बौद्धिक क्षेत्र की रणभूमि

इसी साल के फरवरी के महीने ने अपने आपको चार माह के अंदर उस समय फिर से दोहरा दिया जब प्रकाशक ब्लैकस्वान ने अपने यहां से प्रकाशित कुछ पुस्तकों को बाजार से वापस मंगाकर उनकी 'पुनर्समीक्षा' करने की घोषणा की। फरवरी में कुछ ऐसा ही पेंग्विन बुक्स ने उस समय किया था जब 'शिक्षा बचाओ आंदोलन संस्थान' के प्रमुख दीनानाथ बत्र ने अमेरिकी स्कॉलर वेंडी डोनीगर की पुस्तक 'दि हिंदूज: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री' के कुछ अंशों को अत्यंत आपत्तिजनक मानते हुए कोर्ट में एक मामला दायर किया था। इस बार बत्र ने शेखर बंदोपाध्याय की पुस्तक 'फ्रॉम प्लासी टू पार्टिशन, ए हिस्ट्री ऑफमॉडर्न इंडिया' पर कानूनी नोटिस भेजा है। ऐसा उन्होंने आइपीसी की धारा 295ए के तहत किया है।
 
इसमें सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि नोटिस केवल एक पुस्तक के लिए था, किंतु प्रकाशक ने अपनी ओर से इसे इस तरह की सभी पुस्तकों पर लागू कर दिया, जिसकी चपेट में ऑक्सफोर्ड की स्कॉलर मेघा कुमार की हाल ही में आई पुस्तक 'कम्युनलिज्म एंड सेक्सुअल वायलेंस: अहमदाबाद सीन्स 1969' भी आ गई। दूसरी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि प्रकाशक ने इसका मुकाबला वैधानिक तरीके से करने के बजाय समर्पण करने का निर्णय लिया। हो सकता है कि उनकी इस मुद्रा के पीछे व्यावसायिक हितचिंतन के अतिरिक्त कहीं न कहीं सुरक्षा की भावना भी काम कर रही हो।
 
मेरे विचार से इस घटना को आइपीसी की धारा के पुनर्विवेचन तथा राजनीतिक दायरों से ऊपर उठकर सांस्कृतिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से सोचे जाने की जरूरत है। इस संदर्भ में पहली बात यह है कि शिक्षा का संबंध उपलब्ध ज्ञान को रटा देने से कहीं अधिक विद्यार्थी की मौलिक सोच को विकसित करने से है। दूसरी बात आइपीसी की उस धारा की समीक्षा से जुड़ी हुई है, कोड़े की तरह जिसका इस्तेमाल कभी भी, कहीं भी, किसी पर और कोई भी कर सकता है। इंडियन पीनल कोड की धारा 295ए के अंतर्गत बनाया गया केंद्र सरकार काकानून कहता है कि यदि किसी भी व्यक्ति का कोई भी काम, चाहे वे शब्द के रूप में हों या बोला जाए, लिखा जाए या सांकेतिक हो या किसी अन्य रूप में दिखाई दे रहा हो अथवा अन्य भी किसी तरीके से, यदि किसी वर्ग या धर्म के लोगों की धार्मिक भावना और विश्वास को जानबूझकर, गलत उद्देश्य से चोट पहुंचाता है तो उसे तीन साल [अधिकतम चार साल] की सजा या जुर्माना या फिर दोनों ही दंड दिए जा सकते हैं।
 
सारा कारनामा इस कानून का ही है। यहां कुछ मुद्दों पर विचार किया जा सकता है। पहला यह कि क्या पुस्तक लिखने या शोध करने जैसे बौद्धिक कार्यो को 'गलत इरादों' के अंतर्गत माना जाए? दूसरा यह कि यदि किसी को कोई ऐसा तथ्य मिलता है जो प्रचलित सत्य के विपरीत है तो वह इस बात का फैसला कैसे करे कि इससे भावनाएं आहत होंगी कि नहीं और उस आहत भावना की मात्र कितनी होगी? क्योंकि इस बारे में मुश्किल यह है कि ज्यादातर लोगों की भावनाएं आहत नहीं होती हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग भावजीवी होते हैं, शब्दजीवी नहीं।
 
तीसरी और महत्वपूर्ण बात, यह जिम्मेदारी किसको दी जाए ताकि वह समूह की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करे? क्या किसी एक व्यक्ति को या कुछ व्यक्तियों द्वारा स्थापित किसी भी नामी, बेनामी संस्था को यह अधिकार दे दिया जाए? ध्यान रहे कि लोकतांत्रिक प्रणाली के अनुकूल ऐसी संस्थाओं का कोई विपक्ष नहीं होता है और न ही इनके खिलाफ अविश्वास का प्रस्ताव पारित करके इन्हें सत्ता से बाहर किया जा सकता है। गौर करें कि यदि आज कबीर आ जाएं और वैसी ही खरी-खरी बातें कहने लगें तो उनका क्या हाल करेगी यह धारा। कबीर तो आज नहीं हैं, लेकिन उनका साहित्य तो है। यदि मुडो राम पर कुछ लिखना हो तो मैं किस राम को अपना आधार बनाऊं, ताकि रामभक्तों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे?
 
गजब की फिल्म है 'ओएमजी', जिसमें भावनाओं को तथाकथित ठेस पहुंचाने की भरपूर गुंजाइश है। दरअसल ऐसे मामलों में कुल मिलाकर सब कुछ निर्भर इस बात पर करता है कि हम उसे लेते कैसे हैं। प्रधानमंत्री ने सचिवों की मीटिंग में प्रत्येक से अपने-अपने मंत्रलयों के उन दस कानूनों की सूची बनाने को कहा है जो पुराने पड़ गए हैं या बाधक बन रहे हैं। क्या आइपीसी की ऐसी धाराओं के बारे में भी कुछ ऐसा ही करना बेहतर नहीं होगा? अब तीसरी बात। अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने 'एक हाथ में कुरान तथा दूसरे हाथ में कंप्यूटर' की बात कही थी। प्रतीकात्मक रूप में यह धर्म और विज्ञान, परंपरा और आधुनिकता, भावना और तार्किकता तथा संस्कृति और सभ्यता के बीच के आदर्शतम् संतुलन की ओर संकेत करता है। यह वह व्यापक एवं उदार सांस्कृतिक वातावरण है, जिसका निर्माण यूरोप के पुनर्जागरण आंदोलन ने किया था और जिसकी कोख से विज्ञान, राजनीति, कला और जीवन के उन अधिकांश महान विचारों का जन्म हुआ था, जिन पर हमारा समस्त वर्तमान खड़ा है। इतिहास के उस विलक्षण कालखंड की देन की अनदेखी करना एक प्रकार से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।
 
मुझे लगता है कि विशेषकर ऐसे मामलों को राजनीति से ऊपर उठकर एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम में देखने की जरूरत है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि ऐसी घटनाओं को सीधे-सीधे किसी विचारधारा विशेष वाली राजनीतिक संस्था से जोड़ देने पर मामला बिखर जाता है। तब तथ्य छूट जाते हैं और तथ्यों पर हावी राजनीति प्रमुख हो जाती है। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि इस तरह के बौद्धिक एवं रचनात्मक प्रतिबंधों के प्रश्न पर उन राजनीतिक दलों का रवैया भी कोई बहुत प्रशंसात्मक नहीं रहा है, जो स्वयं को उदारवादी कहते हुए अघाते नहीं हैं। अंत में केवल यह कि बौद्धिक क्षेत्र की रणभूमि में तर्क एवं साक्ष्य ही हथियार का काम करते हैं। कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि 'इतिहास ऐसा ही था'। साक्ष्यों एवं तथ्यों के आधार का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। इसलिए बेहतर यही है कि ऐसी लड़ाइयों को बहसों के जरिये लड़ा जाए और बहसों की यह लड़ाई एक ऐसी लड़ाई हो, जो कभी खत्म होने का नाम ही न ले।
 
 
 
- डा. विजय अग्रवाल [लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]
साभार- जागरण.कॉम