ब्राजील का फुटबॉल विश्वकपः आनंद और बोझ

ब्राजील की कल्पनाओं पर फुटबॉल विश्वकप का खुमार जिस कदर हावी रहता है उतना कोई और आयोजन नहीं रहता। प्रत्येक चार वर्ष पर यह देश फुटबॉल देवता की आराधना करने वाले एक संप्रदाय में परिवर्तित हो जाता है। दरअसल, ब्राजील ने जितनी बार विश्वकप जीता है उतनी बार किसी और देश ने नहीं जीता। अतः वर्ष 2010 में जब वर्ल्डकप 2014 की मेजबानी ब्राजील को मिलने की घोषणा हुई तो हजारों लोगों ने रियो में समुद्र तट पर पार्टी कर जश्न मनाया। हम ब्राजीलियों को लगा कि वर्ल्डकप अपने घर आ रहा है और इससे हमें काफी खुशी हुई।

हमें यह जानकर और खुशी हुई जब पूर्व राष्ट्रपति लुइज इनेसियो लूला ने निजी निवेशकों को देश में निवेश करने के अवसर के तौर पर देखना चाहिए। वर्ष 2008 में उन्होंने घोषणा की थी कि “इस बार का फुटबॉल विश्वकप निजी क्षेत्र के नाम होगा।” खेलमंत्री ओर्लांडो सिल्वा ने हमें आश्वासन दिया कि स्टेडियमों के निर्माण पर करदाताओं का पैसा खर्च नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि करदाताओं से प्राप्त होने वाला राजस्व केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण में होगा, जो विश्वकप के समाप्त होने के बाद सारी संपत्ति ब्राजीलियों के पास ही रहेगी। सरकारी राजनैतिक रणनीतिकारों ने सुखद अंत वाली एक कहानी – हाई प्रोफाइल वैश्विक आयोजन करने वाला आधुनिक और समृद्ध ब्राजील, बांची थी।

बाद में हमें यह संदेह होने लगा कि करदाताओं को झांसा दिया गया है। ब्राजील का बुनियादी ढांचा फुटबॉल विश्वकप के आयोजन के लायक नहीं था। कोई भी स्टेडियम फीफा के मानकों के अनुरूप नहीं था।

जल्द ही विश्वकप सरकारी, विशेष रुप से संघीय सरकार की कार्यप्रणाली का सबसे ज्यादा दिखाई देने वाला हिस्सा बन गया। चीजें योजना के अनुरुप होती नहीं दिख रहीं थीं। जब वित्तिय संकट और संभावित लाभ में अनिश्चय की स्थिति दिखने लगी और निजी निवेशक हिचकिचाने लगे, तब सरकार ने करोड़ों रुपए के रियायती ऋण के साथ इसमें प्रवेश किया। यहां तक कि इसने स्टेडियम की प्रत्यक्ष स्वामित्व हासिल कर ली। विश्वकप के तीन महीनें बाद ही स्टेट व फेडरल इलेक्शन होने के कारण सरकार विश्वकप के टीवी पर अच्छा दिखाने के लिए जितना भी हो सके खर्च करने के लिए उत्सुक थी। विफलता दिखने का कोई विकल्प नहीं था।

अबतक यह स्पष्ट हो चुका था कि “निजी क्षेत्र का विश्वकप” और कुछ नहीं महज बयानबाजी ही थी। “विश्वकप मैट्रिक्स” पर हुए कुल खर्च – केंद्रीयकृत योजना जिसमें 12 मेजबान शहरों में स्टेडियम, शहरी परिवहन, यातायात, बंदरगाह, दूरसंचार और सुरक्षा शामिल थे - में से निजी निवेश महज 15.5 प्रतिशत था। खेलमंत्री के वादे के बावजूद, स्टेडियमों के निर्माण में हुए कुल खर्च का 97% सरकार द्वारा सीधे सीधे अथवा रियायती ऋणों के रुप में वहन किया गया। योजना पर हुआ कुल खर्च लगभग 12 बिलियन डॉलर था जिसके 85% से ज्यादा हिस्सा ब्राजीलियन करदाताओं द्वारा वहन किया गया। और जैसे जैसे खर्च बढ़ता गया वैसे वैसे बुनियादी ढांचों के सुधरने की उम्मीदें समाप्त होती गईं। सार्वजनिक परिवहन में निवेश का स्थान सार्वजनिक छुट्टियों, सरकारी कार्यालयों और स्कूलों की छुट्टी ने ले लिया ताकि टूर्नामेंट के दौरान शहर में भीड़भाड़ को कम किया जा सके। परिवहन प्रणाली के कुछ हिस्से, जो मैचों के दौरान लोगों को लाने ले जाने के लिए विकसित किए गए हैं, वो आयोजन के बाद प्रयोग में नहीं रहेंगे। ब्राजिलिया ने दुनिया का चौथा सबसे मंहगा स्टेडियम तैयार किया है, जबकि शहर की सर्वश्रेष्ट रैंकिंग वाली टीम ब्राजील के चौथे वर्ग में खेलती है।

