राजनैतिक हित साधने के उपकरण के रूप में तब्दील हो जाएगा आरटीईः निसा (अंतिम भाग)

गतांक से आगे...

आरटीई कानून में स्कूलों के लिए वर्णित आधारभूत संरचना जैसे नियम के बाबत क्या कहेंगे आप?

आर.सी. जैनः निसा का स्पष्ट मानना है कि चूंकि बजट प्राइवेट स्कूलों के पास इतना स्थान नहीं होता कि वे परिसर में प्लेग्राउंड बना सकें और ना ही उनका बजट इतना होता है कि वे सरकारी स्कूलों के टीचरों के बराबर वेतन प्रदान कर सकें। लेकिन सरकार की तरफ से इस नियम को आवश्यक बना दिया गया है और स्पष्ट कर दिया गया है कि जो स्कूल उक्त नियमों का पालन नहीं करते उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी। यह सरकारी फरमान कहीं से व्यवहारिक नहीं है और सरकार की इस नीति के कारण देश में बड़ी संख्या में स्कूलों के बंद होने का खतरा मंडराने लगा है।

लेकिन सरकार की तरफ से आरटीई को शिक्षा के स्तर में सुधार की दिशा में बड़े कदम के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है?

आर.सी. जैनः मैं तो कहता हूं कि आरटीई के कई प्रावधान ऐसे हैं जो देश में शिक्षा के स्तर को सुधारने की बजाए उसे गर्त की ओर ढकेलने का मुख्य कारण बनने वाले हैं। उदाहरण के लिए आरटीई के उस प्रावधान का जिक्र लाजमी होगा जिसमें किसी भी छात्र को वर्षभर दाखिला लेने का अधिकार दिया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि स्कूल के पास कोई 13 वर्षीय छात्र दिसंबर में भी आता है और उम्र के आधार पर सातवीं कक्षा में दाखिला मांगता है तो स्कूल को उसे दाखिला देना अवश्यंभावी होगा। भले ही छात्र ने सातवीं से पूर्व की कक्षाओं में पढ़ाई की हो या नहीं। इसके अतिरिक्त देर से दाखिला लेने और कोर्स पूरा न कर पाने के कारण परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन न करने के बावजूद उसे पास करना भी मजबूरी होगी। अब इस प्रावधान के किस छात्र का भला होगा और शिक्षा के कौन से स्तर में सुधार होगा यह सरकार से अच्छा और कोई नहीं जानेगा।

इस समस्या के समाधान के तौर पर निसा का सुझाव क्या है?

आर.सी. जैनः निसा का स्पष्ट मानना है कि सरकार को स्कूलों की संरचना की बजाए उसके यहां पढ़ने वाले छात्रों के प्रदर्शन को मान्यता का मानक निर्धारित करना चाहिए। यदि कुछ कमरों में चलने वाले स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों के छात्रों की तुलना में परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो बेवजह स्कूल प्रशासन को परेशान करने का कोई तुक नहीं बनता है। गुजरात सहित कुछ राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट पर ही सही इस सुझाव पर अमल कर लिया गया है। केंद्र सरकार से आग्रह है कि राज्यों द्वारा अपनाए गए मॉडल को पूरे देशभर में लागू करे ताकि सर्व शिक्षा अभियान के उसके मंसूबों पर पानी न फिर सके।

गरीब हो या अमीर सबको समान और गुणवत्ता युक्त शिक्षा मिले इसके लिए आपलोग क्या पहल कर रहे हैं?

आर.सी. जैनः समान और गुणवत्तायुक्त शिक्षा के लिए हम अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा चलाए जा रहे स्कूल की बजाए छात्रों को फंड देने की मुहिम का समर्थन करते हैं। सेंटर द्वारा छात्रों के लिए वाऊचर सिस्टम के सुझाव के भी हम प्रबल समर्थक हैं। आपको तो पता ही है कि सरकार ने 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों के ऐवज में स्कूलों को प्रति छात्र 1120 रूपए के दर से भुगतान की बात कही है। हमारी सरकार से मांग है कि सरकार स्कूलों को फंड ना देकर सीधे छात्रों को वाऊचर सिस्टम के तहत फंड प्रदान करे ताकि छात्र अपनी पसंद के स्कूल में दाखिला लकेर पढ़ाई कर सकें। फीस के बदले में वे स्कूल प्रशासन को 1120 रूपए का वाऊचर प्रदान करें जिसे न तो स्कूलों को गरीब छात्रों का दाखिला लेने में आपत्ति हो और ना ही सरकार से मिलने वाली धनराशि का दुरूपयोग हो सके।

(समाप्त)
- अविनाश चंद्र

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