पुण्यतिथि विशेषः भारत को कृषि प्रधान देश बनाने के प्रयासों के विरोधी थे गोखले

स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, उदारवादी विचारक, शिक्षाविद् एवं समाज सुधारक गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म रत्‍‌नागिरी कोटलुक ग्राम में एक सामान्य परिवार में 9 मई 1866 को हुआ। उनके पिता का नाम कृष्ण राव था जो एक क्लर्क थे। न्यू इंग्लिश स्कूल पुणे में अध्यापन करते हुए गोखले जी बालगंगाधर तिलक के संपर्क में आए। गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ और उस पर अधिकारपूर्वक बहस करने की क्षमता से उन्हें भारत का 'ग्लेडस्टोन' कहा जाता है। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सबसे प्रसिद्ध नरमपंथी थे। उन्होंने 1905 में सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की ताकि नौजवानों को सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। उनका मानना था कि वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

1886 में वह फर्ग्यूसन कालेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक के रूप में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी में सम्मिलित हुए। वे अंग्रेजों की भाारत के प्रति दुर्भावनापूर्ण आर्थिक नीति के तीव्र आलोचक थे। अंग्रेजों ने जिस प्रकार से भारत के कुटीर उद्योगों पर कुठाराघात किया था उसी के कारण भारत विदेशों से तैयार माल आयात करने के लिए विवश हुआ। गोखले इस बात से भलीभाँति परिचित थे कि अंग्रेजों ने भारत को कृषि प्रधान देश बनाकर तैयार माल आयात करने वाली मंडी बना दिया है। अंग्रेज सरकार की इस नीति की गोखले ने कई बार खिलाफत की थी। 

वे सच्चे समाज सुधारक और रूढिवादिता के प्रबल विरोधी थे। भारत में प्रचलित जाति व्यवस्था को वे प्रगति के मार्ग में बाधक मानते थे। दलित जातियों के उत्थान के वे प्रबल समर्थक थे। छुआछूत तथा भेदभाव का अंत करने के लिए गोखले ने भारतीयों को सामाजिक संकीर्णता से बाहर निकलने का आह्वान किया। गोपाल कृष्ण गोखने कांग्रेस के नरम दल के नेता थे और वे विरोधियों को हराने में नहीं उन्हें जीतने में विश्वास करते थे।

गोखले जीवन में शिक्षा की महत्ता से भलीभांति अवगत थे और इसीलिए प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क कराने की मांग किया करते थे। उन्होंने सरकार को ये विचार दिया कि प्राथमिक शिक्षा को छह से दस वर्षो तक के बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और इसके खर्चे को सरकार और संस्थाएं वहन करें। सरकार इस बात के लिए राज़ी नहीं थी। उसका मानना था कि शिक्षा के प्रसार से अंग्रेज़ी साम्राज्य को दिक्कत होगी। गोखले ने अपनी तर्क बुद्धि से उन्हें समझाया कि सरकार को अनपढ़ लोगों से ही डरना चाहिए, पढ़े लिखों से नहीं।

गोपाल कृष्ण गोखले ने 1903 में अपने एक बजट-भाषण में कहा था कि भावी भारत दरिद्रता और असंतोष का भारत नहीं होगा बल्कि उद्योगों, जाग्रत शक्तियों और संपन्नता का भारत होगा। वे पाश्चात्य शिक्षा को भारत के लिए वरदान मानते थे और इसका अधिकाधिक विस्तार चाहते थे। उनका मानना था कि देश की तत्कालीन दशा में पाश्चात्य शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य भारतीयों को पुराने, जीर्ण-शीर्ण विचारों की दासता से मुक्त कराना होगा।

गोखले ने नौकरशाही के हाथों में शक्ति के केंद्रीकरण की बुराइयों को उजागर किया और देश के प्रति शोषणवादी अर्थनीति की भी तार्किक आलोचना की। 1905 में लंदन के ‘न्यू रिफार्म क्लब’ में दिए भाषण में उन्होंने कहा कि नौकरशाही के तीन मुख्य दोष हैं - केंद्रीकरण, भारतीय शिक्षित वर्ग को सत्ता से बाहर रखना और हर मसले पर अपनी सत्ता के हितों का ख्याल रखना।

गोखले ने सरकार पर इस बात के लिए दवाब डाला कि सरकार लोक-कल्याणकारी हो और इससे संबंधित कार्यक्रमों पर अधिक खर्च करे, अपने मुलाज़िमों की संख्या घटाए, सैनिक व्यय कम करे और प्रशासनिक सुधार में ज़ोर लगाए। गोपाल कृष्ण गोखले के ही प्रयासों से नमक पर लगने वाला टैक्स ढाई रुपये प्रति मन से आठ आने प्रति मन कर दिया गया था। सत्ता के विकेन्द्रीकरण और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के लिए उन्होंने तत्कालीन गवर्नर-जनरल लार्ड कर्जन के भारतीय विश्वविद्यालय विधेयक का भी विरोध किया था। सरकार विश्वविद्यालयों पर अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहती थी और वे इसके विरोध में थे। वे न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्कीरण के भी पक्षधर थे।
19 फ़रवरी 1915 को गोपालकृष्ण गोखले इस संसार से सदा-सदा के लिए विदा हो गए।

- आजादी.मी