एजुकेशन वाउचर- निर्धन बच्चों के हाथ मनपसंद स्कूल में पढ़ने की ताकत

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिंद्धांतों में 6 से 14 साल के सभी बच्चों के निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। किंतु अर्थाभाव और राजनीततिक उदासीनता के चलते इन सिद्धांतों पर अमल नहीं हो पाया। माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया पर अंततः 2009 में माननीय डा. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम को लागू किया और 2010 में इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई। हालांकि आरटीई एक्ट में कई त्रुटियां थीं और इस कानून का मकसद पूरा नहीं हो पाया।

आरटीई एक्ट ने एक ओर स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा जोर दिया और दूसरी ओर विद्यार्थियों को किसी आधार पर फेल नहीं करने का निर्देश दिया पर यह शिक्षा की स्तरीयता सुनिश्चित करने में नाकाम रहा। खासकर सरकारी स्कूलों के शिक्षा स्र में सुधार का एक भी उपाय नहीं किया गया जबकि इन स्कूलों में खुद सरकार के अनुसार देश के 68 फीसद बच्चे पढ़ते हैं। परिणाम बेहद दुखद रहा- कक्षा 5 के अधिकांश बच्चे कक्षा 2 की किताबें नहीं पढ़ सकतें; जोड़-घटाव, गुणा-भाग के आसान कार्य भी उनके पल्ले नहीं पड़ता। कुल मिलाकर शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने के 6 साल बाद भी हजारों बच्चे बाल मजदूरी करते हैं- स्कूल का उनके जीवन में कोई अर्थ नहीं है।

इस एक्ट की एक अन्य नाकामी राज्यों में इसका गलत ढंग से लागू किया जाना है। एक्ट ने प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसद सीट आरक्षित रखने का प्रावधान किया है जिसके लिए स्कूलों के शुल्क के बराबर या सरकारी स्कूलों में प्रति विद्यार्थी व्यय होने वाली धनराशि (दोनों में से जो कम हो) स्कूलों को भुगता किया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि स्कूलों को जो भुगतान किया जाता है वह जरूरत से बहुत कम होता है और निशुल्क शिक्षा देने का नतीजा भुगतते हैं बाकी के 75 फीसद बच्चों के मां-बाप स्कूल को मोटी रकम चुका कर इस कमी की भरपाई करते हैं। यानी, निशुल्क अनिवार्य शिक्षा का मकसद पूरा नहीं होता है।

सरकार प्रति विद्यार्थी प्रति माह 6 हजार से 8 हजार रूपए का भार उठाती है। इसमें किताबें, स्टेशनरी, स्कूल बैग, यूनिफॉर्म, मिड-डे मील आदि शामिल हैं। यह खर्च देश के 68 फीसद बच्चों पर होता है जो आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। बाकी के 32 फीसद बच्चों का एक चौथाई अर्थात 8 फीसद को प्राइवेट स्कूलों में निशुल्क शिक्षा दी जाती है और स्कूलों को औसतन प्रति विद्यार्थी प्रतिमाह 1500 रूपए रीईम्बर्स कर दिया जाता है। इसके अलावा केंद्र सरकार अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों (32 फीसद के लगभग 4 फीसद) की फीस भी रीईम्बर्स करती है। इतना ही नहीं, सभी सरकारी कर्मियों चाहे केंद्र सरकार या राज्य सरकार के हों, के बच्चों के लिए शिक्षा भत्ता दिया जाता है और ऐसे 3 फीसद बच्चे हैं। कुल मिलाकर केवल 17 फीसद (32-8-4-3=17) बच्चों की शिक्षा के लिए कोई सरकारी मदद नहीं मिलती है। ये निम्न मध्यम आय वर्ग के लोगों, प्राइवेट ऑर्गनाइजेशन में काम करने वालों और छोटे दुकानदारों के बच्चे हैं।

देश को सही मायनों में शिक्षित करने का एक आसान विकल्प है सभी बच्चों को प्रतिमाह 3 हजार रूपए का एक एजुकेशन वाउचर देना भले ही बच्चा किसी जाति, वर्ग या हैसियत का हो। साथ ही, मिड-डे मील, निशुल्क किताबें और स्टेशनरी आदि देने की असफल परंपरा का भी अंत करना होगा। देखना यह होगा कि ये वाउचर केवल मान्यता प्राप्त स्कूलों में उपयोग किए जा सकें ताकि बच्चों के मां बाप भी इनका दुरुपयोग न कर सकें। सरकारी स्कूल भी बच्चों से फीस लें जो बच्चे अपने हाथ से एजुकेशन वाउचर के रूप में देंगे। इसके कई लाभ स्पष्ट दिखते हैं:
* गरीब बच्चों को भी मनपसंद स्कूल में दाखिला लेने का विकल्प होगा।
* चूंकि हर मां-बाप स्कूल वाउचर का लाभ लेना चाहिए इसलिए बहुत कम समय में 100 फीसद साक्षरता का लक्ष्य पूरा होगा।
* सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी क्योंकि गुणवत्ता में पिछड़ने वाले स्कूल बंद हो जाएंगे।
* प्राइवेट स्कूलों में कार्यरत लगभग 2 करोड़ शिक्षकों का औसत वेतन बेहतर, सम्मानजनक होगा। प्राइवेट स्कूलों में अच्छे वेतन पर बेहतर शिक्षक नियुक्त होंगे।
* शिक्षा जगत के उद्यमी बड़े उत्साह से दूर-दराज, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में भी स्कूल खोलेंग क्योंकि वहां के बच्चे भी फीस देने में सक्षम होंगे और उन्हें घर के पास अच्छे स्कूल का लाभ मिलेगा। इससे कंस्ट्रक्शन कारोबार में रोजगार बढ़ेगा। इसमें लगे लोग शिक्षा आदि पर खर्च कर पाएंगे। इससे भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

- कुलभूषण शर्मा (लेखक, नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस "निसा" के प्रेसिडेंट हैं)