मैं पैरेंट नहीं हूं..

मैं पैरेंट नहीं हूँ, लेकिन मेरे पैरेंट्स ने यह सुनिश्चित किया कि मेरे साथ गलत न हो!
मैं पैरेंट नहीं हूँ,
न अभी,
और न ही इससे पहले कभी!
यह एक विनती है, अथवा एक उम्मीद भी!
और सम्भतः अंतिम नहीं है.....
मैं भी एक बच्चा रह चुका हूँ, अपेक्षाकृत निश्चिंत बच्चा,
परेशानी क्या होती कभी नहीं जाना!

कभी यह पता नहीं चला कि असल में क्या चल रहा था,
आज मैं जो हूँ, मुझे वह बनाने के लिए
अब पलटकर देखता हूँ तो यह महसूस कर सकता हूँ कि मुझे बनाने वालोँ पर क्या-क्या बीती होगी,
सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए मेरे साथ कुछ गलत न हो!

लेकिन अब तक, मैं एक पैरेंट नहीं हूँ!

मैं, नितेश, शिक्षकोँ के परिवार से हूँ। मेरे नाना और दादा दोनो ही अलग-अलग सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे, और मेरी नानी भी पास के एक स्कूल में टीचर थीँ। यह वो दौर था जब शिक्षकोँ को मिलने वाला वेतन उन्हे प्राप्त होने वाले सम्मान और उनके द्वारा अपने कार्य के प्रति निष्ठा की तुलना में बेहद कम था। मेरे बचपन की यादेँ ऐसे वाकयोँ से लबालब हैं, जब जवान से लेकर बुजुर्ग तक मेरे दादा-नाना या नानी के पास इस बात के लिए आभार व्यक्त करने आते थे कि वह बहुत अच्छे शिक्षक हैं। आप सबकी तरह मैं भी बहुत सारी किताबोँ, स्कूलिंग के तमाम वर्ष और शिक्षा समबंधी बातोँ-विचारोँ के बीच पला बढा। लेकिन मेरे जेहन में इस सम्बंध में कभी कोई गम्भीर खयाल नहीं आया कि मेरे माता-पिता के लिए मुझे अच्छी शिक्षा सुनिश्चित करना कितना कठिन रहा होगा।

एक ऐसे परिवार का हिस्सा होने जो आर्थिक रूप से निम्न-मध्यवर्ग में आती है और विकास के पैमाने पर सबसे अधिक पिछडे राज्य (जिसे कुछ लोग बीमारू भी कहते हैं) से होने के साथ-साथ मेरा अपना नॉन प्रॉफिट सेक्टर भी हमेँ “सम्भावित लाभार्थी” ही बुलाना पसंद करता है। अगर आज मैं स्कूल का छात्र होता, तो सिर्फ मेरी स्कूलिंग के लिए 13000 रुपयोँ की जरूरत होती (जैसा कि अकाउंटेबिलिटी इनिशिएटिव की रिपोर्ट बताती है कि भारत में माध्यमिक शिक्षा पर प्रति बालक औसत खर्च 12,768 रुपये है)। अगर हम उच्च शिक्षा की बात करेँ तो यह खर्च कई गुना अधिक होगा। उस दौर में बगल के किराना स्टोर में भले हमारे नाम के कर्जे रजिस्टर में लिखे होते थे, लेकिन हमारे स्कूल की किताब-कॉपियाँ और हमारे जूते आदि हमेशा चकाचक रहते थे, यानि कि अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलाना अभिभावकोँ के लिए हमेशा से ही सर्वोपरि रहा है। तमाम आर्थिक परेशानियोँ के बावजूद, मेरे ही नहीं बल्कि सभी पैरेंट्स अपने बच्चोँ की शिक्षा पर अधिक से अधिक खर्च करने के लिए बाधित थे। लेकिन जब आप इस खर्च के पीछे की वजह तलाशेंगे तब आपको पता लगेगा कि ऐसा करने वाले लोग यह भलीभांति जानते हैं कि वे क्यूँ खर्च कर रहे हैं। वे अनपढ हो सकते हैं, गरीब या कर्जदार हो सकते हैं, लेकिन भरोसा करेँ वे बुद्धिमान जरूर होंगे। और वे अच्छी तरह से जानते होंगे कि बच्चोँ की शिक्षा के लिए जब चयन की बात आती है तो बेस्ट क्या है। और यही वजह है कि बच्चोँ की शिक्षा के लिए उपलब्ध संसाधनोँ में से बेहतरीन का चुनाव करना कोई असाधारण बात नहीं, बल्कि एक जागरुक फैसला है, जिसे लेने में हर माँ-बाप मास्टर होते हैं।

मैं सरकारी सिस्टम के बारे में चर्चा नहीं करूंगा क्योंकि मेरे हिसाब से अगर किसी सेवा से कोई भी उपभोक्ता संतुष्ट नहीँ है तो मेरे हिसाब से यह पैसे बर्बाद करने और अवसर खोने का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। इसके बावजूद, जैसा कि बार-बार परिचर्चा और बहस हो चुकी है और हम सब जानते हैं कि किस तरह से बेकार होने के बावजूद शिक्षा विभाग पर हमारी मेहनत की कमाई लगातार बर्बाद हो रही है।

लेकिन मैं भारतीय माता-पिता के सम्बंध में एक बात निश्चित रूप से कहूंगा। “द वैल्यू ऑफ एजुकेशन: हायर एंड हायर” नाम से आई एचएसबीसी एक वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कि 49% भारतीय माता-पिता कहते हैं कि बच्चोँ की खुशी ही उनके जीवन का सबसे बडा लक्ष्य है। मेरे पैरेंट्स के लिए भी मेरी खुशी सबसे महत्वपूर्ण थी, उन्होने मेरी शिक्षा पर बहुत सारा पैसा लगाने के बावजूद मुझे अपने हिसाब से कैरियर बनाने की छूट दी, इसिलिए आज मैं अपनी मर्जी से एक नॉनप्रॉफिट संस्थान में काम कर रहा हूँ, कभी गांव में जाकर रहता हूँ तो कभी पहाडोँ के दूर-दराज इलाकोँ में। मेरे पैरेंट्स को यह पता था कि पैसोँ की असली कीमत मेरी खुशीऔर आत्म-बोध से मिलेगी, और यही जीवन की गुणवत्ता है जो मुझे अपने माता-पिता और अपनी शिक्षा से मिली है।

मैं जानता हूँ कि सभी पैरेंट्स अपने बच्चोँ के लिए उनकी मनमर्जी का जीवन और स्वतंत्रता चाहते हैं। हम बच्चोँ को अपनी पसंद की जीवनशैली पूरी नहीं तो लगभग हमारी चाहत के करीब मिल ही जाती है, मगर हमारे पैरेंट्स और उनकी चाहत अब भी बहस के स्तर तक ही रह जाता है, वो भी तब, जब उनके नाम पर बहुत सारा पैसा बर्बाद हो रहा है! हमेँ पैरेंट्स को उनका पैसा वापस देना होगा, ताकि उन्हे अपना फैसला खुद लेने की ताकत मिले, और भरोसा कीजिए, वे कभी निराश नहीं करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे वे अपने बच्चोँ को कभी निराश नहीं करते हैं। शिक्षा और पैसे दोनोँ की अहमियत समझते हैं, और वे इन दोनोँ का बेहतरीन इस्तेमाल आसानी से सुनिश्चित कर सकते हैं और परिणाम भी ला सकते हैँ।

- नितेश आनंद (लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के एडवोकेसी एसोसिएट हैं)