बंदी की कगार पर 1 लाख से अधिक स्कूल, 2-3 करोड़ छात्र होंगे प्रभावितः नीसा

- देशभर के निजी स्कूल संगठन 24 फरवरी को जंतर मंतर पर देंगे धरनाः कुलभूषण शर्मा
- मोदी के गुजरात मॉडल को ही नहीं अपना रहे मोदी के मंत्रीः अमित चंद्र

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही छात्रों की शिक्षा के राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। आरटीई के दोषपूर्ण उपनियमों के कारण देशभर के 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा उत्पन्न हो गया है। स्कूलों के बंद होने के कारण कम से कम 2 से 3 करोड़ छात्र सीधे सीधे प्रभावित होंगे। सरकार के इस मनमानीपूर्ण रवैये के विरोध में देशभर के स्कूल संचालक व संगठन आगामी 24 फरवरी को जंतर मंतर पर विशाल धरना देंगे और प्रदर्शन करेंगे। कम शुल्क वसूलने वाले छोटे निजी स्कूलों के अखिल भारतीय संगठन, नीसा (नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने ये बातें शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कही।

प्रेस क्लब में मीडिया से मुखातिब होते हुए कुलभूषण शर्मा ने कहा कि निशुल्क शिक्षा, मिड डे मील, यूनिफॉर्म, स्टेशनरी आदि प्रदान करने के बावजूद छात्रों के अभाव में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। लेकिन सरकार यह समझने को तैयार नहीं कि अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य संवारने हेतु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहते हैं, जिसके लिए वे पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं। लेकिन सरकार जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रही है ताकि निजी स्कूल बंद हो जाए और अभिभावकों को मजबूरी में अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजना पड़े।

संवाददाता सम्मेलन के दौरान थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के असोसिएट डाइरेक्टर अमित चंद्र ने कहा कि गुजरात में आरटीई की विसंगतियों से निबटने और निजी स्कूलों को राहत प्रदान करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री व वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारगर तरीका निकाला था। उन्होंने स्कूलों की मान्यता बरकरार रखने व नए स्कूलों को मान्यता प्रदान करने के लिए अन्य चीजों के अलावा लर्निंग आउटपुट को भी महत्ता दी। अमित ने कहा कि अफसोस की बात है कि मोदी के सफल गुजरात मॉडल को देशभर में लागू करने की बजाए उन्हीं की सरकार इस मॉडल की उपेक्षा कर रही है।

नीसा के उपाध्यक्ष राजेश मल्होत्रा ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून छात्रों को शिक्षा प्रदान करने की सरकारी जिम्मेदारी तय करता है। लेकिन ऐसा करने में असफल रहीं सरकारें सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की बजाए निजी स्कूलों को परेशान करने में जुटी हुई हैं। आरटीई का मुख्य उद्देश्य स्कूलों में बच्चों के नामांकन करने तक ही सीमित रह गया है और गुणवत्ता युक्त शिक्षा उनके एजेंडे में दूर दूर तक नहीं है। आरटीई के तहत आरक्षित 25 प्रतिशत दाखिलों के ऐवज में मिलने वाला भुगतान कई कई वर्षों तक नहीं किया जाता है और आए दिन नए नए कानून बनाकर संचालकों की राह में रोड़े अटकाए जाते हैं।

- आजादी.मी