यूनियन से ऊपर छात्र

आज के समय में नागरिक अधिकारों के लड़ाई की दृष्टि से शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण युद्ध का मैदान बन गया है। और इसप्रकार, गरीबी के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में से एक स्कूलों में लड़ा जाने लगा है।

शहरी स्कूलों में आज 1950 के शुरुआती वर्षों जैसी ‘अलग लेकिन समान’ प्रणाली की मांग गूंजने लगी है। शिकागो पब्लिक स्कूल, जहां अध्यापक इन दिनों हड़ताल पर हैं, में पढ़ने वाले 86 प्रतिशत बच्चे अश्वेत या हिस्पैनिक हैं और 87 प्रतिशत बच्चे निम्न आय वाले परिवारों से आते हैं।

ये छात्र प्रायः ब्राउन वी. शिक्षाबोर्ड प्रणाली के पूर्व के अलग अश्वेत स्कूलों के छात्रों द्वारा प्राप्त की जाने वाली शिक्षा से बेहतर शिक्षा नहीं पाते हैं। शिकागो में उच्च शिक्षा स्नातक करने वालों की संख्या में सुधार हुआ है लेकिन यह अब भी 60 प्रतिशत के आसपास ही है।

शिकागो स्कूल रिसर्च के मुताबिक कक्षा नौ में दाखिला लेने वाले अश्वेत छात्रों में से मात्र तीन प्रतिशत ही कॉलेज से चार साल की स्नातक डिग्री प्राप्त कर पाते हैं।

अमेरिकी शिक्षा प्रणाली, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कम अन्याय संचारित संरचना की तुलना में, अवसर की एक सीढ़ी के रूप में तब्दील हो गयी है।

इसलिए स्कूलों में परिवर्तन जटिल हो गया है। यह समानता, अवसर और राष्ट्रीय चेतना का मुद्दा है। यह मात्र शिक्षा ही नहीं बल्कि गरीबी और न्याय के बारे में है- और जबतक छात्रों के नाम पर शिकागो अध्यापक संघ हड़ताल पर है, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता है।

निष्पक्ष तौर पर, यह सच है कि शहरी स्कूलों के खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण अध्यापक संघ नहीं बल्कि गरीबी है। मजबूत अध्यापक संघों के बगैर दक्षिणी राज्यों के स्कूल उतने ही घटिया हैं जितने कि संघ राज्यों के। एक सबसे महत्वपूर्ण काम जो हम कर सको वह है उन बच्चों को, जिनका संघों से कोई लेना देना नहीं है, उनके जोखिम पर प्रारंभिक बचपन की शिक्षा प्रदान करना।

फिर भी, शिकागो के कुछ अध्यापकों का ऐसा सोचना है कि जबतक गरीबी का समाधान नहीं हो जाता तब तक उन्हें जवाबदेह नहीं बनाना चाहिए। कुछ तरीके हैं जो फर्क पैदा कर सकते हैं और मेयर रैम इमेन्यूल उनका प्रयोग कर भी रहें हैं, इसके बावजूद अध्यापक संघ विरोध कर रहे हैं।

यह शर्मनाक है कि, हालतक, शिकागो के कई सामान्य छात्रों को राष्ट्रीय स्कूली समय से औसतन एक और स्कूलों को राष्ट्रीय औसत से दो सप्ताह का कम समय मिलता था। इस अंतर को पाटने के प्रयासों के लिए मेयर को बधाई।

