कुलपति की नियुक्ति

शिक्षा में गुणवत्ता की गिरावट चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय ज्ञान तथा नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित किए जाते हैं। यहां नई पीढ़ी को तैयार किया जाता है। कोई भी संस्था या विश्वविद्यालय किस ऊंचाई तक अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा सकता है तथा युवा प्रतिभा का विकास कर सकता है इसमें कुलपति द्वारा प्रदत्त शैक्षिक, नैतिक तथा बौद्धिक नेतृत्व सबसे महत्वपूर्ण होता है। हाल ही में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्राध्यापकों ने एक अपील की है कि नया कुलपति किसी विद्वान, अकादमिक तथा लब्धप्रतिष्ठित व्यक्ति को बनाया जाए, जो स्वयं के कार्य तथा लगन से अन्य को प्रोत्साहित कर सके। आखिर जामिया के प्राध्यापकों को यह अपील करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? इसे समझने के लिए एक निगाह बिहार के विश्वविद्यालयों पर डालनी होगी। वहां 11 विश्वविद्यालयों में राज्यपाल द्वारा कुलपति अथवा प्रतिकुलपति की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला गया है। यहां जो नियुक्तियां दो वर्ष पहले की गई थीं उन्हें लेकर राज्य सरकार तथा राज्यपाल के बीच संघर्ष लगातार चलता रहा। सरकार की शिकायत थी कि उससे परामर्श नहीं किया गया जबकि राज्यपाल ने कहा अपेक्षित सलाह-मशविरा किया गया था। अंतत: मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा जहां राज्यपाल द्वारा की गई नियुक्तियां रद कर दी गईं। अब नई नियुक्तियों की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है।

अधिकांश चयन समितियों को बड़ी शालीनता से एक-दो नाम बता दिए जाते हैं जिन्हें प्रस्तावित नामों की सूची में शामिल किया जाता है और उसी में से नियुक्ति हो जाती है। इसके अपवाद विरले ही होते हैं। 2009 में 15 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए एक चयन समिति बनाई गई। उसने 15 पैनल बनाए जिसमें प्रत्येक में तीन नाम थे। नियुक्तियां 2009 के लोकसभा चुनावों की घोषणा तथा आचार संहिता लागू होने के ठीक एक दिन पहले कर दी गईं। मार्च में उनमें से अधिकांश का कार्यकाल समाप्त हो रहा हैं और यह निश्चित मानिए कि 2014 के चुनावों की घोषणा तथा आचार संहिता लागू होने से पहले तक ये पद भर दिए जाएंगे। देश में जब मानद विश्वविद्यालयों की अचानक बाढ़ आ गई है, तब उसके पीछे की कहानी भी सारे देश में प्रचलित हुई। कुलपतियों की नियुक्ति भी अनेक बार चर्चा के उसी दायरे में आती है कि कौन किस का नामित है, वह कैसे सबसे आगे निकल गया, पद पर आकर उसका सबसे बड़ा लक्ष्य क्या होगा, इत्यादि। मानद विश्वविद्यालयों में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब राजनेता अथवा व्यापारी पिता ने संपत्ति अर्जित की, शिक्षा को निवेश का सुरक्षित क्षेत्र माना और सुपुत्र को कुलपति बना दिया।

परंपरा से कुलपति का पद समाज में श्रेष्ठतम माना जाता रहा है। व्यवस्था उसके ज्ञान तथा विद्धतापूर्ण योगदान के कारण सदैव नतमस्तक रही है। डॉ. राधाकृष्णन, सर रामास्वामी मुदलियार, आशुतोष मुखर्जी, पं. मदन मोहन मालवीय, गंगानाथ झा, डॉ. अमरनाथ झा, डॉ. जाकिर हुसैन जैसे कई विख्यात नाम याद आते हैं। इन नामों को सुनकर ही कुलपति की गरिमा, प्रतिष्ठा का पक्ष उभरकर सामने आ जाता है। इसी को ध्यान में रख कोठारी आयोग (1964-66) ने स्पष्ट संस्तुति की थी कि शिक्षा के इतर क्षेत्रों से सेवानिवृत्त होकर आए व्यक्तियों की कुलपति पद पर नियुक्ति उचित नहीं। यदि विशेष परिस्थितियों में ऐसा कुछ करना पड़े तब भी उसे किसी को पुरस्कृत करने या पद देने के लिए इस्तेमाल न किया जाए। कुलपति को अपनी विद्धता तथा योगदान के आधार पर विश्वविद्यालय के विद्वत समाज को नेतृत्व देना होता है। इसका आधार उसकी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता तथा नैतिकता होती है। ज्ञान की खोज और सृजन गहन प्रतिबद्धता के आधार पर ही हो पाता है। इसके लिए उचित वातावरण का निर्माण कुलपति का विशेष उत्तरदायित्व होता है। उस वातावरण में सम्मान तथा श्रद्धा उसे तभी मिलती है जब वह शोध, नवाचार तथा अध्यापन में सक्रिय भागीदारी निभाता है। वह केवल अपने पद के अधिकारों के आधार पर सम्मान तथा श्रद्धा अर्जित नहीं करता है।

राजनेता तथा नौकरशाह इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक नहीं समझते। नौकरशाह को लगता है कि यदि वह भारत सरकार में कृषि विभाग में सचिव पद पर कार्य करते हुए स्थानांतरित होकर अगले दिन संस्कृति विभाग का सचिव हो सकता है तो सेवानिवृत्त होकर वह एक विश्वविद्यालय क्यों नहीं चला सकता? नेता और नौकरशाह जब मिल जाते हैं तब वे शिक्षाविदों तथा प्राध्यापकों, विद्वानों को चयन समितियों में अधिकतर अवसरों पर खानापूर्ति के लिए आमंत्रित करते हैं। कुलपति की नियुक्तियों में जाति, पंथ, क्षेत्रीयता अब खुलेआम हावी हो रही है। तमाम तामझाम के साथ अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा अर्मत्य सेन तथा एपीजे अब्दुल कलाम जैसे नामों के साथ की गई, लेकिन जब वहां पहले कुलपति की नियुक्ति की घोषणा हुई तो लोगों का आश्चर्य और आशंकाएं उभर कर सामने आ गईं। कलाम अब अलग हो चुके हैं। लोग पूछते है कि यह विश्वविद्यालय कहां से चल रहा है-दिल्ली से, पटना से, विदेश से या नालंदा से? जो भी हो, यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि बिहार जैसे सुशासन वाले राज्य में भी शिक्षा की प्रगति न केवल ठहरी है वरन नीचे जा रही है।

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाए बिना देश की ज्ञान संपदा नहीं बढ़ सकती। यह तभी संभव होगा जब उच्च शिक्षा नौकरशाहों तथा राजनेताओं के गठबंधन से मुक्ति पा सके। इसके लिए सम्माननीय प्राध्यापकों, विद्वानों तथा साहित्यकारों को एकजुट होकर आवाज उठानी होगी। जामिया से जो शुरुआत हुई है उसे देशव्यापी आंदोलन का रूप देना होगा।

 

- जेएस राजपूत (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)

साभारः दैनिक जागरण