जॉर्ज ऑरवेल की किताब जिसे सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका दोनों ने प्रतिबंधित किया

विनम्र श्रद्धांजली (25 जून 1903 - 21 जनवरी 1950)

अंग्रेजी साहित्य के प्रेमचंद कहलाने वाले जॉर्ज ऑरवेल का जन्म 25 जून 1903 को बिहार के मोतिहारी में हुआ था। उनका असली नाम एरिक ऑर्थ ब्लेयर था। उनके पिता का नाम रिचर्ड डब्लू ब्लेयर था और वे ब्रिटिश राज की भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे। ऑरवेल के जन्म के एक वर्ष बाद ही उनकी मां उन्हें लेकर इंग्लैंड लेकर चली गयीं। सेवानिवृत्त होने के बाद उनके पिता भी इंग्लैंड लौट गए और ऑरवेल दोबारा भारत नहीं लौटे। उनकी शिक्षा दीक्षा इंग्लैंड में ही हुई। लंबे समय तक माना जाता रहा कि ऑरवेल का जन्म इंग्लैंड में ही हुआ था और यह मान्यता उनकी मृत्यु के पश्चात कई वर्षों तक जारी रही। वास्तविकता पर से पर्दा तब उठा जब वर्ष 1983 में अंग्रेज पत्रकार इयान जैक उनकी जन्मस्थली की खोज करते करते मोतिहारी पहुंचे। इसके पश्चात बिहार सरकार द्वारा उनकी जन्मस्थली के जीर्णोद्धार का फैसला किया गया।

ऑरवेल साम्यवाद के प्रखर आलोचक थे और लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थक थे। जॉर्ज ऑरवेल की मृत्यु 21 जनवरी 1950 को 47 वर्ष की अल्पआयु में हो गई। अपनी मृत्यु के तीन वर्ष पूर्व 1947 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी जो 1948 में प्रकाशित हुई। पुस्तक का नाम था ‘1984’। यह पुस्तक अत्यंत लोकप्रिय हुई लेकिन इस पुस्तक के साथ एक और रोचक घटना जुड़ी हुई है। यह किताब सोवियत संघ रूस में प्रतिबंधित कर दी गई थी। आरोप था कि यह पुस्तक कम्युनिज्म का विरोध करती है। उधर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के भी कुछ हिस्सों में इस पुस्तक को प्रतिबंधित किया गया था और वहां आरोप यह था कि यह पुस्तक कम्युनिज्म के साथ सहानुभूति रखती है और उसे बढ़ावा देती है। एक और मजेदार बात यह है कि कम्युनिस्ट चीन में यह किताब कभी प्रतिबंधित नहीं हुई।

स्कूली दिनों में ऑरवेल ने वर्गभेद को नजदीक से महसूस किया। फिर कॉलेज जाने के बजाय वे ब्रिटिश इम्पीरियल पुलिस में शामिल होकर बर्मा चले गए। गरीबी और ब्रिटिश राजशाही नीतियों से निराश होकर उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। उन्होंने अपना काफी समय उत्तरी इंग्लैंड के बेरोजगार खदान मजदूरों और यूरोप के गरीब-पिछड़े लोगों के बीच रहकर बिताया। 

उन्होंने 1933 में ‘डाऊन एंड आउट इन पेरिस एंड लंडन’ 1935 में ‘ए क्लेरगीमैन्स डॉटर’ 1937 में ‘द रोड टू वायगेन पीयर’ लिखा। इन किताबों में ऑरवेल की जिंदगी को प्रतिबिंबित होते देखा जा सकता है। इन किताबों में सामाजिक अन्याय, मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग की गरीबी और उनके दोगलेपन पर कड़ी आलोचना की गई है। सन 1938 में ऑरवेल ने सैनिक के तौर पर प्राप्त अनुभवों को ‘होमेज टू कैटालोनिया’ नामक नॉवेल के रूप में साझा किया। लेकिन 1945 में आई ‘एनिमल फार्म’ उनकी सबसे अधिक चर्चित किताब रही। यह किताब जानवरों के एक बाड़े की कहानी है लेकिन असल में इसका संदर्भ उन घटनाओं की तरफ है जिनके परिणाम स्वरूप 1917 की रूसी क्रांति हुई थी। ऑरवेल सोवियत संघ के शासक जोसेफ स्टालिन की तानाशाही के बड़े आलोचक थे। इस आलोचना को किताब में वर्णित एक वाक्य से आसानी से समझा जा सकता है। उन्होंने लिखा था, ‘ऑल एनिमल आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल देन अदर्स’ अर्थात सब जानवर बराबर होते हैं, लेकिन कुछ जानवर बाकी सबसे ज्यादा बराबर होते हैं। इसके पश्चात आयी ‘1984’ ने सफलता के झंडे गाड़ दिये। यह अत्यंत गंभीर तरीके से लिखी गई किताब थी जिसमें ऐसे भविष्य और ऐसे समाज की कल्पना की गई था जहां प्यार करने वालों को सजा दी जाती है। नागरिकों की निजता छीनने वाले बिग ब्रदर वाली परिकल्पना को इस किताब में शाब्दिक तौर पर उकेरा गया था।  ऑरवेल की किताबों पर कई टीवी सीरियल्स और फिल्में भी बनी और काफी पसंद की गईं।

- आजादी.मी