जीएम फसलों को लेकर कुछ भ्रम

जेनेटिकली मोडिफाइड ऑर्गेनिज्म (जीएमओ) यानी आनुवांशिक रूप से परिवर्तित फसलें भारतीय कृषि को एक नया आयाम और मजबूती दे सकती हैं, लेकिन कुछ लोग इनकी भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने जीएमओ के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है और बड़े ही बेपरवाह ढंग से वे इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) की हालिया रिपोर्ट पर भी दोषारोपण कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह रिपोर्ट कुछ बड़ी कंपनियों के असर में आकर तैयार की गई है, जो भारतीय बीज कारोबार को हथियाना चाहती हैं। इस किस्म का तुच्छ आरोप लगाकर इन एनजीओ ने न केवल बीज व बायोटेक उद्योग द्वारा भारतीय कृषि के क्षेत्र में दिए गए भारी योगदान को नगण्य बता दिया है, बल्कि इन्होंने देश की प्रतिष्ठित खुफिया एजेंसी आइबी का भी अपमान किया है। यह कहकर कि आइबी को कॉरपोरेट समूह अपने असर में ले सकते हैं। कुछ एनजीओ ने मात्र यही रवैया दर्शाया है कि हमला ही सबसे बढ़िया बचाव है।
 
वास्तव में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों को बदनाम करके किसी की छिपी मंशाएं पूरी नहीं हो सकतीं। केवल तथ्यों की ही अहमियत है, न कि इन संगठनों की काल्पनिक बातों की। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), केंद्रीय कृषि मंत्रलय और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति जैसे प्रतिष्ठित निकायों ने इस बात की हिमायत की है कि देश में जीएम टेक्नोलॉजी को अमल में लाने की जरूरत है। यदि कोई किसान नेता या वैानिक जीएम टेक्नोलॉजी का पक्षधर है तो उस पर मल्टीनेशनल कॉरपोरेट्स का एजेंट होने का लेबल चस्पा करना किस तरह सही करार दिया जा सकता है? बदनाम करने वाली इस किस्म की गैरजिम्मेदाराना मुहिम बेहद हैरान करने वाली है। 
 
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय जीएम के विरोधियों के प्रति शायद सबसे ज्यादा सहानुभूति रखता था। खासकर 2010 के बाद मंत्रलय उनके लिए ज्यादा संवेदनशील हो गया। वर्ष 2010 में देश में जीएम उत्पादों का अनुमोदन करने वाली शीर्ष संस्था जीईएसी के अधिकार छीनकर उसे मात्र जीएम टेक्नोलॉजी का ‘मूल्यांकन’ करने वाला निकाय बना दिया गया। यह शर्म की बात है कि बीते तीन सालों में हर महीने बैठक करने के बजाय जीईएसी की प्रति वर्ष केवल एक बैठक हुई है। स्पष्ट है कि जीएम टेक्नोलॉजी के लिए पर्यावरणीय मंजूरी के संबंध में यह व्यवस्था जिस नीतिगत पक्षाघात से ग्रस्त हुई, उसका असर बड़े पैमाने पर हुआ। इस सबका परिणाम यह हुआ कि पिछले चार सालों के दौरान जीएम फसलों के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास पूरी तरह ठहर गया।
 
 इस बात का दावा किया जाता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की अपर्याप्त नियामकीय प्रणाली के जरिये असुरक्षित जीएम टेक्नोलॉजी को भारत में धकेल रही हैं। इस दावे के तीन भिन्न आयाम हैं- जीएम क्रॉप टेक्नोलॉजी की सुरक्षा व लाभ, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका और भारत की नियामकीय प्रणाली की मजबूती। जीएम फसलों की दो विशिष्टताएं- कीट प्रतिरोध और शाकनाशी को सहने की क्षमता दुनिया भर में मशहूर हैं। भारत में और विदेशों में भी इनके सुरक्षित होने तथा सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरणीय फायदों के साक्ष्य दस्तावेजों में दर्ज किए जा चुके हैं। 
 
