स्किल डेवलेपमेंट: नीतिगत सुधारों से सफलता की उम्मीद

स्किल डेवलपमेंट अर्थात् कौशल विकास वर्तमान दौर में एक वैश्विक मुद्दा बन चुका है। इसमें कोई शक नही कि तकनीक के इस दौर में दुनिया को स्किल्ड लोगों की जबरदस्त मांग है। दुनिया उन देशों की तरफ देख रही है जहाँ युवाओं की संख्या ज्यादा है और वे युवा वर्तमान दौर के हिसाब से कौशलयुक्त हैं। इस लिहाज से सोचा जाय तो भारत एक संभावनाओं का देश है क्योंकि यहाँ की पैसठ फीसद आबादी पैंतीस साल से कम आयु की है। लिहाजा युवाओं को स्किल्ड बनाने की चुनौती और दुनिया की अपेक्षाओं के अनुरूप युवाशक्ति तैयार करने का दबाव भी भारत पर है। अब सवाल है कि क्या हम अपने प्रयासों से अबतक दुनिया अथवा अपनी जरूरतों के अनुरूप स्किल्ड लोग तैयार कर पाने में सफल हो रहे हैं? भारत के लिहाज से देखें तो स्किल डेवेलपमेंट अर्थात् कौशल विकास शब्द पिछले कुछ वर्षों से चर्चा में है।

गत संप्रग सरकार द्वारा कौशल विकास का लक्ष्य रखते हुए नेशनल स्किल डेवलेपमेंट कारपोरेशन के तहत युवाओं के कौशल विकास का यह कार्यक्रम चलाया गया था। पहली बार १६ अगस्त २०१३ तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा जब इस योजना का शुभारम्भ किया गया तब इसके तहत दस लाख युवाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था। इसमें कॉल सेंटर ट्रेनिंग, रिटेल मैनेजमेंट सहित कुल ११ अलग-अलग किस्म के शार्ट टर्म स्किल डेवलपमेंट कोर्सेस शुरू किए गए थे। इस योजना के तहत शुरुआत में दस लाख युवाओं को 'स्किल्ड' बनाने का लक्ष्य रखा गया था जबकि इसके लिए कुल १ हजार करोंड़ रूपये का बजटीय प्रावधान था। इस स्कीम को STAR यानी स्टैंडर्ड ट्रेनिंग एसेसमेंट एंड रिवार्ड का ब्रांड नाम दिया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के सफलता पूर्वक संपन्न कर लेने पर प्रशिक्षुओं के खाते में कुछ धनराशि जमा कराने का प्रावधान भी था। योजना के शुरुआती कुछ महीनों के भीतर ही १ लाख से ज्यादा युवाओं ने कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम में पंजीकरण कराया जबकि प्रशिक्षण कार्यक्रम में सफल रहने वाले प्रशिक्षुओं के खाते में लगभग १ करोंड़ ४० लाख की अवार्ड राशि जमा करायी गई। 

उपरोक्त तथ्यों को रखने के पीछे मकसद यह बताना था कि इस स्कीम को लाने और इसे लागू करने के बाद इसकी सफलता और असफलता का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर कर लिया गया कि कितने लोगों ने पंजीकरण कराया और कितनों को अवार्ड राशि एवं प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। हालांकि इन आंकड़ों की मदद से किसी युवा के 'स्किल्ड' होने और इन प्रशिक्षणों के आधार पर कितने स्किल्ड युवा रोजगार प्राप्त कर सके हैं, इसका सटीक मूल्यांकन नही हुआ। दरअसल प्रयोग के तौर तत्कालीन सरकार द्वारा जिस प्रणाली से लोगों के कौशल विकास का यह योजना बनाई गयी वो यथार्थ के धरातल पर कारगर होने की बजाय संस्थानों के भ्रष्टाचार और कागजी खानापूर्ती की भेंट चढ़ गयी। स्किल डेवलपमेंट स्कीम योजना लागू होने की देर थी कि दिल्ली सहित तमाम शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में निजी ट्रेनिंग सेंटर्स इस काम में लग गये। सही ढंग से प्रशिक्षण देने की बजाय उन्होंने धडल्ले से आधार-कार्ड के आधार पर इनरोलमेंट कराना शुरू कर दिया। अवार्ड के लिए तय राशि जो संभवत: तब ९ या १२ हजार के आसपास थी, में से कुछ हजार अथवा दो हजार इनरोलमेंट कराने वाले के खाते में देकर बाकी में बन्दर बाँट शुरू हो गयी।

