देश को जरूरत है नई आर्थिक सोच की

आज अगर हम नरेंद्र मोदी की आर्थिक सोच के बदले चर्चा कर रहे हैं उनकी उस टोपी के पहनने, न पहनने की, तो इसमें सबसे ज्यादा दोष हम पत्रकारों का है। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने भी उस टोपी को मुद्दा बनाकर खूब उछाला है, लेकिन जब भी उछाली गई है वह टोपी, हम पत्रकार फौरन पहुंच गए हैं वहां उसको सुर्खियों में रखने के लिए। यह नहीं पूछा हमने कभी कि अगर मोदी ने पहन ली होती वह टोपी, जो उस मौलाना ने उनको देने की कोशिश की थी, तो क्या मुस्लिमों की नजर में मोदी सेक्यूलर बन जाते? क्या टोपी न पहनने से यह साबित हो गया है कि मोदी के दिल में मुसलमानों के लिए नफरत है? नहीं, पर टीवी पर पिछले दिनों आपने देखा होगा किस तरह मोदी का जिक्र आते ही घूम-फिरकर बात उस टोपी तक पहुंचती रही है। इतनी चर्चा सुनने को मिली है उस टोपी की कि मोदी अंदर ही अंदर पछता रहे होंगे कि टोपी पहनने से उन्होंने मना क्यों किया था।
 
ऐसा लगने लगा है, जैसे मीडिया में मोदी के दुश्मन (उनके दुश्मन ज्यादा, दोस्त कम हैं) जान-बूझकर फिजूल के मुद्दों को अहमियत दे रहे हैं, ताकि जब भी मोदी का जिक्र आए, उनके आर्थिक विचारों का विश्लेषण न किया जाए। अगर ऐसा विश्लेषण होने लग गया होता अभी तक, तो हमको साफ शब्दों में कहना पड़ता कि मोदी राष्ट्रीय स्तर पर पहले राजनेता हैं जवाहरलाल नेहरू के बाद, जो एक नई आर्थिक सोच लेकर आए हैं। यह सोच उस समाजवादी आर्थिक सोच के विपरीत है, जो हमको पंडित नेहरू दे गए थे, और जिसके तहत हमने अर्थव्यवस्था को तकरीबन पूरी तरह छोड़ रखा है राजनेताओं और सरकारी अफसरों के हाथ में।
 
आज अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं, तो इसलिए कि जब सरकारी अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के हाथों में तमाम आर्थिक फैसले लेने के पूरे अधिकार दिए जाते हैं, तब भ्रष्टाचार का फैलना स्वाभाविक हो जाता है। आज हाल यह है कि छोटे से छोटा सरकारी अफसर लटकाकर रख सकता है देश के हर नागरिक को। गरीब और मध्यवर्गीय लोग इससे उतने ही परेशान हैं, जितने उद्योगपति। फर्क इतना है कि धनवान रिश्वत देकर अपना काम करवा सकते हैं, और गरीब दबकर रह जाते हैं। इन बातों को ध्यान में रखकर इस चुनाव में मोदी के सबसे अहम आर्थिक नारे को देखना चाहिए। यह नारा है-अधिक से अधिक सुशासन, कम से कम प्रशासन।
 
नेहरू-गांधी परिवार के हर सदस्य से आपने सुन लिया होगा कि मोदी ने गुजरात में उद्योगपतियों की मदद की है। राहुल गांधी अपने हर दूसरे भाषण में कहते हैं कि मोदी गरीबों की परवाह न कर परवाह करते हैं सिर्फ बड़े उद्योगपतियों की। इस इल्जाम के पीछे असलियत यह है कि मोदी बहुत पहले समझ चुके थे कि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की क्षमता सरकारी क्षेत्र में कम है और निजी क्षेत्र में ज्यादा।
 
पिछले दस वर्षों में अगर बेरोजगारी बढ़ी है इस देश में, तो इसलिए कि निजी उद्योग क्षेत्र पर इतनी पाबंदियां लगाई हैं यूपीए सरकार ने कि निवेशकों ने निवेश करना बंद कर दिया था भारत में। निवेशक अगर निवेश नहीं करेंगे, तो कहां से आएंगी वे नौकरियां, जिनकी जरूरत है इस देश के नौजवानों को? आज युवा मैकडोनाल्ड में, नए सिनेमाघरों और रेस्टोरेंट्स में काम करते दिखते हैं। जो ज्यादा शिक्षित हैं, उनको मिलती हैं इतनी बेहतर नौकरियां निजी उद्योग में, जो न होतीं, तो बेरोजगारी की समस्या और भी गंभीर हो गई होती अब तक।
 
बेरोजगारी इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। और अगर आज नौजवान मोदी के साथ बांध चुके हैं सारी उम्मीदें, तो इसलिए कि वे समझ गए हैं कि मोदी भारत को एक संपन्न देश में तब्दील करने का सपना देख रहे हैं। संपन्नता के सपनों को साकार करने के लिए नई आर्थिक सोच की जरूरत है।
 
 
- तवलीन सिंह
साभारः अमर उजाला

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