असंतोष तो जून 2013 में हुए उस प्रदर्शन के दौरान ही प्रत्यक्ष तौर पर उभर कर सामने आ गया था जब साओ फाउलो में बस टिकट की कीमतों में वृद्धि की गई थी। ऐसी ही मांग दूसरे अन्य क्षेत्रों से भी होने लगी। चूंकि लोगों का जोर सरकार द्वारा शिक्षा, परिवहन और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करने पर था, उन्होंनें कर से प्राप्त राजस्व को स्टेडियमों की फिजूलखर्ची पर प्रश्न खड़े कर दिए।

टूर्नामेंट पर बेहिसाब खर्च के अतिरिक्त प्रदर्शनकारियों व पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा की गई हिंसा भी ब्राजीलियों के बीच विश्वकप के अनुमोदन में बड़ी गिरावट का कारण बना। हाल ही में प्यू रीसर्च के ग्लोबल एटिट्यूड्स प्रोजेक्ट द्वारा आयोजित सर्वेक्षण में 60 फीसदी ब्राजीलियों ने माना कि विश्वकप की मेजबानी करना देश के लिए खराब है इस बात के मद्देनजर कि करदाताओं के पैसे का बेहतर प्रयोग स्टेडियम पर खर्च करने की बजाए कहीं और ज्यादा बेहतर तरीके से किया जा सकता था। उसी सर्वेक्षण में 39 फीसदी लोगों ने कहा कि विश्वकप दरअसल, विश्व में ब्राजील की छवि को खराब करेगा। जबकि केवल 35 फीसदी लोगों ने माना की इससे ब्राजील की छवि बेहतर होगी।

ऐसा होने पर भी, विश्वकप को मिलने वाला जनसमर्थन बढ़ने वाला है। 2008 के 79 फीसदी से घटकर पिछले फरवरी में 51 प्रतिशत तक पहुंचने के बाद देश के एक प्रमुख समाचार पत्र फोल्हा डी साओ पाउलो के मुताबिक हाल ही में विश्वकप को ब्राजीलियों से मिलने वाला समर्थन बढ़कर 60 फीसदी पहुंच गया है। आए दिन प्रदर्शनकारियों – विश्वकप विरोधी प्रदर्शनकारियों और हड़ताली कर्मचारियों के संयुक्त प्रदर्शन - के खिलाफ पुलिस द्वारा की जा रही हिंसा के बावजूद अब माहौल समारोह के जैसा हो गया है। सैकड़ों हजार पर्यटक देश के मनोभावों का आनंद उठा रहे हैं, साथ ही वे तुलनात्मक रूप से हमारे यहां की महंगाई; मुख्यतः परतंत्र अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी खराबी, को भी झेल रहे हैं।

ब्राजील निवासी स्कूल और काम के बाद जल्दी जल्दी घर पहुंचते हैं और टेलीविजन के सामने बैठ जाते हैं। वे राष्ट्रगान गाते और अर्जेंटिना की टीम और साथ ही साथ स्पेन के डिएगो कोस्टा के संयुक्त अध्यक्ष को अपशब्द भी कहते हैं। लेकिन विश्वकप की मेजबानी ने ब्राजील वासियों को महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया है। उनमें से सबसे महत्वपूर्ण राजनेताओं के वादों पर अविश्वास करना है क्योंकि- जबतक कि वे जितनी मर्जी खर्च करने के लिए आजाद है- वे वहीं करेंगे जो उन्हें सत्ता में वापस लाने के लिए सहायक होगा। विश्वकप की तैयारी के लिए, राजनेताओं ने एकबार फिर करदाताओं के पैसे को अपने पुर्नचयन के लिए प्रयुक्त किया।

सबसे क्रूर विडंबना यह है कि राजनेताओं ने फुटबॉल – ब्राजीलियों के लिए आनंद के बहुमूल्य स्त्रोत- को 10.2 बिलियन डॉलर गरीब बनाने के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया।

 

- मैग्नो कार्ल (लेखक ब्राजीलियन थिंकटैंक ऑर्डम लिवरे के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं)