चीन में नेतृत्व परिवर्तन के निहितार्थ

यह महज संयोग ही है कि जिस समय म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की चालीस साल बाद भारत के दौरे पर थीं, ठीक उसी समय हमारे पड़ोस चीन में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की 18वीं कांग्रेस की बैठक का आयोजन किया जा रहा था। दुनियाभर में इस कांग्रेस पर सबकी निगाहें थीं। खासकर भारत के लिए तो एक पड़ोसी होने के नाते यह और भी अहम था। जहां बरसों की नजरबंदी के बाद रिहा हुई सू की लोकतंत्र की पड़ताल करने के लिए इन दिनों लोकतांत्रिक देशों का दौरा कर रही हैं, वहीं चीन में इन दिनों पिछले पचास साल से चले आ रहे माओवादी ढांचे को तोड़ने की छटपटाहट साफ नजर आ रही है।

दरअसल, मौजूदा बहुध्रुवीय विश्व में ताकतवर देशों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अपने सहयोगियों के साथ मजबूत गठबंधन बनाना ही है। भले ही उसका आधार राजनीति से ज्यादा आर्थिक ही क्यों न हो। शीतयुद्ध और भूमंडलीकरण के बाद दुनिया के बदलते समीकरण की हकीकत को चीन भी बखूबी जानता है। यही कारण है कि हाल के दिनों में चीन में भारत के प्रति रवैये में काफी नरमी देखी जा रही है। विकासशील भारत आज भी विकसित देशों के लिए एक शानदार बाजार साबित हो रहा है। सस्ता श्रम और कम लागत, उत्पादन की खपत ये सारी चीजें किसी भी अर्थव्यवस्था को पनपने के लिए एक सुनहरा अवसर देती हैं। परिवर्तन का संक्रमण दुनिया के हरेक देश को अपनी चपेट में ले चुका है। बने-बनाए ढांचे टूट रहे हैं। पुरानी मान्यताएं ध्वस्त हो रही हैं। मा‌र्क्सवादी लेनिन को जहां नए रूस ने नकार दिया है, वहीं 1949 में गणतंत्रवादी चीन की स्थापना करने वाले माओत्से तुंग की विचारधारा को सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने हाल में ही पार्टी के प्रमुख दस्तावेज से माओ की विचारधारा शब्द को हटा दिया था। सम्मेलन के दौरान ही देश में कई जगह माओ के पोस्टर भी फाड़े गए। यानी कुल मिलाकर परिवर्तन यहां भी खदबदा रहा है।

आर्थिक सुधारों को तवज्जो- चीन में राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की मांग जोर पकड़ने लगी है। तिब्बत की आजादी के लिए जहां आत्महत्या करने का सिलसिला जारी है, वहीं हांगकांग के लोग अपनी स्वतंत्र प्रणाली के लिए चीन सरकार का अक्सर विरोध करते नजर आते हैं। अब शायद ही 1989 की दमनकारी थ्यानमन चौक जैसी घटना की पुनरावृत्ति हो। भूमंडलीकरण की आंधी यांगशी नदी की ठंडक लेकर चीन में माहौल को बाजार के अनुरूप खुशनुमा बनाने पर आमादा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण सीपीसी कांग्रेस में देखने को तब मिला, जब देश में सुधारों के समर्थक नेताओं को बतौर राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली केकियांग को देश की कमान सौंपी गई। इन नेताओं का खुद भी मानना है कि देश को महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुधारों की गति तेज करने में देरी नहीं करनी चाहिए। हॉलीवुड फिल्मों के शौकीन जिनपिंग जब फूजियान प्रांत के गवर्नर रहे तो उन्होंने मुक्त व्यापार व्यवस्था को वहां बढ़ावा दिया।

अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट ली का मानना है कि चीन को सोशलिस्ट बाजार अर्थव्यवस्था में सुधार की गति को तीव्र करना चाहिए। उन्होंने चीन में आर्थिक समाजवाद को बरकरार रखे जाने के महत्व पर बल दिया। ग्लोबल टाइम्स के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, हर दस में आठ चीनियों का मानना है कि देश में राजनीतिक सुधारों की पहल होनी चाहिए। बीते 10 साल में चीन की अर्थव्यवस्था और समाजिक विकास से संतुष्ट 81.4 फीसद लोगों का कहना था कि वे देश में राजनीतिक सुधारों का समर्थन करते हैं। शेंजेन यूनिवर्सिटी के कंटेंपरेरी चाइनीज पॉलिटिक्स रिसर्च इंस्टीट्यूट में निदेशक हुआंग वेइपिंग के मुताबिक, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के खत्म न होने कारण सुधारों के लिए लोगों की अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। वहीं चाइनीज एकेडमी ऑफ गवर्नेस में प्रोफेसर वांग युकि का कहना है कि देश को त्वरित सुधारों की बेहद जरूरत है। राजनीतिक सुधारों की धीमी गति के कारण ही सत्ता का बेजा इस्तेमाल बढ़ रहा है। 1949 से आरंभ हुए माओवादी शासन के बाद क्रमश: डेंग जियाओपिंग, जियांग जेमिन और हू जिंताओ के बाद पांचवीं पीढ़ी के जिनपिंग से देश में नए राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की उम्मीद है। वास्तव में चीन में लोकतंत्र लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। व‌र्ल्ड डेमोक्रेसी इंडेक्स में चीन की स्थिति अच्छी नहीं है।

