चीन से व्यापार घाटा बढ़ने में बुराई क्या है

 

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन उसके साथ भारत का 29 अरब डॉलर का विशाल व्यापार घाटा भी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने चीनी जोड़ीदार ली ख छ्यांग से हाल की मुलाकात में कहा कि इस घाटे का 'कुछ किया जाना चाहिए।' लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में वे अवश्य ही यह जानते हैं कि हर व्यापारिक भागीदार के साथ व्यापार घाटे को संतुलित करने की सोच गलत है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार की खूबसूरती इसी बात में है कि यह हर देश को अपने विशिष्टि क्षेत्र में और ज्यादा महारत हासिल करने के लिए प्रेरित करता है। अपनी इस महारत का उपयोग निर्यात बढ़ाने में करके वह इससे अर्जित धन का इस्तेमाल उन चीजों के आयात में कर सकता है, जिन्हें अन्य देश ज्यादा बेहतर तरीके से बना सकते हैं। इससे सभी देशों की विशेषज्ञता किसी क्षेत्र विशेष में बढ़ती है और इसका नतीजा भूमंडलीय उत्पादकता सुधरने तथा हर पक्ष के लिए फायदे की स्थिति बनने के रूप में सामने आता है।

समझदारी की बात

भारत जिस भी चीज का निर्यात कर सकता है, उसको उसे अपने लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद जगह पर अच्छी से अच्छी कीमत लेकर बेचना चाहिए। साथ ही उसे अपनी जरूरत की चीजें ऐसी हर संभव जगह से मंगानी चाहिए, जहां वे कम से कम कीमत पर उपलब्ध हों। तात्पर्य यह कि भारत को अपेक्षाकृत कम होड़ वाले देशों (जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश) से व्यापार मुनाफे की स्थिति में रहना चाहिए जबकि अधिक होड़ वाले देशों (मसलन चीन या जर्मनी) के साथ व्यापार घाटे को स्वीकार करना चाहिए। जो देश कीमतों को लेकर जितना ज्यादा होड़ करता हो, भारत को उससे उतनी ही ज्यादा खरीदारी करनी चाहिए और उसके साथ व्यापार घाटा भी उतना ही ज्यादा रखना चाहिए। चीन का मुकाम इस मामले में अभी संसार में सबसे ऊंचा है, लिहाजा भारत का सबसे ज्यादा व्यापार घाटा उसी के साथ होना चाहिए। बेहतर होगा कि इसकी र्भत्सना करने के बजाय हम इसको इस तरह देखें कि समझदारी दिखाते हुए अपनी जरूरतें हम सबसे सस्ते सोत से पूरी कर रहे हैं।

इतने क्षुब्ध क्यों

इसका संदर्भ समझने के लिए जरा भारत-पाक व्यापार पर नजर डालें। पाकिस्तान ने लंबे समय से भारतीय सामानों के खिलाफ ट्रेड बैरियर खड़े कर रखे हैं। नतीजा यह है कि अपनी जरूरत की चीजें उसे भारत से कहीं ऊंचे दामों पर खरीदनी पड़ रही हैं। इससे भारतीय निर्यातकों और पाकिस्तानी उपभोक्ताओं, दोनों का नुकसान हो रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि वह जल्द ही भारत के साथ व्यापार को और आसान बनाएगा। ऐसा हुआ तो पाकिस्तान के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस और बढ़ जाएगा। लेकिन आथिर्क दृष्टि से यह दोनों के लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि पाकिस्तानी उपभोक्ताओं के अलावा भारतीय निर्यातकों को भी इसका फायदा मिलेगा। लेकिन कई पाकिस्तानी इस संभावना से क्षुब्ध हैं। उसी तरह, जैसे चीन के साथ भारत के बढ़ते व्यापार घाटे से कई भारतीय अभी इतने क्षुब्ध हैं। इस विक्षोभ का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि दोनों ही मामलों में घाटा सबसे सस्ते सोत से सामान खरीदने की अक्लमंदी की ओर इशारा करता है।

