उद्योगपति जयतीर्थ राव से बातचीत – (1)

लाइसेंस कोटा राज तो अंग्रेजों की तानाशाही से ज्यादा क्रूर था – राव

दक्षिण भारत के उद्योगपति और देश की आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी कलम चलानेवाले लेखक जयतीर्थ राव की गितनी देश के जानेमाने उदारवादी चिंतकों में होती है। देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों में उनके लेख छपते रहते हैं। पिछले दिनों वे मिल्टन फ्रीडमैन की जन्मशती पर आयोजित समारोह में भाषण देने दिल्ली आए हुए थे। आजादी.मी के संपादक सतीश पेडणेकर ने उनसे वैश्विक  आर्थिक संकट,भारत की आर्थिक स्थिति पर बातचीत की ।यहां हम उस बातचीत को अविकल प्रस्तुत कर रहे हैं -

आज हम आजादी की पैंसठवी सालगिरह मना रहे हैं। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह आजादी अधूरी है। इसमें हमें राजनीतिक आजादी तो मिली लेकिन आर्थिक आजादी नहीं मिली। एक तरफ देश के करोड़ों लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट है दूसरी तऱफ लोगों को उद्योग धंधे करने की, व्यवसाय करने की आजदी नहीं । आपकी नजर में यह अंतर्विरोध क्यों है ? 

यह लाइसेंस कोटा राज के परंपरागत विचारों की विरासत है। मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि परमिट कोटा राज अंग्रेजों की तानाशाही से भी ज्यादा क्रूर रहा है।ऐसा नहीं है कि कुछ लोगों ने बैठकर बनाई यह नीतियां वरन कुछ घटनाएं और दुर्घटनाएं

ऐसी हुईं कुछ बजट पर बजट ऐसे आए जिसके बाद हमने अपने उद्योगपतियों ,व्यापारियों और  नागरिकों को आर्थिक तौरपर गुलाम बना लिया ।हम इसके लिए अंग्रेजों को दोष नहीं दे सकते। आज हमें जो आर्थिक आजादी हासिल है उसकी तुलना में वालचंद,या टाटा-बिरला को अंग्रेजों के जमाने में ज्यादा  आर्थिक आजादी हासिल थी। इस कारण ऐसा हो गया है कि हमारे देश में उत्पादन की और प्रगति की जो संभावना या क्षमता थी उसे खत्म करके हमने गरीबी को अपना लिया है। इसके लिए हम अंग्रेजों को दोष नहीं दे सकते हम स्वयं उसके जिम्मेदार हैं। ट्रैजडी यह है कि केवल स्वतंत्र पार्टी को छोड़ दें तो किसी और पार्टी ने इसे जनता के सामने सही रूप में पेश नहीं किया है। इस कारण लोकतंत्र होने के बावजूद हमारी आर्थिक गुलामी अब भी है।

1991 में जब आर्थिक सुधार लागू हुए तब ऐसा लगा था कि देश को कुछ हद तक आर्थिक आजादी मिली है।

यह सही है कि तब हमें आर्थिक आजादी मिली ।लेकिन जब आर्थिक आजादी मिलती है तो एक ही साल में उसके नतीजे नहीं दिखाई देने लगते। हमारे यहां दस साल बाद उसके नतीजे दिखाई देने लगे थे लेकिन तभी हम धीरे-थीरे फिर लाइसेंस कोटा राज की तरफ पहुंच गए। दरअसल 1991 में मिली आजादी की नींव पर हमें और भी निर्माण करना चाहिए था जो हमने नहीं किया।

कुछ समय तक तो आर्थिक सुधारों का बहुत लाभ हुआ  हम आर्थिक महाशक्ति बनने के सपने देखने लगे। लेकिन कुछ  ही साल बाद हम फिर आर्थिक संकट का शिकार हो गए। इसका क्या कारण है ?क्या दुनियां भर सता रहे आर्थिक संकट का प्रभाव पड़ा या हमारे सरकार की नीतियां गलत रहीं?

यह आर्थिक संकट विश्व आर्थिक संकट के कारण नहीं हमारे सरकार की गलत नीतियों के कारण हुआ है। हम  विश्व आर्थिक संकट को दोष देकर बच नहीं सकते।आपने आर्थिक शक्ति शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे यह गलत शब्द है । हमें आर्थिक शक्ति आदि बनने की जरूरत नहीं है। हमें केवल धनी देश बनना चाहिए। हमारे यहां काम करके अत्पादन करके या व्यापार करके जो  देश को धनी बनाता है उसे पूरी छूट देनी चाहिए। उसकी सहायता भी करने की जरूरत नहीं है। यह हमने नहीं किया इसलिए बेकारी है गरीबी है। अगर हम 1991 के आर्थिक सुधारों के आधार पर तरक्की करते तो हम भी दक्षिण कोरिया की तरह अमीर हो जाते।आज नहीं तो दस साल बाद हो जाते लेकिन अब लगता है कि हम पचास साल बाद भी उसके बराबर नहीं पहुंच सकते। 1960 में कोरिया और हम एक ही स्तर पर थे और देखिए कि अब दक्षिण कोरिया कहां है और उनके नागरिक आर्थिक दृष्टि से कितने शक्तिशाली है और दूसरी तरफ हम है जहां चालीस करोड़ लोगों को भरपेट खाना नहीं मिलता।

यह तो सही है लेकिन आज के संकट के लिए मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया जा रहा  हैं 

वह तो ठीक है।

लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस फिर अपनी मूल समाजवादी विचारधारा की ओर लौट रही है। वह जिस तरह का जनकल्याणवादी राज्य या व्यवस्था बना रही है वह  समाजवादी व्यवस्था का ही नया रूप है। 

हमारे देश में नरसिंहा राव और अटल बिहारी के अलावा बहुत सारे राजनीतिक नेता,नौकरशाह और अकादमिक अब भी समाजवाद के पीछे पड़े हुए हैं। और वे आर्थिक सुधारों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध चलाकर आर्थिक सुधारों को पीछे धकेल कर देश को फिर समाजवाद के युग में ले जाने की कोशिश में लगे हैं।मुझे मनमोहन सिंह से यह शिकायत है कि आप अठ –नौ साल से प्रधानमंत्री हो क्या आप चाहते हैं कि भविष्य के इतिहास लेखक आपके बारे में यह लिखें कि नरसिंहा राव और वाजपेयी से आपको जो विरासत मिली थी उसे आपने  गंवा दिया।

आपने अभी राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की एक लाबी की बात की जो अब भी समाजवाद से अभिभूत है। इस लाबी का कहना है कि इस देश में जो समाजवादी ढांचा था उसने ही इस देश को आर्थिक संकट में फंसने से बचाया वरना विश्व के पूंजीवादी देश अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहे हैं।

संकट तो आते –जाते रहेंगे। जो लोग जोखिम के बगैर जीना चाहते हैं उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। मेरी राय में अगर हम चाहते हैं कि जिस हालत में हम हैं उसी हालत में हम रहे तो कोई दिक्कत नहीं आएगी लेकिन अगर हम प्रगति करना चाहते हैं तो बीच –बीच में इस तरह के आर्थिक संकट आते रहेंगे। जोखिम उठाएंगे तो उसका लाभ भी मिलेगा। फिर पूंजीवाद तो अपरिहार्य रूप से जोखिमभरी व्यवस्था है यह बाते संदेह से परे है। लेकिन जोखिम से क्यों डरना चाहिए ? 1929 में अमेरिका में कितना संकट था क्या अमेरिका उससे उबरकर नहीं आया। अगर हम पूंजीवादी रास्ता अपनाए तो उसमें उतार चढञाव तो होंगे ही लोकिन प्रगति होगी । दूसरी तरफ समाजवादी व्यवस्था में स्थिरता रहेगी लेकिन प्रगति भी नहीं होगी। यह हिन्दुस्तान की जनता को तय करना है कि जिस स्थिति में हैं उसी स्थिति में रहे और  कोई संकट न हो ।या हम प्रगति चाहते हैं जिसमें संकट भी आएंगे और जोखिमें भी हैं।(जारी)