राजनीति के यार्ड से निकले तो भारतीय रेल चले

उम्मीद है कि ज्यादातर सुधारवादी नए रेल मंत्री पवन कुमार बंसल की प्रशंसा करने से नहीं चूकेंगे। रेल भवन में पदभार संभालने के बाद पहले ही दिन बंसल ने यात्री भाड़ा बढ़ाने की पैरवी की और कहा कि इसके बिना भारतीय रेल वित्तीय संकट में घिर जाएगी।

बंसल का कहना सही है। रेलवे में बीते एक दशक के दौरान यात्री भाड़े में काफी सीमित बढ़ोतरी हुई है और जो थोड़ी बहुत बढ़ोतरी हुई भी है वह काफी हद तक उच्च श्रेणियों की यात्राओं तक ही सीमित रही हैं। इस नुकसान की भरपाई के लिए रेलवे समय समय पर माल भाड़ा बढ़ाता रहा है, जिसके दो अवांछित परिणाम देखने को मिले हैं। पहला, बड़ी मात्रा में माल ढुलाई अब रेलवे से न होकर सड़क मार्ग के जरिए होने लगी है। सड़क मार्ग से होने वाली ढुलाई अपेक्षाकृत सस्ती होती है, हालांकि रेल से होने वाली माल ढुलाई को ऊर्जा के लिहाज से अधिक किफायती और कम प्रदूषण फैलाने वाली माना जाता है। दूसरा, रेलवे का माल भाड़ा यात्री भाड़े की सब्सिडी बैसाखी बन गया है और यह किसी उपक्रम को चलाने के आर्थिक सिद्घांतों को पलटने जैसा है। बंसल ने यात्री भाड़ा बढ़ाने की बात की है और इस तरह उन्होंने भारतीय रेलवे में पैर पसार चुकी कई खामियां दूर करने की शुरुआत कर दी है।

फिर भी बंसल के इस बयान को वास्तविक सुधारों की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी। याद रखिए कि बंसल ने केवल यात्री भाड़ा बढ़ाने की जरूरत बताई है। अब तक किसी को पता नहीं हैं कि प्रस्तावित रेल शुल्क प्राधिकरण के भविष्य के बारे में उनके बयान का क्या मतलब है।

बंसल से पहले रेल मंत्री रह चुके सी पी जोशी ने अपने छोटे से कार्यकाल में यात्री किराया और माल भाड़ा तय करने के लिए एक प्राधिकरण के गठन के लिए कैबिनेट नोट तैयार किया था। किराया कैसे तय किया जाएगा और वह प्राधिकरण कितना स्वायत्त होगा, इसकी बारीकियां जोशी ने तय नहीं की थीं। मगर निश्चित तौर पर यह एक सुधारवादी कदम था और अगर यह लागू होता है तो रेल किराया और माल भाड़ा राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहेगा और प्राधिकरण को यह अधिकार होगा कि आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर किराया तय किया जाए।

अगर बंसल खुद को सुधारों के पैरोकार के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जैसा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री रहते जयपाल रेड्डी ने किया। रेड्डी ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने के लिए मंजूरी देने में काफी लंबा समय लगाया, मगर उससे भी बुरी बात यह रही कि उन्होंने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें तय करने का अधिकार अपने पास बनाए रखा। वास्तविक सुधार का मतलब यह नहीं है कि आप कीमतों पर अपना नियंत्रण बनाए रखें और जब भी जरूरत पड़े तो कीमतें में संशोधन करें, बल्कि असल सुधार तो यह होता है कि आप एक तंत्र तैयार करें जिसके जरिए बिना किसी राजनीतिक दबाव के कीमतें तय की जा सकें।

नए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री वीरप्पा मोइली और रेल मंत्री बंसल दोनों ही की सुधारवादी साख का परीक्षण इस बात से किया जाएगा कि ये पेट्रोलियम उत्पादों और रेलवे के यात्री किराये और माल भाड़ा तय करने के बारे में अपना नियंत्रण हटाने को तैयार हैं या नहीं।