ट्रेनिंग दी जा रही है कि नही इसका वास्तविक मूल्यांकन करने में सरकार पूरी तरह असफल रही और कागजों में भारी संख्या में स्किल्ड लोगों का नाम दर्ज हो गया। जबकि सच्चाई यह है कि अगर ईमानदारी से तबके इनरोल्ड लोगों की पड़ताल की जाय तो भारी संख्या में ऐसे युवा मिलेंगे जिन्हें पता ही नही कि उन्हें यह प्रमाण-पत्र क्यों मिला? अभी तक सही मायने में इसका भी मूल्यांकन ठीक ढंग से नही हो पाया है कि उस दौरान जिन लोगों को स्किल्ड होने का अवार्ड और प्रमाण-पत्र दिया गया उनमे से कितने उस प्रशिक्षण के आधार पर रोजगार हासिल कर पाने में सफल रहे? खैर, यह तबकी समस्या थी। चूँकि कौशल विकास के जिन उद्देश्यों के साथ इस योजना को लाया गया वो बीच-बिचौलियों की आपसी साझेदारी में कागजों की योजना बन कर रह गयी। बाद में भाजपा-नीत केंद्र सरकार के आने के बाद सरकार ने इस समस्या को समझा और इनरोलमेंट के नियामकों और मूल्यांकन आदि की प्रणाली को सख्त कर दिया। सरकार द्वारा उठाये गये इस कदम स्किल बनाने के नाम पर जो भ्रष्टाचार फल-फूल रहा था वह तो समाप्त हो गया, लेकिन अधिक से अधिक कौशल युक्त युवाओं को तैयार करने एवं उन्हें उनकी रूचि के हिसाब से प्रशिक्षित करने के लिए कुछ कदम और उठाने होंगे। मसलन सरकार को अभ्यर्थी और स्कीम के बीच से बिचौलियों की भूमिका में खड़े तमाम संस्थानों को समाप्त करना होगा। इसके लिए जरुरी है कि इस पूरे मामले से अवार्ड और कैश देने का सिस्टम बदला जाय। इस पर सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा वाउचर सिस्टम का एक फार्मूला प्रयोग के तौर पर महाराष्ट्र में आजमाया गया है, जो तय लक्ष्यों को हासिल करने में सबसे आदर्श तरीका साबित हुआ है। यह वाउचर प्रणाली मिल्टन फ्रीडमैन की स्कूल च्वाइस की अवधारणा पर आधारित है। सरकार को इस प्रणाली के माध्यम से इस स्किल डेवलेपमेंट कार्यक्रम को चलाना चाहिए।

कैसे मिलेगी सफलता?
मिल्टन फ्रीडमैन की वाउचर प्रणाली के आधार पर कौशल विकास कार्यक्रम को लागू किया जाय तो क्या इसकी खामियों को दूर किया जा सकता है? इस सवाल पर विचार किया जाना चाहिए! इसबात पर विचार होना चाहिए कि प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से अवार्ड राशि देने की बजाय सीधे उतनी राशि का वाउचर चयनित युवाओं को दे दिया जाय तो संभव है सही मायनों में स्किल डेवलेपमेंट के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। इस कैश वाउचर के तहत ये प्रावधान हो कि इसे सिर्फ और सिर्फ प्रशिक्षण संस्थान ही इसे कैश करा सकें। अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जिस अभ्यर्थी को प्रशिक्षण लेना है वह अपने इच्छा के अनुरूप कोर्स चयन एवं संस्थान चयन कर सकता है। दूसरा फायदा होगा कि तमाम संस्थान छात्रों को आकर्षित करने के लिए गुणवत्ता को प्राथमिकता देंगे। तीसरा बड़ा फायदा यह होगा कि इसमें भ्रष्टाचार बिलकुल संभव नही होगा। ऐसा नही है कि भारत में इस प्रणाली पर प्रयोग नही हुए हैं। थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा महाराष्ट्र में तीन वर्षों तक एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। यह प्रोजेक्ट महाराष्ट्र सरकार के सहयोग से चलाया गया था।

