कॉरोना महामारी, जैम और डीबीटी

वैश्विक स्तर पर उभरे कोविड-19 संकट की चुनौतियों से देश दो तरफा जूझ रहा है। शहरी आबादी के सामने कोविड से बचाव व पलायन की वजह से पैदा हो रही परिस्थिति से निपटने की चुनौती है, वहीँ दूसरी तरफ ग्रामीण भारत के सामने आजीविका के सुरक्षा का सवाल है। भारत की बड़ी आबादी गांवों में रहती है तथा उसकी आजीविका निर्भरता भी श्रम संबंधी उपक्रमों पर टिकी है। ऐसे में जब लॉक डाउन की वजह से श्रम के अवसर कम हो गये हैं, तब शहरों के साथ-साथ गांवों में आजीविका और नकदी का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। यह संकट लॉक डाउन की स्थिति में आम जन के धैर्य व भरोसे को भी डिगा सकता है। लगभग एक महीने के संपूर्ण लॉक डाउन के बावजूद ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है, तो इसके पीछे कुछ बुनियादी कारण हैं।

हम यह तो नहीं कह सकते कि स्थितियां एकदम आदर्श हैं। वाकई स्थिति आदर्श नहीं बल्कि संकट वाली है। किंतु इस स्थिति को संभालने के प्रयास जमीनी स्तर पर बहुत हद तक कारगर जरुर नजर आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी का संकट न हो तथा गरीब तबके को फौरी तौर पर राहत मिले, इसके उपाय सरकार द्वारा कुछ स्तरों पर किये गये हैं। नकदी के संकट की वजह से उभरने वाले असंतोष को रोकने में सरकार इसलिए कामयाब हुई है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को नकदी सहायता देने का प्रयास बहुतायत सफल हुआ है। इस सफलता के पीछे सबसे कारण ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’के तहत जनहित की योजनाओं की मजबूत संरचना का तैयार होना है। जनधन, आधार और मोबाइल की त्रयी में कुछ साल पहले मोदी सरकार द्वारा जनहित के लिए पारदर्शी मॉडल दिया गया। यद्यपि जनधन से लेकर आधार तक को लेकर सरकार पर सवाल उठे और मखौल भी उड़ाया गया। किंतु वर्तमान के इस कठिन समय में ‘जैम’ की उपयोगिता उस निर्णय की दूरगामी दृष्टि को सही साबित करती है।

महाभारत में एक श्लोक है- स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत अर्थात राजा को अपने प्रिय लगने वाले कार्य की बजाय वही कार्य करना चाहिए जिसमें सबका हित हो। आज के सन्दर्भ में 'सबका हित' का आशय 'जनहित' के लिए कार्यों की पारदर्शिता से है। अस्सी के दशक में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस समस्या को कुछ इस तरह कहकर रेखांकित किया था कि 'एक रूपये भेजते हैं तो गांवों तक पंद्रह पैसे ही पहुँचते हैं।' मोदी सरकार द्वारा लाई गयी 'जनधन-आधार-मोबाइल' त्रयी ने दशकों पुरानी इस समस्या के लिए समाधान का कारगर रास्ता दिखाया है। महज चार वर्षों में देश के 56 विभागों की 427 योजनाओं के लाभार्थियों को डीबीटी के तहत 2 लाख 78 हजार करोड़ रूपये से अधिक का लाभ सरकार द्वारा सीधे उनके बैंक खाते में दिया जाना, एक बड़ी कामयाबी है। जिस गति से भारत ने इस लक्ष्य को हासिल किया है, वह चमत्कारिक लगता है। किंतु बारीकी से देखें तो इसके पीछे योजनाबद्ध तैयारियों की मजबूत संरचना नजर आती है। डिजिटल इंडिया को ग्रामीण भारत तक मोबाइल के माध्यम से पहुंचाने, गरीब से गरीब को मुख्यधारा के अर्थतंत्र से जोड़ने के लिए जनधन खाते खुलवाने, आधार से उनकी पहचान तय करने तथा बैंकिंग की पहुंच उनतक सुनिश्चित करने की योजनाबद्ध कार्यनीति ने आज देश को इस स्थिति में पहुंचाया है कि वह कोविड जैसी कठिन परिस्थिति में भी अपने नागरिकों को उनका राहत लाभांश सीधे उनके खाते में दे पा रहा है।

ग्रामीण जनजीवन में नकदी का संकट न हो तथा बुनियादी जरूरतों के लिए उन्हें आर्थिक तंगी का शिकार न होना पड़े, इसके लिए यह किसी रामबाण से कम नहीं है। केवल कोविड-19 के मद्देनजर खेतिहर मजदूरों के लिए सरकार ने किसान सम्मान योजना के तहत लगभग 18000 करोड़ की राशि डीबीटी के माध्यम से राहत पैकेज के तहत दी, जिससे लगभग 8.69 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में सीधे पैसा पहुंचा है। वहीँ ग्रामीण क्षेत्रों में रसोई गैस की सब्सिडी का बकाया पैसा भी बिना किसी अवरोध के लोगों के बैंक खातों में पहुंच रहा है। देश के लगभग हर गांव में कुछ न कुछ परिवार ऐसे हैं जो उज्ज्वला योजना के लाभार्थी हैं। ऐसे लगभग 2.66 करोड़ परिवारों को अबतक तीन महीने तक मुफ्त गैस सिलिंडर की उपलब्धता ने आजीविका के संकट से जूझने वाले परिवारों को राहत देने का काम किया है।

लॉक डाउन के दौरान कामकाज बंद होने से मनरेगा मजदूरों के लिए भी स्थिति दयनीय हो सकती थी। लेकिन डीबीटी के तहत पुराने बकाये का भुगतान करके मोदी सरकार ने करोड़ो जॉब-कार्ड धारक मजदूरों के लिए राज्यों के माध्यम से राहत पहुंचाई है।

हालांकि कल्याणकारी राज्य में यह सब तो सरकार को करना ही होता है। इस लिहाज से महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि सरकार ने जनहित में यह कदम उठाये हैं। महत्वपूर्ण यह है कि सरकार द्वारा ऐसी विकट परिस्थिति के दौर से लड़ने तथा लक्ष्यावधि में इसे करने की सुदृढ़ संरचना तैयार की गयी है। कल्पना करिए यदि डीबीटी की संरचना नहीं होती तो क्या संभव था कि इतने बड़े पैमाने पर आर्थिक लाभांश लोगों को सीधे पारदर्शी तरीके से मिल पाता? शायद नहीं मिल पाता। अगर नहीं मिल पाता तो आज देश की स्थिति क्या होती, इसकी सहज कल्पना नहीं की जा सकती है। आज देश में जनभागीदारी और जनसहयोग की सफलता इसीलिए संभव है क्योंकि जनता को सरकार से जोड़ने के बीच की कड़ी भी पारदर्शी हुई है। अब सरकार जनता को जो देना चाहती है, उसके बीच कोई तीसरी कड़ी न के बराबर बची है। कठिन दौर के बावजूद उससे उबरने तथा जनता के बीच लोकप्रियता की कसौटी पर मोदी सरकार के खरा होने साबित होने के पीछे पारदर्शी शासन के नवाचारी मॉडल पर लगातार काम करना बड़ा कारण है। आज भी अगर जनता इतने लंबे समय तक लॉक डाउन का साथ दे रही है, तो इसके पीछे भी मूल कारण यही है।

शिवानंद द्विवेदी
लेखक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

शिवानंद दिवेदी