हालांकि बंसल का काम महज रेल शुल्क प्राधिकरण गठित कर देने भर से पूरा नहीं होगा। उन्हें सफलतापूर्वक चलने वाले दो मेट्रो नेटवर्कों से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने किराया तय करने की प्रक्रिया को राजनीति से मुक्त कर के बड़ी उपलब्धि हासिल की है। दिल्ली और बेंगलूर के इन मेट्रो नेटवर्कों ने किराया तय करने की प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव और हस्तक्षेप को दूर करने के लिए अनोखी पद्घतियां अपनाई हैं। समय आ गया है कि बंसल भी भारतीय रेलवे के लिए ऐसा ही कुछ करें। हालांकि इसका एक नतीजा यह होगा कि उनका रेल बजट अपेक्षाकृत कम दिलचस्प हो जाएगा। मगर भारतीय रेलवे को जितना बड़ा फायदा होगा, उसके सामने तो यह बहुत छोटी सी कीमत है।

निश्चित तौर पर बंसल के लिए यह उपयुक्त समय है कि वह रेल बजट को अलग से पेश किए जाने की लंबे अर्से से चली आ रही परंपरा खत्म करने के लिए एक साहस भरा कदम उठाएं। भारतीय रेलवे के कुल बजट का आकार कुछ सरकारी क्षेत्र की इकाइयों से भी छोटा है। केंद्र सरकार के कुल सालाना खर्च को भी देखें तो रेल बजट उसका महज 10 फीसदी ही है। तो फिर भारतीय रेलवे को अलग से बजट पेश करने की क्या जरूरत है। इसके बजाय इसे आम बजट का एक हिस्सा बनाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारतीय रेलवे के पास दूसरी बड़ी सरकारी क्षेत्र की इकाइयों या एयर इंडिया की तरह शुल्क, नई ट्रेनें, मार्ग और परियोजनाओं की योजना तैयार करने का मौका होगा। वास्तव में इसे ही सुधारवादी कदम कहेंगे और बंसल को उस मंत्री के तौर पर याद किया जाएगा जिन्होंने इतना साहस भरा कदम उठाया।

किराये और रेल बजट के अलावा बंसल को नजदीक से इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि भारतीय रेलवे अपने पूंजीगत खर्च, पुरानी और खराब हो चुकी संपत्तियों को ठीक करने और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन की व्यवस्था किस तरह करता है। एक के बाद एक रेल मंत्री हर साल अपना बेहतर प्रदर्शन दिखलाने के लिए इस बात को दरकिनार करते गए कि अल्प अवधि को ध्यान में रखकर उठाए गए वित्तीय कदम कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं और लंबी अवधि में इससे भारतीय रेलवे की सेहत पर कितना बुरा असर पड़ सकता है। रेलवे के खातों में आंकड़ों की बाजीगीरी दिखाकर खातों में शानदार हिसाब-किताब के जरिए पूंजी खर्च को घटा हुआ बताकर सरप्लस दिखलाने की कोशिश की जाती है। लालू प्रसाद ने इसकी शुरुआत की थी और उनके बाद सभी रेल मंत्रियों ने यही किया। बसंल इस अभ्यास पर रोक लगाकर एक बेहतर मिसाल पेश कर सकते हैं। पुरानी संपत्तियों को बदलने के लिए प्रावधान और पूंजी खर्च के लिए पर्याप्त स्रोत आवंटित करना कुछ ठोस कदमों में से हैं और बंसल को इन्हें उठाने में कोई हिचक नहीं दिखलानी चाहिए।

सबसे आखिर में नए रेल मंत्री को भारतीय रेलवे पर एक और श्वेत पत्र लाने की गलती दोहराने से बचना चाहिए। दरअसल इसकी वजह से उन कदमों को उठाने में देरी होती है जिसकी रेल प्रणाली को सख्त दरकार है। इसकी बजाय रेल मंत्री को रेलवे को परिचालन की आजादी देनी चाहिए ताकि वह दक्षता के साथ काम कर सके और मुनाफा कमा सके। भारतीय रेलवे के पास सक्षम तकनीकीविदों की कोई कमी नहीं है और रेल मंत्री का सबसे बड़ा योगदान यही होगा कि वे उन्हें बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के काम करने की छूट दें। एक शुल्क प्राधिकरण, विवेकपूर्ण वित्तीय व्यवहार और रेल बजट पेश करने की परंपरा को खत्म करना, ये कुछ ऐसे कदम हैं जिनके जरिए वह अपना लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।

- ए के भट्टाचार्य
(हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार)