एमएसपी बनाम बाजारः सवाल कार्य कुशलता का

क्या हम कृषि के क्षेत्र में विकास करना चाहते हैं जो कि आर्थिक रूप से टिकाऊ भी हो, या फिर एमएसपी और एसएपी के वर्चस्व के कारण पैदा हुआ चावल, गेंहू और चीनी वाला झमेला?

नए कृषि कानून पारित किये जाने के मुद्दे पर भारत का लोकतंत्र अपने पूरे रौ में था। एक तरफ जहां सरकार इसे एक ऐतिहासिक फैसला बता रही थी, और मैं उससे सहमत होता प्रतीत हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने इसे ‘किसानों के लिए काला दिन’ और ‘कारपोरेट शार्क के हाथों बेच दिये जाने’ आदि के तौर पर प्रचारित किया। मुझे सबसे अधिक आश्चर्य चकित जिस चीज ने किया वह यह देखना था कि किस प्रकार सभी लोगों के दिल में अचानक से किसानों के लिए प्रेम उमड़ पड़ा था।

कर्कश राजनैतिक शोर शराबे के पीछे के तर्कों का सुक्ष्मता के साथ अध्ययन करने के बाद मैंने पाया कि चाहते तो दोनों राजनैतिक पक्ष किसानों का भला ही हैं। विपक्ष यह कार्य एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) वाली प्रणाली को अधिक प्रभावी और उच्च दर के माध्यम से करना चाहता था, जबकि सरकार ऐसा एमएसपी की वर्तमान प्रणाली को समाप्त किये बगैर बाजार के माध्यम से अधिक से अधिक विकल्प उपलब्ध करा कर करना चाहती थी।

दशकों से जारी एमएसपी वाली व्यवस्था का विश्लेषण करने के बाद मैं यह स्पष्ट रूप से कह सकता हूं कि एमएसपी का सृजन 1960 के दशक के मध्य में पैदा हुए अभाव वाले दौर में हुआ था। लेकिन भारतीय कृषि ने आज परिस्थितियों को बिल्कुल उलट दिया है और अभाव से अधिकता वाली स्थिति में पहुंचा दिया है। कमी की समस्या से निपटने वाले नीतिगत उपकरण अधिकता की समस्या से निपटने वाले उपकरण से पूरी तरह अलग होते हैं। अधिकता वाली अर्थव्यवस्था में यदि हम मांग आधारित बाजार प्रणाली की बड़ी भूमिका की अनुमति नहीं देते हैं तो एमएसपी वाला तरीका आर्थिक बर्बादी का कारण बन सकता है। यह परिवर्तन कोई ‘जीरो वन’ का खेल नहीं है बल्कि कीमत का कितना हिस्सा सरकार द्वारा समर्थित होगा और कितना हिस्सा बाजार आधारित होगा यह केवल उसमें परिवर्तन है।

ये कृषि कानून एमएसपी वाली प्रणाली को समाप्त किये बगैर बाजार की सापेक्षिक भूमिका को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। वैसे मैं बता दूं कि कोई भी प्रणाली पूरी तरह से दोष रहित नहीं है चाहे वह एमएसपी हो या बाजार आधारित। लेकिन एमएसपी वाली प्रणाली कहीं अधिक महंगी और अप्रभावी है जबकि बाजार आधारित प्रणाली अधिक टिकाऊ होगी, बशर्ते हमें उचित बाजार तक पहुंच प्राप्त हो सके। मैं आपको कुछ और विस्तार में बताता हूं।

एमएसपी प्राथमिक तौर पर कुछ चयनित राज्यों में धान और गेंहू पर लागू होता है। और हाल के वर्षों में थोड़ी मात्रा में दालों, तिलहनों और कपास की भी सरकार द्वारा कुछ अवसरों पर खरीद की गई है। एमएसपी प्रणाली के प्रभुत्व वाले चावल और गेंहू के परिणामों को देखें। सरकार के पास मौजूद भंडार की मात्रा आवश्यक सुरक्षित भंडार की मात्रा से कहीं अधिक है (ग्राफिक्स देखें)। चावल खरीदने की कीमत प्रति किलो लगभग 37 रूपए और गेंहू खरीदने की कीमत प्रति किलो लगभग 27 रूपए पड़ती है। भारतीय खाद्य निगम (फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया) के विभागीय श्रमिकों की मजदूरी के रूप में खर्च होने वाली सीटीसी (कंपनी की कुल लागत)  ठेके पर कार्य करने वाले मजदूरों की मजदूरी की दर से 6 से 8 गुना अधिक होती है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि चावल और गेंहू का बाजार भाव एफसीआई को पड़ने वाली कीमत से बहुत कम होता है। उदाहरण के लिए, बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आप खुदरा बाजार में आसानी से 23 से 25 रूपए प्रति किलों की दर से चावल खरीद सकते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि एफसीआई के गोदामों में मौजूद खाद्यान्नों को बिना सब्सिडी के निर्यात भी नहीं किया जा सकता है। और यदि ऐसा किया जाता है तो डब्लूटीओ ऐतराज जताता है।

खाद्य सब्सिडी की वास्तविक कीमत का भार बहुत अधिक हो गया है लेकिन इसे केंद्रीय बजट में नहीं दिखाया जाता है क्योंकि एफसीआई को और अधिक उधार लेने को कहा जाता है। एफसीआई के उपर उधार का बोझ 3 लाख करोड़ से अधिक का हो गया है। सामान्य रूप में कहें तो हम खाद्य प्रबंधन प्रणाली के क्षेत्र में उत्पन्न वित्तीय संकट को बस टाल भर रहे हैं। यदि एफसीआई ‘विक्रय विकल्प’ (पुट ऑप्शन) जैसे नीतिगत उपकरणों का प्रयोग कर इस लागत को कम कर सकती है। लेकिन जब गरीबों के नाम पर कोई कार्य किया जा रहा हो तो वहां लागत की चिंता कौन करता है।

