अमेरिका के इतिहास के सबसे काले दिनों से भारतीयों को कुछ जरूरी सबक सीखने चाहिए

भारतीय सात जनवरी की सुबह उठे तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थक यूएस कैपिटल में घुस गए थे। मौजूदा राष्ट्रपति द्वारा लोकतंत्र पर हमला करना, निष्पक्ष चुनाव को पलटने का प्रयास करना अमेरिकी इतिहास में मनहूस पल था। भारत में प्रतिक्रिया बंटी हुई थी। कुछ को चिंता थी कि कमजोर अमेरिका आक्रामक चीन पर नियंत्रण कर भारत की मदद नहीं कर पाएगा।

वहीं कुछ दुनियाभर को दशकों से लोकतंत्र पर ज्ञान देने वाले अमेरिका को खुद से ही उलझता देख खुश थे। वॉट्सऐप पर मैसेज फॉर्वर्ड हो रहे थे: ‘कोरोना के दौर में यात्रा प्रतिबंधों के कारण इस साल अमेरिका समर्थित तख्तापलट घर में ही होगा।’ हालांकि समझदार भारतीय डरे हुए थे कि अगर दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र लगभग रसातल में पहुंच सकता है, तो अगर यह भारत में होता तो

क्या होता, जहां ज्यादा कमजोर संस्थान हैं?
डर की जगह, मेरी विपरीत प्रतिक्रिया थी। ट्रम्प समर्थक संवैधानिक व्यवस्था पलटने में असफल रहे। ऐसा इसलिए, क्योंकि लोकतंत्र संस्थानों को शक्ति देते हैं, शासकों को नहीं। अमेरिकी कांग्रेस ने निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन की जीत की पुष्टि की। यहां तक कि ट्रम्प भी अंत में कानून से ऊपर नहीं थे। यह अमेरिकी लोकतंत्र की जीत थी, जिसने अपना लचीलापन साबित किया। उदारवादी लोकतंत्र उतने ही मजबूत होते हैं, जितने उनके संस्थान स्वतंत्र होते हैं और अधिकारी ईमानदार। भारत के लिए सबक यह है कि वह कमजोर संस्थान मजबूत करे।

ज्यादा चिंताजनक तो भारत और अमेरिका में दुखद बंटवारा है, जिससे ‘नफरत का युग’ आया है। कैपिटल पर हमला उन्मादी नेता द्वारा भड़काए जाने का इकलौता मामला नहीं था। यह उस बड़ी बीमारी का संकेत था, जिसके साथ राष्ट्रपति बाइडेन को रहना होगा। भारत में हमें अपने असभ्य ध्रुवीकरण पर चिंतित होना चाहिए।

हमारे भाजपा और कांग्रेस दल अमेरिका की रिपब्लिकन्स और डेमोक्रेट्स जैसे ही हैं। ये ऐसे प्रागैतिहासिक कबीलों जैसा व्यवहार कर रहे हैं, जो एक एक-दूसरे को जड़ से खत्म करने पर तुले हों। वे भूल गए हैं कि वे एक ही देश के निवासी हैं। यह कबीलाईपन दो सबसे बड़े लोकतंत्रों को खतरे में डाल रहा है। लोकतंत्र मतभेदों और नापसंदगी को स्वीकारता है, विरोध और असहमति को जगह देता है, लेकिन हमेशा सहयोग के आधारभूत नियमों के तहत।

भारत की विभाजनकारी राजनीति के लिए यह सबक है कि अमेरिका में हथियारबंद बगावत केवल सतही उन्माद नहीं था। यूगॉव का सर्वे बताता है कि 45% रिपब्लिकन्स कैपिटल बिल्डिंग पर हमले को सही मानते हैं। रायटर/इप्सॉस पोल के मुताबिक 68% रिपबल्किन्स को लगता है कि अमेरिकी चुनावों से ‘छेड़छाड़’ हुई। 7.3 करोड़ अमेरिकियों ने ट्रम्प को वोट दिया, यानी अमेरिका में 5 करोड़ लोगों को चुनावों की वैधता पर शक है।