ब्रिटेन की संस्था ब्रूक्स एवं बारफुट द्वारा किए गए एक अध्ययन में इनके बहुत से लाभ दर्ज किए गए हैं। यह 1.44 करोड़ किसानों (छोटे एवं संसाधनों की तंगी से जूझ रहे) के अध्ययन से पता किए गए हैं और अन्य कई फायदों के अलावा इन फसलों में कीटनाशकों का उपयोग नौ प्रतिशत कम हुआ। बीते साल ब्राजील व चीन ने दुनिया की नवीनतम बायो टेक्नोलॉजी को स्वीकृत दी।यह स्वीकृति खेती या खाद्य-चारा या फिर दोनों के लिए थी। अमेरिका और उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र के किसान अगले 12 महीनों में सूखे को सहन करने में सक्षम मक्के के बीजों का इस्तेमाल कर रहे होंगे, जबकि पिछले साल सूखे की मार ङोलने वाले किसानों को नहीं मालूम कि क्या कभी उन्हें ये विकल्प नसीब हो सकेंगे।
 
जब भी कोई टेक्नोलॉजी विकसित होती है तो अनुसंधान उसका अहम हिस्सा होता है। नई तकनीकों का इस्तेमाल करने के लिए हम अनंतकाल तक इंतजार नहीं कर सकते। उन पर अनुसंधान चलता रहता है। वे विकसित होती रहती हैं और हम उनका इस्तेमाल भी करते चलते हैं। भारत जैसे देश में हम बायो टेक्नोलॉजी के फायदों की अनदेखी नहीं कर सकते। यहां कृषि की उत्पादकता बढ़ाना और ग्रामीण गरीबी का उन्मूलन प्राथमिकता में है। भारत में एकमात्र बीटी कॉटन ही ऐसी जीएम फसल है, जिसे स्वीकृत किया गया है और इसने किसानों को बेहतरीन नतीजे दिए हैं। इसके इस्तेमाल से कीटनाशकों के छिड़काव में कमी आई और पैदावार बहुत ज्यादा मिली। 2002 में इसे पेश करने के बाद से कपास की खेती का रकबा 90 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 1.20 करोड़ हेक्टेयर हो गया है, जबकि कपास उत्पादन 1.3 करोड़ गांठों से बढ़कर 3.4 करोड़ गांठें हो गयी हैं। यह इजाफा 165 प्रतिशत का है। वर्ष 200 में भारत का कपास उत्पादन 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था, जो 2005-06 में बढ़कर 362 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा 2010-11 में 510 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था। वर्ष 2002 में भारत जहां कपास आयात किया करता था, वहीं आज वह दुनिया में कपास का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया है। 
 
अब हम अपनी नियामक प्रणाली पर नजर डालते हैं। अरुणा रॉड्रिग्ज बनाम भारत सरकार के हालिया मामले में केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के अनुसार, "भारतीय संघ दृढ़ता से विश्वास करता है कि क्षेत्रीय परीक्षणों के नियमन की वर्तमान प्रणाली विज्ञान आधारित, मजबूत और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सर्वश्रेष्ठ पद्धतियों के समकक्ष है। इसके अलावा नियमन प्रणाली में सुधार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो वैज्ञानिक प्रगति के आधार पर नियामक निरीक्षण को अपडेट करने और उसका निरंतर अनुपालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, किंतु अनुसंधान एवं विकास को रोके बिना।" यह स्पष्ट है कि नियामक प्रणाली में सुधार एक सतत प्रक्रिया है, क्योंकि तकनीकी विकास के क्षेत्र में लगातार शोध जारी रहता है। 
 
बहरहाल, जीएम तकनीक के क्षेत्र में कई तकनीकी विशिष्टताएं हैं, जो आगामी सालों में भारत के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होंगी। ये फायदे सूखे से लड़ने, उर्वरक सब्सिडी, बेहतर पैदावार आदि के रुप में सामने आएंगे। हमें अपने देश की समग्र फसलों, जीएम टेक्नोलॉजी के प्रयोग हेतु प्रमुख फसलों, देश के लिए जरूरी मुख्य जीएम विशेषताओं, किन क्षेत्रों में जीएम टेक्नोलॉजी आवश्यक नहीं होगी या स्वीकृत नहीं होगी, इन सभी विषयों पर एक गंभीर बहस करने की जरूरत है।
 
- राम कौंडिन्य (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण