जरूरत हैः उपनिवेशवाद के एक नए सिद्धांत की

आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

हांगकांग 1947 में भी एक उपनिवेश बना रहा। भारतीय नेताओं ने उसके साम्राज्य के बोझ तले दबे होने को लेकर अफसोस भी जताया था। आज 50 साल बाद वह अफसोस हास्यास्पद लगता है। भारत 320 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ दुनिया के सबसे गरीब देशों में गिना जाता है, जबकि हांगकांग की प्रति व्यक्ति आय 23 हजार डॉलर है। जिस देश को आजादी मिली वह तो गरीब बना रहा और जो उपनिवेश बना रहा वह बेशुमार अमीर बन गया। वाकई हांगकांग अपने औपनिवेशिक मालिक से कई गुना अमीर बन चुका है। आज ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति आय 18700 डॉलर है।

इस विरोधाभास के कारणों का खुलासा जरूरी है। लेकिन मेरी राय में इस बेहद स्वाभाविक से लगने वाले विषय में किसी की रूचि नहीं दिखती। भारत और हांगकांग के बीच के विशाल अंतर से जाहिर है कि उपनिवेशवाद के पुराने सिद्धांत को भले ही सिरे से खारिज न किया जाए, लेकिन उसके नए सिरे से अध्ययन की तो जरूरत है ही।  लेकिन ऐसा करने पर हमारे आजादी के आंदोलन के सम्मानजनक नेता बेवकूफ लगने लगेंगे। इसलिए कोई भी उस विषय का जिक्र तक नहीं चाहता जो आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर बहस का गर्म विषय होना चाहिए। मैं इसी साल की शुरूआत में हांगकांग में था और मैंने फार ईस्टर्न इकानॉमिक रिव्यू से जुड़े तीन भारतीय पत्रकारों के सामने यह मसला उठाया था। मैंने कहा, चलिए बात की शुरूआत इस अविवादित तथ्य से करते हैं कि ब्रिटिशों ने भी उनसे पहले आए हमलावरों की ही तरह तोड़-फोड़, दमन, लूट और बलात्कार का दुष्चक्र चलाया था। यह भी मान ही लिया जाए कि ब्रिटिश पहले के हमलावरों के विपरीत कानून, न्याय, प्रशासन और औद्योगिक संस्थाओं का आधुनिक तंत्र लाए। मैंने कहा, इतना सकारात्मक कदम उठाने के बाद भी तीसरी दुनिया और औपनिवेशिक शोषण को निश्चित तौर पर बुरा ही मानते हैं। फिर भला कैसे इस तंत्र ने हांगकांग को ब्रिटेन से ज्यादा धनी बना दिया।

हांगकांग के पत्रकारों के पास इसका कोई माकूल जवाब नहीं था। उनका कहना था कि इतने सालों में उपनिवेशवाद का चेहरा बदल गया है और शोषण भी थम गया है। लेकिन वे ऐसे किसी ब्रिटिश नियम या निर्देश विशेष का जिक्र न कर सके जिसने इस व्यवस्था को बदल डाला। बातों में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ है, लेकिन उनमें से कारण विशेष कोई नहीं बता पाया।

अब मैं एक और कहानी का जिक्र कर बात बदलता हूं। कुछ माह पहले नई दिल्ली के आरआईएस में आयोजित एक सेमिनार में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अजित सिंह ने दुनिया के विश्वयुद्ध के बाद के इतिहास की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि 50 और 60 के दशक स्वर्णिम युग थे, जब पूरी दुनिया का रिकार्ड दर से विकास हुआ था। उन्नत और उन्नतिशील देशों में संपन्नता बढ़ी। लेकिन 70 के दशक के बाद विकास धीमा पड़ गया। उन्होंने कहा, ऐसा मुद्रा की तरलता, खुले पूंजी बाजार और सरकार के नियंत्रण में कमी के कारण हुआ।

कई अन्य वक्ताओं के विचार अलग थे। डॉ. मनमोहन सिंह ने इस बात की ओर सबका ध्यान दिलाया कि 50 और 60 के दशक को संपन्नता और प्रगति का युग और बाद के वक्त को निराशानजक बताने का एक चलन सा हो गया है। उन्होंने श्रोताओं को याद दिलाया कि 50 और 60 के दशक में कई देशों (खासतौर पर अफ्रीका) में उपनिवेशवाद मौजूद था। ये वे देश थे जो यह शिकायत करते थे कि औपनिवेशिक मालिक उनको लूट रहे हैं। इन उपनिवेशों ने 50 से 60 के दशक में तेजी से आर्थिक प्रगति (कई का सकल घरेलू उत्पाद 5 से 6 फीसदी तक था) की, फिर भी वे खुद को उपनिवेशवाद के कारण गरीब और शोषित मानते थे। ये सभी उपनिवेश 70 के दशक में आजाद हो गए। अपने मूल संसाधनों के उपभोग की बजाय इन देशों ने विदेशी मदद (कई बार तो सकल राष्ट्रीय उत्पाद की आधी या ज्यादा) की बाढ़ सी देखी। इस मदद से शुरूआती दौर संपन्नता का रहा, लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि मदद बेकार जा रही है, कम हो रही है और ये देश समस्याओं से घिर गए। दो दशक की आजादी और इतिहास में अनदेखी बाहरी आर्थिक मदद के बावजूद, आज कई अफ्रीकी देश उतने ही गरीब हैं जितने कि आजादी के वक्त थे।