प्रोजेक्ट के तहत लगभग 5 हजार युवाओं और जरूरतमंदों की विशेषज्ञों के द्वारा काउंसलिंग कराई गई। काउंसलिंग के दौरान इच्छुक युवाओं को उनकी शैक्षणिक योग्यता, रूचि और भविष्य में पैदा होने वाले रोजगार के अवसरों के बाबत विस्तार से बताया गया। 'विकल्प' नामक इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे सीसीएस के एसोसिएट डाइरेक्टर गौरव अरोड़ा ने बताया कि मुंबई व पुणे के 1800 एससी/एसटी व 200 सामान्य वर्ग के जरुरतमंद युवाओं का चयन किया गया। चयनित युवाओं को उनके मनपसंद पाठ्यक्रमों में दाखिला दिलाया गया। प्रशिक्षण शुल्क की धनराशि सीधे लाभार्थियों को वाउचर के माध्यम से प्रदान की गई जिसे सिर्फ प्रशिक्षण संस्थान ही कैश करा सकते थे। गौरव के मुताबिक वाउचर के इस्तेमाल के कारण अभ्यर्थियों को मनपसंद संस्थानों और पाठ्यक्रमों को चुनने की आजादी मिली। पैसे के दुरुपयोग को रोकने में सफलता मिली। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के लिए चुने गए 2000 छात्रों में से पाठ्यक्रम को बीच में छोड़ने वाले युवाओं की तादात सिर्फ 9.5% रही। जबकि 60% युवाओं ने प्रशिक्षण हासिल करने के बाद आईटी, बैंकिंग, ट्रैवेल एंड टूरिज्म, ऑटो मोबाइल, रिटेल व निर्माण के क्षेत्र में नौकरी हासिल करने में सफलता प्राप्त की। गौरव के मुताबिक यदि सरकार प्रशिक्षण संस्थाओं के स्थान पर शुल्क राशि सीधे अभ्यर्थियों को वाउचर के माध्यम से उपलब्ध कराए तो प्रशिक्षण संस्थानों के मध्य प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी। परिणाम स्वरूप गुणवत्ता युक्त पाठ्यक्रम, स्वस्थ माहौल, कैंपस प्लेसमेंट आदि जैसी सुहूलियतें भी प्रशिक्षुओं को प्राप्त होने लगेगी।

इस ढंग से प्रयोग अवश्य होने चाहिए और व्यापक स्तर पर इनको लागू किया जाना चाहिए। सरकार अगर नीतिगत बदलाव से वाउचर प्रणाली को अपने स्कीम में जोड़े तो शायद जो खामियां इस योजना की अधिकतम सफलता में आड़े आ रही हैं, वो दूर हों। सीसीएस के यह आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस पूरी योजना से सीधा कैश हटाकर और युवाओं को जब उनके मनपसन्द कोर्सेज का विकल्प दिया गया तो भ्रष्टाचार की स्थिति नगण्य नजर आई जबकि गुणवत्ता और लक्ष्यों को अत्यधिक हासिल किया गया। हमें समझना होगा कि 'स्किल' किसी डिग्री की मोहताज नही होती, यह जरुर है कि संस्थानों में मानकीकरण की अहर्ता के लिए एक प्रमाण-पत्र का होना जरुरी है।

- शिवानंद द्विवेदी (लेखक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं)
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं)

शिवानंद दिवेदी