एनजीओ पर अविश्वास क्यों?

सरकार ने हाल ही में गैर-सरकारी संगठनों को निशाना बनाने का प्रयास किया है और वहां चोट की है जहां नुकसान सर्वाधिक होता है। 'ग्रीनपीस' के साथ फोर्ड तथा हजारों गैर-सरकारी संगठनों पर कार्रवाई के मामलों से यह स्पष्ट है। सरकार की इस कार्रवाई पर जितना संभव हो, उतनी कड़े शब्दों में आलोचना जरूरी है। गैर-सरकारी संगठनों पर अविश्वास और नजर रखने के सरकारी तर्क कमजोर बहानों के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। 
 
एकजुट होने की स्वतंत्रता
हमारा संविधान हर नागरिक को यह स्वतंत्रता देता है कि वह किसी व्यक्ति/ समूह/ संगठन के साथ जुड़े या नहीं। वास्तव में इस स्वतंत्रता को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विस्तार कर वैश्वीकृत करने की जरूरत है, न कि प्रतिबंधित किए जाने की। साथ ही हमारा संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार भी देता है। जब तक तथ्य और प्रमाण साथ हों तब तक हर नागरिक को असहमत हेाने और उसे व्यक्त करने का अधिकार है। कोई विचार, शोध का आधार और पैसा विदेश से आ सकता है, बशर्ते किसी मुद्दे को उठाने वाले लोग देश के नागरिक हों और उनकी दिलचस्पी इस में हो। 
यह कतई मायने नहीं रखता कि यह कहां से आ रहा है। एक लोकतांत्रिक समाज 'तर्क और वितर्क' दोनों को महत्व देता है। सरकार गैर-सरकारी संगठनों पर हेरफेर करने, गलत प्रतिनिधित्व करने और उसे प्रसारित करने का आरोप लगा रही है, जबकि उसके इस प्रचार से उसकी अपनी ही अक्षमता का पता चलता है। 
सरकार के पास बड़ी सरकारी मशीनरी होती है जिसके माध्यम से वह अपने तर्क को प्रचार-प्रसार कर सकती है। तब उसे इसके विरोध में किसी 'वितर्क' को प्रचारित होने से रोकने का प्रयास क्यों करना चाहिए। सरकार का जोर तो बल्कि यह होना चाहिए कि वह जनता से अपने को जोड़े और उस तक अपनी बात पहुंचाए। 
 
क्या और किसका विकास
गैर-सरकारी संगठनों पर कार्रवाई को सही साबित करने के लिए सरकार ने इन संगठनों के कार्यों को विकास विरोधी प्रचारित करना शुरू कर दिया है। फिर भी, नागरिकों को सवाल करना ही चाहिए कि क्या विकास हो रहा है और किसका विकास हो रहा है! जबकि किसानों से उनकी सहमति के बिना खेत छीने जा रहे हैं, और उसको विकास की दिशा में बड़े कदम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है तथा उचित मुआवजा प्राप्त करने के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शन को विकास विरोधी बताया जा रहा है।
 
विदेशी योगदान का हौव्वा
क्या हम उस युग में जी रहे हैं जहां विदेशी योगदान 'गुप्त एजेंडा' के तहत विदेशी ताकतों के साथ जुड़ा होता था? यदि ऐसा है तो, इसका अर्थ यह है कि सभी प्रकार के विदेशी योगदान और व्यवसायों में 'गुप्त एजेंडा' हो सकता है। फिर 'मेक इन इंडिया' के प्रधानमंत्री के अभियान पर भी सवाल उठें तो आश्चर्य नहीं।
 
नीति बनाने के लिए लॉबी
अगर कोई नागरिक संगठन किसी अनुचित साधन का इस्तेमाल कर सरकार की नीति को प्रभावित करने की कोशिश करता है तो सरकार के लिए यह चेतावनी है कि इसी तरह से कॉरपोरेट भी सरकार की नीतियों को प्रभावित करने का कार्य कर सकती है। इस तर्क से तो विश्व राजनीति की बड़ी मछलियां समझे जाने वाले वर्ल्ड बैंक, यूएनडीपी और आईएफ की सहायता लेना भी सरकार को तत्काल बंद कर देना चाहिए। आज जरूरत है कि हम अच्छे इरादे आधारित नीतियां बनाने की बजाय तथ्य आधारित नीतियां बनाने की ओर अग्रसर हों। कोई संगठन किसी गलत काम करने में पाया जाता है तो उस पर कार्रवाई हो। कार्रवाई हर मामले में स्पष्ट और पारदर्शी हो। पर सारी विदेशी सहायता तथा एनजीओ को बदनाम करना उचित नहीं।
 
 
- अमित चंद्रा, सेंटर फॉर सिविल सोसायटी