सरकारी नियंत्रण वाले समाचार पत्र पीपुल्स डेली ने भी अपने लेख चाइनाज पाथ टू डेमोक्रेसी में यह बात स्वीकारी है। लेख के मुताबिक, लोकतंत्र महज एक व्यवस्था नहीं, बल्कि जिंदगी जीने का एक तरीका है, जिसकी लोगों को जरूरत है। जैसे-जैसे कानून के शासन को विस्तार दिया जाता है, लोगों में और अधिक जानने की जागरूकता बढ़ती है। चीन में लोकतंत्र अभी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है, जिसकी लोगों को उम्मीद है। हालांकि चीन लोकतंत्र में सुधार की धीमी ही सही, लेकिन कोशिश कर रहा है। चीन में बहुदलीय लोकतंत्र की मांग अरसे से उठती रही है। इसके अलावा पार्टी के भीतर लोकतंत्र, कानून व्यवस्था के तहत शासन, दूसरे देशों की तरह आम चुनाव, देश में एक निगरानी तंत्र विकसित करने की मांगे भी गाहे-बेगाहे उठती रही हैं। 1980 में देंग शाओपिंग ने कहा था कि शक्तियों और नौकरशाही का अति केंद्रीकरण, निगरानी की कमी और शीर्ष नेताओं का ताउम्र कार्यकाल देश की राजनीतिक व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याएं हैं। पिछले कुछ वर्षो में नेताओं के ताउम्र कार्यकाल को खत्म करने के अलावा कुछ सुधार हुए हैं।

भारत की उम्मीदें- चीन में नई पीढ़ी के नेताओं के हाथों में मिली कमान भारत के लिहाज से काफी अहम है। इसलिए भी कि इसी साल भारत-चीन युद्ध के 50 साल पूरे हुए हैं। आश्चर्यजनक रूप से चीन ने इस संबंध में पिछले दिनों कहा है कि दोनों देशों को अतीत की कड़वाहट भुलाकर भविष्य के बेहतर साझा सपने बुनने चाहिए। ऐसे में चीन के नए नेतृत्व से भारत की उम्मीदें बढ़ी हैं। दक्षिण एशिया में उभरते हुए भारत के साथ चीन के रिश्ते में मिठास आना लाजिमी है। मौजूदा दौर में भारत-चीन के बीच तकरीबन 75 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है। हालांकि कूटनीतिक स्तर पर दोनों देश के बीच अब भी सार्थक तौर पर विश्वास बहाली की कमी बरकरार है। अक्साई चिन, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम सीमा विवाद और तिब्बत की समस्या को एक तरफ रखकर आपसी सहयोग की नई संभावनाओं को तलाशना भारत और चीन दोनों देशों के लिए अनिवार्य होगा। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए बने पंचशील सिद्धांतों पर आज दोनों देशों को एक साथ आगे आना होगा। विश्व व्यापार सम्मेलन में कृषि सब्सिडी और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर हमेशा दोनों देश साथ खड़े नजर आते हैं। दोनों आर्थिक तौर पर एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी होने के बावजूद एक-दूसरे के लिए विस्तृत बाजार हैं और एक-दूसरे की जरूरतों को साझा कर सकते हैं। भारत के लिए इस समय सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा परिषद में अपनी स्थायी सदस्यता के सशक्त समर्थन का है। ऐसे में खुद परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते चीन का भी समर्थन अनिवार्य हो जाता है।

जिंताओ और वेन जियाबाओ के कार्यकाल को भारत-चीन संबंधों में सुधार वाला माना जाता है। हालांकि सीमा विवाद और जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को नत्थी वीजा दिए जाने संबंधी मुद्दे सुलझाए जाने बाकी हैं। हाल ही में कंबोडिया में आसियान सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके चीनी समकक्ष वेन जियाबाओ की सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय मुलाकात में जटिल विषयों पर बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। इसके मुताबिक नवंबर के अंत में दिल्ली में भारत-चीन के बीच सामरिक-आर्थिक वार्ता होगी। व्यापारिक असंतुलन पर चिंता जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय दवा कंपनियों, सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र की चीनी बाजार में ज्यादा भागीदारी बढ़ाने की जरूरत बताई और चीन को भारत के बुनियादी क्षेत्र में निवेश का न्यौता दिया। ऐसे में ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) की मजबूती और भारत-रूस-चीन त्रिकोण की परिकल्पना के साकार होने से दोनों देश एशिया में अपना परचम फहरा सकते हैं।

- दिनेश मिश्र
साभारः दैनिक जागरण