सट्टेबाजीः समाधान नहीं है प्रतिबंध

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) क्रिकेट का सातवां संस्करण जैसे जैसे अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, इस खेल का रोमांच और खेल प्रेमियों के बीच उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। हालांकि बीच बीच में आईपीएल के पिछले संस्करण के दौरान की "स्पॉट फिक्सिंग" की घटना से संबंधित खुलासे से मन में कड़वाहट घुल जाती है। फिर अचानक से क्रिकेट के इस प्रारुप पर प्रतिबंध लगाने की मांग शुरू हो जाती है। नाराज लोग विशेषकर खेल विश्लेषक हर तरह की सट्टेबाजी पर रोक लगाने और फिक्सरों और सट्टेबाजों को जेल में डालने की मांग करने लगते हैं। 
 
यह अत्यंत हास्यास्पद है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी एक बेइमान रिपोर्टर की गलती पर पूरी मीडिया फैटर्निटी को प्रतिबंधित कर देना। अगर नहीं तो कुछ क्रिकेटरों के भ्रष्ट होने की सजा खेल के इस पूरे प्रारुप को क्यों? विश्लेषकों को समझना चाहिए कि यदि आईपीएल पर रोक लगता है तो कल को इसके अन्य प्रारूपों पर भी इसका खतरा मंडराने लगेगा क्योंकि प्रतिबंध के बाद सटोरियों के पास उन प्रारूपों में पैठ बनाने का विकल्प उपलब्ध रहेगा। वैसे तो इन दिनों टीवी सीरियलों में किसी पात्र के मरने अथवा किसी प्रिंस के गड्ढे में गिरने की स्थिति में भी सट्टा लगने का प्रचलन शुरू हो गया है। वैसे भी क्या गारंटी है कि आईपीएल पर प्रतिबंध लगा देने से ये सटोरिेये वनडे क्रिकेट और टेस्ट क्रिकेट को फिक्स नहीं करने लगेंगे। वनडे व टेस्ट क्रिकेट पर बैन लगाने पर दूसरे खेलों पर सट्टा नहीं लगाएंगे। हाल तो ये है कि हाल ही में संपन्न हुए चुनाव के बाद सरकार मोगी की बनेगी या नहीं इसपर भी खुलकर सट्टा लगाया जा रहा है। तो क्या हम चुनाव पर भी प्रतिबंध लगा देंगे।   
 
दरअसल, स्पॉट फिक्सिंग स्कैंडल का असली सबक यह है कि क्रिकेट से जुड़ी सट्टेबाजी को गैरकानूनी बनाकर हमने इसे भूमिगत बना दिया है और इस क्रम में अपराधी चरित्रों को इस पर कब्जा जमाने का मौका दे दिया है। अच्छा तो ये होता कि सट्टेबाजी को कानूनी रूप दे दिया जाता और इसे निश्चित नियमों के तहत चलाया जाता। देखा जाए तो स्टॉक मार्केट भी एक प्रकार का सट्टा ही है और इससे जुड़े लोग सट्टेबाज। वैसे भी सरकार स्टॉक मार्केट को नियमों के मुताबिक चलाती है और यहां लगाए जाने वाले सट्टों से उसे अच्छी-खासी आमदनी होती है। इसी तर्क का अनुसरण उसे क्रिकेट, चुनाव और सट्टे के अन्य रूपों में भी करना चाहिए। घोड़े (घुड़दौड़) पर सट्टा लगाना कानूनी है, लेकिन क्रिकेट पर नहीं। आखिर इतना भेदभाव क्यों? क्रिकेट पर लगने वाले सट्टों का कानूनी होना और नियमानुसार इनका संचालन किया जाना मैच फिक्सिंग रोकने का सबसे पुख्ता उपाय है। वह इसलिए, क्योंकि सटोरिये और सट्टेबाजी, दोनों खुले में आ जाएंगे। इससे हजारों कानूनी नौकरियां पैदा होंगी, ढेर सारा टैक्स आएगा, काले पैसे का जखीरा कानूनी दायरे में आ जाएगा और अंडरवर्ल्ड की आमदनी का बहुत बड़ा जरिया बंद हो जाने के चलते समाज को उसके दुष्प्रभाव से भी राहत मिलेगी।
 
