके छात्रों के परिणाम ठीक नहीं थे और जिन क्षेत्रों में उन्हें सहायता की आवश्यकता थी। माता-पिता खुश थे क्योंकि उन्हें अब नियमित नोटिफिकेशन के माध्यम से पता चल जाता था कि उनके बच्चे क्या सीख रहे थे। स्कूल प्रणाली में समग्र सुधार हुआ।

इसके पश्चात हमने और अधिक लीड स्कूल्स खोले और वहां भी लीड स्कूल सॉल्युशन लागू किया। हमने कुछ सहयोगी स्कूलों को भी यह सेवा दी ताकि उनके परिणाम भी देख सकें। हमारे और सहयोगी स्कूलों दोनों में बच्चों के सीखने और शिक्षकों के संतुष्टी हमारे पहले स्कूल के जैसे ही अच्छी थी। इन परिणामों ने हमें यह भरोसा दिलाया कि यदि शिक्षकों को सही उपकरण और सही समाधानों के साथ शसक्त बनाया जाए तो वे अपने छात्रों के साथ चमत्कार कर सकते हैं। अब हम दिल्ली के सरकारी स्कूलों व महाराष्ट्र, गुजरात व अन्य राज्यों के बजट स्कूलों में छात्रों के सीखने के स्तर को सुधारने के लिए लीड स्कूल सॉल्युशन लागू कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य सभी बच्चों को उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान कराना है और हम उत्सुकता पूर्वक समान सोच वाले शिक्षाविदों और स्कूल लीडर्स की तलाश कर रहे हैं ताकि इस उद्देश्य में सहयोगी बन सकें।

- सुमीत यशपाल मेहता (प्रबंध निदेशक, लीड स्कूल)