यदि संघ महज अधिक मुआवजे पर ध्यान केंद्रित रखता है तो उसे मेरी सहानुभूति है। अध्यापको को ज्यादा बेहतर भुगतान करने की जरूरत है ताकि सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों के स्नातकों को देश के सबसे खराब स्कूलों के प्रति आकर्षित किया जा सके। बजाए इसके शिकागो यूनियन अपने बुरे प्रदर्शन को अपने राजनैतिक ताकतों के सहारे बचाने में जुटा प्रतीत होता है। इसके पुख्ता प्रमाण हैं कि अत्यंत गरीब स्कूलों में भी अध्यापकों की प्रभावशीलता में बड़ा मतभेद है। नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा दिसंबर में प्रकाशित, हार्वर्ड और कोलंबिया विश्वविद्यालय के विद्वानों द्वारा की गई गोल्ड स्टैंडर्ड स्टडी में जिलों के प्रमुख बड़े शहरी स्कूलों से आंकड़े एकत्रित करने के दौरान गरीबी के संदर्भ में अध्यापकों के बीच अत्यधिक सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव देखने को मिले। नीचे के एक प्रतिशत अध्यापक ऐसे थे जिनके छात्र उतने ही प्रभावी थे जितने चालीस प्रतिशत कक्षाएं छोड़ने वाले छात्र। टॉप के 20 प्रतिशत अध्यापक ऐसे थे जिनके छात्र उतने प्रभावी थे जैसे कि एक-दो महीने अतिरिक्त कक्षाओं में शामिल हुए हों। अध्ययन में पाया गया कि कक्षा चार से कक्षा आठ तक के सबल अध्यापकों ने छात्रों के भीतर की खेल प्रतिभा को दशकों तक प्रभावी रहने के अंदाज में बाहर निकाला।

शुरुआती पहले साल मात्र एक सबल अध्यापक के होने से ही छात्राओं के किशोरावस्था में मां बनने की संभावना को कम और कॉलेज जाने व 28 वर्ष की आयु तक ज्यादा पैसे कमाने की संभावनाओं में वृद्धि देखने को मिली।

नीचे के पांच प्रतिशत अध्यापकों को हटाने पर भारी प्रभाव पड़ेगा। अध्ययन के अनुसार सिंगल क्लास रूम के छात्र नीचे के पांच प्रतिशत अध्यापकों की तुलना में एक औसत अध्यापक के निर्देशन में संयुक्त रूप से अपने कैरियर के दौरान 1.4 मिलियन डॉलर अधिक कमाएंगे।

लॉस एंजिल्स में हुए एक अन्य प्रतिस्पर्धी अध्ययन में सुझाया गया है कि नीचे के एक चौथाई अध्यापकों की तुलना में उपर के एक चौथाई अध्यापकों के लगातार चार वर्ष तक साथ होना श्वेत-अश्वेत परीक्षण के मुद्दे को समाप्त करने के लिए पर्याप्त होगा। कैसे पता चले कि कौन कमजोर अध्यापक है? हां, यह चुनौती है। लेकिन शोधकर्ता आरंभ से वर्ष के अंत तक मूल्य संवर्धन मापक प्रणाली में सुधार करने में जुटे हैं और तीन वर्षों के आंकड़ों के साथ आमतौर पर यह बता पाना संभव हो जाएगा कि कौन सा अध्यापक पिछड़ रहा है।

दुर्भाग्यवश, शिकागो में संघ प्रायः अप्रभावी होने के कारण निकाल दिए गए अध्यापकों को नई नियुक्ति के समय प्राथमिकता देने की बात का दबाव बना रहे हैं। यह छात्रों का अपमान है।

अध्यापन इतना महत्वपूर्ण काम है कि इसमें अन्य व्यवसायों की तरह उच्च वेतन और अच्छे कार्य का माहौल होना चाहिए लेकिन बुरा प्रदर्शन करने वालों के लिए नौकरी की सुरक्षा नहीं। यह परिधान श्रमिकों और लालची कॉर्पोरेट दिग्गज के बीच की लड़ाई नहीं है। शिकागो स्कूल के केंद्रीय आंकड़ें में 350,000 छात्र है न कि स्ट्राइकर और प्रबंधक। एक विखंडित और गैर जिम्मेदाराना स्कूल प्रणाली को संरक्षित करते हुए संघ उन छात्रों को कुर्बान कर अलग और समान शिक्षा प्रणाली की ओर ध्यान केंद्रीत करने की मांग कर रहा है।

प्रस्तुति  - अविनाश चंद्र
- निकोलस डी. क्रिस्टोफ, न्यूयार्क टाइम्स से साभार
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http://www.nytimes.com/2012/09/13/opinion/kristof-students-over-unions.html?_r=1