भारतीय अदालतें संयोग आधारित खेलों और कौशल आधारित खेलों के बीच फर्क करती हैं। इनमें पहली वाली किस्म पर रोक और दूसरी वाली को इजाजत है। घुड़दौड़ का विजेता चुनना कौशल काम माना जाता है और यह कानूनी है। लेकिन चुनाव या क्रिकेट का विजेता चुनना गैरकानूनी माना जाता है, जबकि थोड़े-बहुत कौशल की जरूरत इसमें भी पड़ती ही है। यह बेवकूफी नहीं तो और क्या है? ज्यादातर समाजों में जुए को अनैतिक कर्म माना जाता है और प्राय: इस पर रोक हुआ करती है। लेकिन मद्य निषेध के अनुभव को हमें चेतावनी की तरह लेना चाहिए। अमेरिका में ऐसी रोक 1932 में लगी थी और इसे चर्चों, आत्मसंयम समूहों और महिला संगठनों का जबर्दस्त समर्थन प्राप्त था। सरकार ने यह कदम उच्च नैतिक आदर्शों से प्रेरित होकर उठाया था। अफसोस, कि इसने शराब के गैरकानूनी व्यापार, काले धन और गिरोह युद्धों को बढ़ावा दिया। नतीजा यह हुआ कि जल्द ही अमेरिकी मद्य निषेध का फैसला वापस लेना पड़ा।
 
भारत में भी कई राज्यों ने ऐसी कोशिश की, लेकिन पाया कि इसे लागू करना असंभव है। अभी शराब की बिक्री लगभग सभी राज्यों में कानूनी है, लेकिन यह नियमों के तहत ही की जाती है। सरकारों को इससे काफी आमदनी होती है और हजारों लोगों को कानूनी रोजगार भी मिला हुआ है। बाकी लोगों द्वारा अनैतिक आनंद माने जाने वाले इस नशे से लाखों उपभोक्ताओं को संतुष्टि मिल रही है सो अलग। ऐसे ही आनंद का एक स्रोत जुआ भी है और इसके प्रति भी वैसा ही नजरिया अपनाने की जरूरत है। कुछ मामलों में जुआ लत और बर्बादी का सबब बन सकता है, लेकिन इसे भूमिगत गतिविधि बना देने से जितनी मुश्किलें हल होती हैं, उससे कहीं ज्यादा नई मुश्किलें पैदा होती हैं। कई देशों में खेलों पर सट्टा लगाना पूरी तरह कानूनी है। ब्रिटेन में तो हर नुक्कड़ पर एक बेटिंग शॉप मिल जाती है। वहां के सटोरिये कोई माफियानुमा जीव नहीं बल्कि इज्जतदार कंपनियां हैं। इनमें सबसे बड़ी हैं विलियम हिल, लैडब्रोक्स और कोरल। हर साल ये जुआखोरी की लत छुड़ाने से जुड़ी रिसर्च, शिक्षा और ऐसी अन्य मदों पर 50 लाख पाउंड खर्च करती हैं। भारत में भी इस तरह की कुछ शर्तें उन पर लागू की जा सकती हैं।
 
कोई नहीं जानता कि भारत में अवैध सट्टेबाजी का आकार क्या है। पुलिस का अनुमान है कि सिर्फ छह हफ्ते चलने वाले आईपीएल में 20 हजार करोड़ रुपये का सट्टा लगता है। सभी खेल और चुनाव मिलाकर यह रकम शायद दसगुनी तक पहुंचती हो। इसे कानूनी रूप देकर 20 फीसदी की दर से इस पर टैक्स वसूला जाए तो साल में करीब 40 हजार करोड़ की आमदनी होगी। इसके अलावा सटोरियों, जुआ उद्योग के कर्मचारियों और भाग्यशाली विजेताओं से जो इन्कम टैक्स वसूला जाएगा, सो अलग। ढेर सारा काला धन सफेद हो जाएगा। एक कानूनी कारोबार दाऊद और अन्य अपराधियों के राज की जगह ले लेगा।
 
ऐसा एक भी अकेले उपाय की कल्पना करना कठिन है, जो समाज के लिए इतना फायदेमंद हो और साथ ही इतने सारे नुकसान मिटाता हो। सट्टेबाजी को कानूनी रूप देने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके बल पर आप चुनाव भले न जीत पाएं लेकिन इसके सकारात्मक पहलू इतने ज्यादा हैं कि इससे आपको कुछ न कुछ मदद जरूर मिलेगी। सटोरियों और वीआईपी जुआरियों का पीछा करने का बजाय तत्काल सारा ध्यान इन्हें कानूनी शक्ल देने की तरफ मोड़ा जाना चाहिए। पुलिस के पास जब लोगों की इतनी कमी हो कि बलात्कार और हत्या पर काबू पाना उनके लिए नामुमकिन साबित हो रहा हो, तब इन्हीं पुलिसकर्मियों को सटोरियों और जुआरियों के पीछे दौड़ाना खुद में एक अपराध है।
 
 
- अविनाश चंद्र