मैं भी पिछले दो हफ्तों में असभ्य ध्रुवीकरण का शिकार हुआ। जब मैं विवेकपूर्ण कृषि सुधारों का बचाव कर रहा था, तब 4 जनवरी को ट्रोल्स ने भला-बुरा कहा। दुर्भाग्य से एक टीवी चैनल ने मेरे बयान के पहले हिस्से को ही हेडलाइन बनाया: ‘लोकतंत्र में सुधार लाना मुश्किल है।’ ट्रोल्स ने मुझ पर तानाशाही के समर्थन का आरोप लगाया। जबकि मैंने कहा था कि लोकतंत्र में सुधार करना मुश्किल होता है, इसीलिए समझदार सुधारक लोगों को साथ लेते हुए 20% समय सुधार में और 80% सुधार बेचने में खर्च करता है। मोदी यह करने में असफल रहे हैं।’

दूसरी घटना आईआईटी जम्मू के दीक्षांत सामारोह में 9 जनवरी को हुई। मुझे एक सुंदर काली टोपी उतारने कहा गया, जो आयोजकों ने दी थी। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने इसे कश्मीरी मुस्लिम टोपी मानकर आपत्तिजनक बताया। दोनों घटनाओं से मुझे कड़वाहट महसूस हुई। ये मोदी को पसंद और नापसंद करने वाले लोगों के बीच विभाजन का नतीजा थीं। इसमें आम भारतीय की जगह नहीं है, जो न मोदी भक्त है, न कांग्रेसी, जो मुद्दों को अपनी समझ से देखता है, न कि हमें बांटने वाले चश्मे से।

कैपिटल पर हंगामा अमेरिकी लोकतंत्र की परीक्षा थी। भारत को इसे चेतावनी समझते हुए अपने संस्थानों को मजबूत करना चाहिए, विशेष तौर पर स्वेच्छाचारी शक्ति को। हमारे कुछ संस्थान अच्छा काम कर रहे हैं, जैसे हमारा चुनाव आयोग, जो अमेरिका से कहीं बड़ा चुनाव आयोजित करता है। लेकिन हमारी न्यायपालिका, पुलिस, नौकरशाही और संसद में सुधार की बहुत जरूरत है। न्यायपालिका की बड़ी असफलता यह है कि भारतीय अक्सर कहते हैं कि ‘इस देश में न्याय मिलने में 10-15 साल क्यों लगते हैं?’ जब बात पुलिस की आती है तो अमेरिका और भारत, दोनों में ही बड़े सुधारों की जरूरत है। भारत में पुलिस वीआईपी की सुरक्षा में लगी रहती है, और आम आदमी नजरअंदाज होता है।

कोरोना ने अमेरिका और भारत को विभाजनकारी राजनीति से मिले घाव भरने का मौका दिया है। अमेरिका में कायराना हरकत साबित करती है कि पुरानी नफरतें जिंदा हैं। भारत में कम से कम सीएए/एनआरसी के प्रति जल्दबाजी खत्म हो गई, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुरानी नफरतें वापस नहीं आएंगी। दोनों देश कटुताओं की भारी कीमत चुका रहे हैं। इसमें वह ऊर्जा बर्बाद हो रही है, जिसे महामारी के बाद अर्थव्यवस्थाओं को ठीक करने में खर्च होना चाहिए। दोनों देशों को ये असभ्य युद्ध खत्म करने चाहिए।

- गुरचरण दास (लेखक इंडिया अनबाउंड के लेखक और जाने माने स्तंभकार हैं)

यह लेख पहलीबार दैनिक भास्कर समाचार पत्र में 'विभाजनकारी राजनीति से मिले घाव भरने का मौका' शीर्षक के तहत प्रकाशित हुआ था।

गुरचरण दास