कई भारतीयों का कहना है कि चीन द्वारा दी जाने वाली विशाल निर्यात सब्सिडी एक अनुचित व्यापारिक कृत्य है। लेकिन माफ करें, कोई भी व्यक्ति, कंपनी या देश चीजों को उनकी लागत से सस्ता बेच कर अमीर नहीं हो सकता। आप थोड़े समय के लिए किसी चीज पर सब्सिडी जरूर दे सकते हैं, लेकिन हर चीज को घाटा खाकर बेचना आथिर्क आत्मघात है। चीन आत्मघाती तो कतई नहीं है। वह ब्याज दरों को अस्वाभाविक रूप से नीचे रखकर अपनी मुदा को चढ़ने नहीं देता। अमेरिका के साथ मिलकर हम युआन के अधिमूल्यन के लिए दबाव बना सकते हैं। लेकिन व्यापार घाटे पर इसका प्रभाव मामूली ही होगा। चीन जिन भी चीजों पर बहुत ज्यादा सब्सिडी देता है, उनके खिलाफ एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने की मांग भारतीय व्यापारी तुरंत उठाते हैं और सरकार उनकी मांग फटाफट मान भी लेती है। अन्य किसी भी देश से ज्यादा एंटी-डंपिंग ड्यूटी भारत में लगाई गई है। चीनी दूरसंचार उपकरणों पर कुछ और रोक सुरक्षा आधारों पर भी लगी है। लेकिन व्यापार घाटा फिर भी बढ़ता ही जा रहा है। इससे पता चलता है कि यहां बुनियादी मामला पराये बाजार को सस्ती चीजों से पाट देने का नहीं है। असल में यह घाटा दोनों देशों के बीच खासकर मैन्युफैक्चरिंग में मौजूद उत्पादकता के अंतर को दर्शाता है।

ज्यादातर लोगों को लगता है कि निर्यात अच्छा है और इसे लगातार बढ़ाया जाना चाहिए, जबकि आयात बुरा है और इसे घटाया जाना चाहिए। सचाई इसके उलट है। निर्यात आप उन चीजों का करते हैं जो आपके पास जरूरत से ज्यादा हों, जबकि आयात उन चीजों का किया जाता है, जिनकी आपके यहां कमी हो। कमी वाली चीज निश्चय ही बेशी चीज से ज्यादा मूल्यवान होगी। इस रोशनी में देखें तो व्यापार का मुख्य लाभ यह है कि हम उन चीजों को बाहर से मंगाकर अपनी किल्लत मिटा लेते हैं, जो हमारे पास नहीं हैं। निर्यात तो बाद की चीज है और इसकी जरूरत आयात के लिए धन जुटाने में पड़ती है।

उत्पादकता बढ़ाएं

कुछ लोग चीन-भारत व्यापार के स्वरूप को लेकर भी परेशान रहते हैं। भारत मुख्य रूप से लौह अयस्क और अन्य जिंसों का निर्यात करता है, जबकि चीन से वह बनी-बनाई चीजें, खासकर मशीनरी और टेलिकॉम उपकरण मंगाता है। ये लोग जिंसों को बनी-बनाई चीजों से निम्नतर कोटि की मानते हुए चीन-भारत व्यापार में एक किस्म का अन्याय देखते हैं। लेकिन यह सोच निराधार है। अंबानी (तेल, गैस, फाइबर), टाटा (स्टील, खाद, बिजली) और बिड़ला (अल्युमिनियम, तांबा, सीमेंट) कोई निम्नतर कोटि के उद्योगपति नहीं हैं। चीन और भारत दोनों ने ही अभी व्यापार के रास्ते में काफी दीवारें खड़ी कर रखी हैं और उन्हें देर-सबेर इनको नीचे लाना होगा। लेकिन इस मामले में भारत की चिंता व्यापार घाटा कम करने की नहीं बल्कि अपनी उत्पादकता और होड़ की क्षमता बढ़ाने की होनी चाहिए। एक बार ऐसा हो गया तो चीन समेत सारे ही देशों से भारत का व्यापार घाटा अपने आप नीचे आने लगेगा।

 

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः नवभारत टाइम्स

http://navbharattimes.indiatimes.com/thoughts-platform/viewpoint/swamina...

 

स्वामीनाथन अय्यर