कुछ विद्वान गन्ने की कीमतों और सहकारी समितियों के द्वारा दी जाने वाली दूध की कीमतों की तुलना एमएसपी के साथ करते हैं। तकनीकि रूप से यह सही नहीं है। एमएसपी सरकार के द्वारा किसानों को दिया जाने वाला महज एक आश्वासन है (कानूनी रूप से बाध्य नहीं है) कि यदि बाजार भाव एमएसपी से नीचे चला जाता है तो वह एमएसपी पर खरीद करेगी। गन्ना के संबंध में सरकार ‘फेयर एंड रिमुनरेटिव प्राइस’ (उचित और पारिश्रमिक दर) एफआरपी की घोषणा करती है जिसका भुगतान चीनी मिलों के द्वारा करना होता है। उत्तर प्रदेश अपना खुद का ‘स्टेट एडवाइज़्ड प्राइस (एसएपी)’ घोषित करता है। और देखिए चीनी के क्षेत्र में हमने क्या गड़बड़ कर रखा है। हमारे उपर गन्ना किसानों का 8 हजार करोड़ रूपए से अधिक का बकाया है जबकि चीनी का बहुत बड़ा अधिशेष भंडार मौजूद है जिसे निर्यात नहीं किया जा सकता है। महज लोक लुभावन एसएपी के कारण इस सेक्टर को हमने वैश्विक रूप से गैर प्रतिस्पर्धी बना दिया है। गन्ने की कीमत जबतक रंगराजन कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप नहीं होती है, जो कि कुछ कुछ दूध की कीमतों के निर्धारण की तर्ज पर है, तबतक चीनी के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं निकलने वाला है।

भारतीय कृषि के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्पाद दूध की भी बात कर लेते हैं जिसका मोल चावल, गेंहू और गन्ने के संयुक्त मोल से भी अधिक है। दुग्ध सहकारी के मामले में कीमतों का निर्धारण दुग्ध महासंघ के साथ मशविरा करके कंपनी द्वारा किया जाता है न कि सरकार के द्वारा। यही मूल्य निर्धारण की अनुबंध आधारित प्रवृति है। देश के सबसे बड़े दुग्ध सहकारी (जीसीएमएमएफ, अमूल) के एमडी आर एस सोधी कहते हैं कि दूध के लिए कोई एमएसपी नहीं होती है। इसे प्राइवेट कंपनियों जैसे कि नेस्ले, हैट्सन या श्रैबर डायनेमिक्स डेयरियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना होता है।

और दूध के कारोबार का क्षेत्र कई वर्षों से चावल, गेंहू और गन्ने की तुलना में प्रतिवर्ष दोगुने से तीनगुने की दर से प्रगति कर रहा है। आज, भारत 187 मिलियन टन दूध उत्पादन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। यह 100 मिलियन टन दूध उत्पादन के साथ इस क्षेत्र में दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश अमेरिका से कहीं आगे है।       

बतौर पॉलिसी एनालिसिस्ट मेरा मानना है कि कृषि कानूनों में बदलावों के कारण अगले 3 से 5 वर्षों के भीतर सैकड़ों और हजारों की तादाद में कंपनियां दूध के क्षेत्र की तर्ज पर पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति लाइन स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित होंगी। यह अलग अलग कृषि उत्पादों के लिए होगा जो कृषक उत्पादक संघों (पीएफओ) के माध्यम से होगा अथवा एग्रीगेटर्स के माध्यम से होगा। ऐसा उन राज्यों में होगा जहां कंपनियों को निवेश के लिए सही माहौल प्राप्त होगा। कुछ मामलों में असफलता मिलेगी तो वहीं कई सारे मामलों में सफलता भी हाथ लगेगी। ये कंपनियां मुर्गी पालन के क्षेत्र की तर्ज पर उत्पादकता, गुणवत्ता और उत्पादों की सुरक्षा आदि बढ़ाने में मददगार साबित होंगी।

दुग्ध और मुर्गी पालन के क्षेत्र में एमएसपी  नहीं होती और इसे मंडी प्रणाली से होकर नहीं गुजरना पड़ता है जहां कि उच्च मात्रा में कमीशन, बाजार शुल्क और सेस चुकाने की जरूरत होती है।
फैसला हमारे हाथों में हैंः क्या हम ऐसी सतत प्रगति चाहते हैं जो आर्थिक रूप से भी टिकाऊ हो या हम सबकुछ गड्ड मड्ड करना चाहते हैं जैसा कि पहले से ही एमएसपी और एसएपी के प्रभुत्व वाले चावल, गेंहू और चीनी के क्षेत्र में मौजूद है?

अंत में, मैं यह अवश्य कहना चाहूंगा कि किसानों की आय बढ़ाने में फसलों की कीमतों की अपनी सीमाएं हैं। उत्पादकता, उच्च मूल्य वाले फसलों के क्षेत्र में विविधिकरण और लोगों को कृषि से बाहर निकाल कर उच्च उत्पादकता वाले किसी अन्य क्षेत्र में लगाना ज्यादा अधिक टिकाऊ समाधान है। लेकिन आंदोलनों के दौरान इन चीजों की कोई बात नहीं कर रहा है।

- अशोक गुलाटी (लेखक इन्फोसिस के कृषि विभाग के अध्यक्ष हैं) 

यह लेख फाइनेंसियल एक्सप्रेस में अंग्रेजी में प्रकाशित लेख का हिंदी अनुवाद है। मौलिक लेख को पढ़ने के लिए https://www.financialexpress.com/opinion/msp-vs-markets-a-question-of-ef... क्लिक करें..