तार्किकता एवं राजनैतिक अर्थव्यवस्था

अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि सभी मनुष्य तार्किक होते हैं अर्थात् वे हानि की अपेक्षा लाभ पसन्द करते हैं तथा तार्किक रूप से स्व-हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। राजनीति विज्ञान में अधिकाँशतः गलत रुप से यह माना जाता है कि राजनैतिक बाज़ार के सभी अभिनेता अर्थात् राजनेता एवं नौकरशाह, निस्वार्थ भाव से जनहित के लिए प्रयासरत रहते हैं।

राजनैतिक अर्थशास्त्र या लोक-चयन सिद्धान्त वह सिद्धान्त है जो अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान में शामिल करता है। अर्थशास्त्र में हम यह मानते हैं कि बाजार में मौजूद सभी पक्ष (व्यक्ति) तार्किक हैं तथा स्वहित के लिए प्रयासरत हैं। यदि हम इस मान्यता को राजनीति विज्ञान में प्रयुक्त करें और मान लें कि राजनैतिक बाजार के सभी पक्ष (व्यक्ति) भी स्व-हित के लिए कार्य कर रहे हैं, तो क्या होगा? परिणाम प्रदर्शित करते हैं कि-

  • राजनीतिज्ञ पुनर्मतदान के लिए प्रयासरत रहते हैं
  • नौकरशाह बजट के बढ़ाने हेतु प्रयासरत रहते हैं
  • और मतदाता तथा विशेष रुचि वाले समूह निःशुल्क हिस्से (दलाली) प्राप्त करने हेतु प्रयासरत रहते हैं

यहां यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि वे सभी भ्रष्ट हैं। लोक चयन सिद्धान्त केवल यह मानता है कि वे सभी स्व-हित में कार्य करेंगे और इस आधार पर पूर्व-कथन करने का प्रयास करता है। यदि, मानव व्यवहार के ये पूर्व कथन राजनैतिक बाज़ार में सही सिद्ध होते हैं तो इसका मतलब है कि सिद्धान्त सही है। यहाँ यह मतलब भी नहीं है कि मनुष्यों को हमेशा स्वार्थी होना चाहिए। यह एक मान्यता है न कि स्वार्थी होने की सलाह।

यदि हमारी नियोजित अर्थव्यवस्था ऐसी नीतियों के लिए प्रयासरत हो जिनसे अधिकतम राजस्व का लाभ हो तो इसे तर्कसंगत कहा जा सकता है। क्या हमारी सरकार सार्वजनिक धन को इस प्रकार निवेशित करती है कि इससे राजस्व में वृद्धि हो? दूसरे शब्दों में क्या हमारे प्रधानमन्त्री हमारे धन को इस प्रकार निवेशित करते हैं कि कर द्वारा ज्यादा से ज्यादा कमाया जा सके?

यहाँ अफगान सिपाही शेरशाह सूरी, जिसने भारत को तलवार के बल पर जीता, को याद करना प्रासंगिक है, क्योंकि उसने इसी मंशा से शासन किया कि अधिकतम संभव कर व राजस्व वसूल सके। उसने सड़कें व सराय बनवाईं (जी.टी.रोड उसी के द्वारा बनवाई गई) ताकि इनसे व्यापार को प्रोत्साहन मिल सके और वह व्यापारियों से कर वसूल सके।

हमारे समाजवादी प्रधानमन्त्री ने कभी भी यह भरोसा नहीं किया कि सभी लोग व्यापार कर सकते हैं या फिर यों कह सकते हैं कि उनके हिसाब से सभी लोग व्यापार करने में सक्षम नहीं हैं। बजाय प्रोत्साहन के उन्होंने व्यापार को प्रतिबंधित किया ताकि औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया जा सके। इसे, आजकल की व्यवस्था में अंतरग-मित्रवाद (क्रोनीईज्म) कहते हैं। यह एक ऐसी राजनैतिक अर्थव्यवस्था है जिसमें कुछ गिने चुने (राजनैतिक रूप से चुने हुए) व्यवसायी आन्तरिक बाज़ार पर कब्जा कर लेते हैं और सरकार की ताकत की मदद से, बाहरी प्रतियोगी ताकतों को दूर रखते हैं।