डॉ. मनमोहन सिंह के मुताबिक उपनिवेशवाद की प्रकृति और इतिहास पर नए सिरे से विचार की जरूरत है। मैं उनसे सहमत हूं। यह मामला उतना सीधा-सरल नहीं है, जितना कि कभी दिखता था। आजादी के बाद से भारत का प्रदर्शन भले ही निराशाजनक रहा हो, लेकिन अफ्रीका के हालात तो पूरी तरह विनाशकारी रहे है। इस दौरान उपनिवेश ही बने रहे देश (हांगकांग, बरमूडा की तरह) और साम्राज्यवाद की कठपुतली समझे जाने वाले देश (कोरिया, ताइवान, सिंगापुर) बेहद संपन्न हो गए। उपनिवेशवाद को सारे संकटों का मुक्तिदाता कहना उतना ही मूर्खतापूर्ण होगा जितना कि उसे जाहिराना लूट कहना। इतिहासकारों को राष्ट्रीय आंदोलन की भाषणबाजी और नस्लवाद के भ्रमित करने वाली सोच से उबरकर वास्तविकता का एक नया संस्करण गढ़ना होगा।

जब देश आजाद हुआ तब मैं एक स्कूली छात्र था। मुझे याद है कि हमसे बड़े बच्चे कहा करते थे कि अब भारत संपन्न और ब्रिटेन कंगाल बन जाएगा। जब ब्रिटेन ने एक-एक कर उपनिवेश छोड़ना शुरू किए तो मुझे लगने लगा कि वह लगातार गरीब होता चला जाएगा। इसके उलट, मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि 1950 और 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इतनी आर्थिक तरक्की की कि जिसकी कोई मिसाल नहीं, ठीक उसी दौरान जब वह एक-एक कर अपने उपनिवेश गंवाता जा रहा था। मैंने बाद में ब्रिटिश मार्क्सवादी जॉन स्ट्रेची की किताब 'द एंड ऑफ एम्पायर' में इस कहानी को अच्छी तरह से दर्ज पाया। इस किताब में ढेर सारे आंकड़े इस सोच को गलत साबित करते हैं कि ब्रिटेन का ढांचा औपनिवेशिक शोषण पर टिका था। साथ ही यह भी बताया गया है कि उपनिवेशों से निजात पाना ब्रिटेन के लिए कैसे फायदेमंद साबित हो रहा था।

यूरोप में औपनिवेशिक और गैरऔपनिवेशिक ताकतों की प्रति व्यक्ति आय की तुलना इसकी पुष्टि करती हैं। यूरोप के सबसे अमीर देश हैं, स्विट्जरलैंड (40,630 डॉलर), नॉर्वे (31,250 डॉलर), डेनमार्क (29,980 डॉलर) और जर्मनी (27,510 डॉलर)। ये सभी फ्रांस (24,990 डॉलर) और जर्मनी (27,510 डॉलर) की तरह गैरऔपनिवेशिक देश हैं। ब्रिटेन (18,700 डॉलर) की तरह दो बड़ी औपनिवेशिक ताकतें रहे स्पेन (13,580 डॉलर) और पुर्तगाल (9,740 डॉलर) को हमेशा पश्चिम यूरोप के सबसे गरीब देशों में गिना जाता रहा है। वाकई, पुर्तगाल को तो 1960 के दशक तक विकासशील देश माना जाता था और पूरी दुनिया से उसे मदद मिलती थी। स्पेन और पुर्तगाल को सबसे अंत में उपनिवेश छोड़ने वाले देशों में गिना जाता है। इसके बाद ही दोनों ने तरक्की की। इसके कई कारण थे। ऐसे में हमें अतिउत्साह दिखाकर बेवजह इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए कि उपनिवेशवाद से उतना धन नहीं मिला जैसा कि पहले सोचा जा रहा था।

उपनिवेशवाद का क्रांतिकारी आकलन करने वाला एक व्यक्ति डेंग जियाओपिंग है। उनकी राष्ट्रवादी सोच पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। फिर भी उन्होंने यह बात सुनिश्चित की कि जब ब्रिटेन हांगकांग को चीन को वापस करेगा तो उपनिवेश के युग की अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। हांगकांग को उपनिवेशवाद की अवैध नस्ल मानने वाले माओ को यह फैसला जरूर नाराज करता। डेंग, शोषण से ऊपर उठकर यह ताड़ने में सफल रहे कि हांगकांग के आर्थिक मॉडल को कम्युनिस्ट देश में भी सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे उपनिवेशवाद के आर्थिक तंत्र के लिए सबसे बड़ी तारीफ माना जा सकता है। केवल इसी एक वजह से इसे नए इतिहास की दरकार है।

- टाइम्स ऑफ इंडिया में 10 अगस्त 2003 को प्रकाशित

स्वामीनाथन अय्यर