स्कूल वाउचर से आएगा शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका से 70 किलोमीटर दूर एक गांव में रहने वाली फातिमा आम बच्चों की तरह ही है। कक्षा 10 में पढ़ने वाली फातिमा एक कपड़ा मजदूर की बेटी है। उसके वालिद की इतनी हैसियत नहीं कि उसकी पढ़ाई का खर्चा उठा सके। बावजूद इसके फातिमा पिछले दस सालों से हर रोज मुस्कुराते हुए स्कूल जाती है। उसकी पढ़ाई वहां की सरकार की वाउचर प्रणाली के कारण मजे से चल रही है। उसे हर महीने 36 डॉलर यानी 2800 टका वहां की करेंसी में मिलते हैं। उसकी पढ़ाई पर जो खर्च आता है उसे बांग्लादेश सरकार सीधे उसके बैंक खाते में डाल देती है। 

1993 में शुरू हुए बांग्लादेश फीमेल सैकेंडरी स्कूल असिस्टैंस प्रोजेक्ट के तहत लड़कियों को सीधे वाउचर प्रणाली से पैसा दिया जा रहा है। इसके तहत बांग्लादेश के 118 जिलों में कक्षा 6 में दाखिला लेने वाली छात्राओं को 12 डॉलर यानी करीब 936 टका से कक्षा 10 तक 2800 टका दिए जा रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से वहां की शिक्षा व्यवस्था पर जबरदस्त सकारात्मक असर पड़ा है। इससे वहां स्कूलों का खर्च तो घटा ही है, साथ ही बांग्लादेश जैसे विकासशील मुल्क में महिला साक्षरता दर भी बढ़ी है। गरीबी के कारण बांग्लादेश के दो तिहाई लड़कियों शिक्षा नहीं ले पाती थीं। वहां की सरकार पैसा तो खर्च करती थी लेकिन वो स्कूलों में इन छात्र-छात्राओं तक पहुंच नहीं पाता था। इस योजना के चार साल बाद 1997 में स्कूल जाने वाली लड़कियों की दर 42 प्रतिशत से बढकर 52 फीसदी हो गई है। ये एक पंथ दो काज जैसा है। शिक्षा के साथ देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में वहां लड़कियों की भागीदारी बढ़ रही है। 

अब सवाल ये है कि जब बांग्लादेश में ये योजना सफल हो सकती है तो भारत में क्यों नहीं? बांग्लादेश के मुकाबले भारत की आर्थिक स्थिति कहीं ज्यादा मजबूत है लेकिन सामाजिक ताना बाना एक सा है। भारत में शिक्षा का अधिकार लागू के बाद इस क्षेत्र में सरकार कई सुधार कर रही है। इस दिशा मे एक क्रांतिकारी बदलाव ये भी हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक मौजूदा समय में सरकार सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हर एक छात्र पर करीब 1700 रुपये खर्च करती है। इतना खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूलों में शिक्षा का क्या स्तर है ये किसी से छिपा नहीं है। पहले तो बच्चे स्कूल नहीं आते। बच्चे आते हैं तो टीचर गायब हो जाते हैं। इन सबसे निपटने का उपाय है वाउचर प्रणाली।

वाउचर प्रणाली के तहत सरकार स्कूलों को कोई अनुदान ना देकर सीधे रकम गरीब बच्चों को शिक्षा वाउचर के रूप में दे। स्कूल वाले इस वाउचर को इनकैश करें। इससे स्कूल भी अच्छी तरह से छात्रों को पढ़ाएंगे। हमारे देश में स्कूल की जवाबदेही छात्रों के प्रति नहीं होती। बच्चे आएं तो सही ना आए तो सही। स्कूल वाले अफसरों के प्रति जवाबदेह होते हैं क्योंकि सरकारी पैसा उनसे होता हुआ आता है। वो अफसरों को खुश करने में लगे रहते हैं इससे सरकारी पैसे की तो बर्बादी होती ही है, शिक्षा का स्तर भी गिरता है। वाउचर के जरिये छात्र अपने मुताबिक जहां चाहे शिक्षा हासिल कर सकता है। छात्र इस वाउचर को स्कूल को देगा और स्कूल उसे अपने खाते में डाल कैश करा सकेगा। ये वाउचर छात्र के हाथ से होता हुआ स्कूल और फिर सरकार तक पहुंचेगा। इससे न केवल स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही बढ़ेगी जबकि गुणवत्ता में सुधार होगा।

ताज्जुब ये है कि तीसरी दुनिया के कई देश 35 सालों से ज्यादा इस योजना को सफलता पूर्वक चला रहे हैं। मिसाल के तौर पर दक्षिणी अमेरिकी देश चिली। चिली में ये योजना 1980 से चल रही है। इस योजना से पहले प्राइवेट स्कूलों में छात्रों की भागीदारी महज 14 फीसदी थी जो बढ़कर 30.4 फीसदी पहुंच गई है। वहीं सैंकेंडरी स्कूलों में 15.9 फीसदी जाते थे जो अब बढ़कर 40.8 फीसदी हो गये है। चिली से कुछ दूर कोलंबिया और सैंट्रल अमेरिकी देश ग्वाटेमाला और कोट डी आइवरी ऐसे मुल्क हैं जिन्होंने वाउचर प्रणाली को अपनाकर अपनी शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कर लिया है।

यूरोपीय देशों में स्वीडन, हॉलैंड, ग्रेट ब्रिटेन, चेक गणराज्य के साथ न्यूजीलैंड ऐसे देश हैं जहां वाउचर प्रणाली से शिक्षा पर खर्च होने वाला पैसा बिना लीकेज के छात्रों तक पहुंच रहा है। लिहाजा हमारी सरकार भी इस दिशा में कदम बढ़ाती है तो ये हमारी शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव होगा।

- आजादी.मी के लिए नवीन पाल
(लेखक टीवी पत्रकार हैं)