सरकार ने सार्वजनिक धन को निजी सम्पत्तियों में निवेश किया है। उन्होंने कर से प्राप्त धन को कार बनाने में निवेशित किया है। उन्होंने सड़कों के निर्माण में धन निवेशित नहीं किया है और न ही निजी व्यापारियों को कार बेचने की अनुमति दी है। वे इसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं। वास्तव में यह मिश्रित (घालमेल वाली) अर्थव्यवस्था है। और यह बिल्कुल निरर्थक है।
समाजवादी तार्किक नहीं हैं। जिस तरीके से हम सार्वजनिक धन को निवेशित करते हैं, उसे बदलने की आवश्यकता है। सड़कों को सर्वोच्च वरीयता मिलनी चाहिए क्योंकि वह सार्वजनिक सम्पत्ति हैं। हालाँकि पथ कर (टोल) युक्त राजमार्ग व तीव्रगामी मार्ग इत्यादि निजी सम्पत्ति हो सकते हैं, इसलिए इनमें निजी निवेश को प्रोत्साहित करना बेहतर होगा।

सार्वजनिक धन को शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वोत्तम सड़कें बनाने में लगाने की आवश्यकता है। इसी से भारत सम्पन्न बनेगा। इस प्रकार दूर-दराज के इलाकों में अलग-अलग पड़े हुए गरीब गाँव भी शहरी आधुनिकीकरण व प्रभावी अर्थव्यवस्था से जुड जायेंगे। आज इस तथाकथित ग्रामीण विकास के पचास वर्षों के बाद भी ग्रामीण भारत, शहरी भारत से भली प्रकार जुड़ा नहीं है और इसीलिए गरीब है। जैसा कि अरून्धती राय कहती हैं - भारत अपने गाँवों में बसता नहीं है वरन् भारत अपने गांवों में दम तोड़ता है। यदि भारत इस तथाकथित ग्रामीण विकास को त्यागकर अन्तर्संयोजन अर्थात् विभिन्न क्षेत्रों को आपस में जोड़ने के लक्ष्य को केन्द्र में रखकर, तीव्र शहरीकरण के लिए प्रयास करे तो विभिन्न शहर एवं कस्बे विकसित होंगे। इस प्रकार ज्यादा से ज्यादा सड़कें बनेंगी और हम सभी चैड़ी सड़कों के किनारे बड़े मकानों में रह सकेंगे।

ध्यान रहे (और इसे बार-बार दोहराने की आवश्यकता है) कि जापान, पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम तथा हालैण्ड का जनसंख्या घनत्व (प्रतिवर्ग किलोमीटर में व्यक्तियों की संख्या) भारत से ज्यादा है। परन्तु वहां हमारी तरह, शहरों में आवश्यकता से अधिक भीड़ की समस्या नहीं है। वहाँ शहरी सम्पत्ति की कीमतें भी कम हैं। भारत के शहरों में अत्यधिक भीड़ एवं आसमान छूते दामों की समस्या जनसंख्या समस्या के कारण नहीं है, बल्कि यह सड़कों की कमी के कारण है। भारत एक विशाल देश है। कभी रेलगाड़ी या वायुयान से यात्रा करें तो आप मीलों लम्बी खाली जगहें पायेंगे, जहाँ कि कोई मकान नहीं है। इस जगह को मनुष्यों के निवास के लिए विकसित व निर्मित करना चाहिए और इन विकसित स्थानों को परिवहनीय व्यवस्था से जोड़ने का मुख्य साधन सड़कें हैं। जैसे ही हम किसी शहर क को गाँव ख से अच्छी सड़क या ट्राम-वे के द्वारा जोड़ते हैं, तुरन्त ही शहर के लोगों को रहने के लिए और जगह मिल जाती है। शहर के मध्य में जमीन की कीमतों में गिरावट आयेगी और ज़्यादातर लोग शहर से थोड़ा बाहर की ओर आकर बसेंगे तथा वहीं से अपने कार्यों को सम्पादित करेंगे।

इस प्रकार हम गैर-तार्किक सरकार से पीड़ित हैं। हमारी समाजवादी सरकार, धन को, बिना वैज्ञानिक सोच के, मूर्खतापूर्ण तरीके से खर्च करती है और यह सरकार की, लोगों के बारे में, गलत सोच का परिणाम है। सरकार मनुष्यों की स्वाभाविक आर्थिक प्रवृत्ति में विश्वास नहीं करती ।

- सौविक चक्रवर्ती
सीसीएस द्वारा प्रकाशित 'उदारवादः राज, समाज और बाजार का नया पाठ' से उद्धृत
http://ccs.in/sites/all/books/com_books/book-udarwad.pdf