अपने हितों के लिए भारत सरकार भी करती है विदेशों में लॉबिंगः डॉ. आलोक पुराणिक

खुदरा व्यापार में 51 फीसदी विदेशी निवेश के मुद्दे पर ‘संसद से सड़क तक’ घमासान छिड़ने और काफी जद्दोजहद के बाद नियम 184 के तहत संसद में बहस और वोटिंग के बाद विदेशी खिलाड़ियों के लिए देश में रिटेल स्टोर खोलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि विदेशी निवेश के नफा-नुकसान को लेकर लोगों के मन में अब भी संशय बना हुआ है। उधर, वॉलमार्ट द्वारा भारत में विदेशी निवेश के पक्ष में समर्थन हासिल करने के लिए की गई लॉबिंग और इस मद में खर्चे गए सवा सौ करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि ने एक नए बहस को हवा दे दी है। एफडीआई के इन्हीं मसलों पर भारत के पहले उदारवादी वेब पोर्टल “आजादी.मी” द्वारा जाने माने अर्थशास्त्री, व्यंग्यकार व स्तंभकार “डॉ. आलोक पुराणिक” से विस्तार से बातचीत की गई। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख संपादित अंशः

प्रश्नः एफडीआई इन रिटेल के मसले पर देश के अर्थशास्त्री दो धड़ों में बंटे दिखाई दे रहे हैं। एक धड़ा जहां खुदरा बाजार में विदेशी निवेश से आर्थिक विकास के नए प्रतिमान स्थापित होने की बात करता है वहीं दूसरा धड़ा इसे आर्थिक गुलामी की ओर जाने वाला कदम बताता है। बतौर अर्थशास्त्री, आप किस धड़े का समर्थन करते हैं?

उत्तरः देखिए, जहां तक मेरा मानना है, दोनों धड़े चरम स्तर की बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश होते ही रोजगार के क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थति पैदा हो जाएगी। ऐसा भी नहीं है कि वालमार्ट या टेस्को जैसे बड़े रिटेलर्स के आते ही देशी खुदरा बाजार चौपट हो जाएगा, लोग बेरोजगार हो जाएंगे। हां, यह अवश्य है कि उपभोक्ताओं के पास विकल्प बढ़ जाएंगे और उनका फायदा होगा। तो यदि उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधा और ज्यादा विकल्प मिलता है तो फिर ऐसे लोगों का स्वागत किया जाना चाहिए और तहे दिल से स्वागत किया जाना चाहिए।

प्रश्नः खुदरा व्यापार के क्षेत्र में देशी उद्योग घराने जैसे टाटा, भारती, रिलायंस आदि कुछ खास नहीं कर सकें। फिर विदेशी खिलाड़ियों के लिए भारत में व्यापार करना और टिके रहना कितना आसान या कठिन रहने वाला है?

उत्तरः कोई व्यापारी (देशी या विदेशी) भारतीय बाजार में मात्र इस बात के आधार पर टिका नही रह सकता कि वह बड़ा है या विदेशी है। बाजार में टिके रहने के लिए यह जरूरी है कि उत्पादक किस प्रकार श्रेष्ठ उत्पाद को कम से कम कीमत पर उपभोक्ता तक पहुंचा पाता है। मुझे याद आता है कि कुछ सालों पहले दिल्ली में सुभिक्षा नामक रिटेल आउटलेट हुआ करता था लेकिन स्थानीय खुदरा विक्रेताओं के सामने वे टिक नहीं सका। कमोवेश ऐसी ही स्थिति अन्य रिटेल स्टोर्स की भी है। दरअसल, आज के प्रतिस्पर्धी युग में मुद्दा देशी और विदेशी का नहीं सर्वश्रेष्ठ का है। जो ग्राहकों को कम से कम कीमत में गुणवत्तायुक्त सामान अधिक सुविधा और विकल्प के साथ उपलब्ध करा सकता है वही टिका रह सकता है। उदाहरण के लिए मोबाइल फोन के 80 प्रतिशत बाजार पर कभी नोकिया का कब्जा हुआ करता था लेकिन सैमसंग की तकनीकि और कीमत ने नोकिया को मार्केट से लगभग आऊट कर दिया है। आलम यह है कि आज नोकिया को अपने हेड क्वार्टर बेचने की नौबत आ गई है। एप्पल जैसा ब्रांड जिसका व्यापार कभी 700 मिलियन डॉलर का हुआ करता था आज घटकर 500 डॉलर का रह गया है। तो यह कहना कि वॉलमार्ट या कोई और कंपनी केवल नाम या विदेशी होने के कारण ही बाजार में जमी रह सकती है तो यह गलत है।

प्रश्नः आज के वैश्विक परिवेश में स्वदेशी और विदेशी के मुद्दे कितने प्रासंगिक रह गए हैं?

उत्तरः स्वदेशी और विदेशी के मुद्दे आज के युग में बहुत पिछे छूट गए हैं। आज मुद्दा स्वदेशी और विदेशी का नहीं, श्रेष्ठ गुणवत्ता का है। आज भी यदि स्वदेशी और विदेशी का मुद्दा अगर मुद्दा बना हुआ है तो इसका कारण आर्थिक नहीं बल्कि राजनैतिक है। मुक्त बाजार की परिकल्पना के तहत आप दुनिया के किसी देश में व्यापार करें कोई परेशानी नहीं है लेकिन बात जब नागरिकों के प्रवास की आती है तो राजनीति शुरू हो जाती है। यह राजनीति देश स्तर पर ही नहीं प्रदेश व शहर के स्तर पर भी होती है। जब बिहार का कोई व्यक्ति मुबंई जाता है तो वहां के लोगों को परेशानी होने लगती है। दरअसल, राजनैतिक दलों को लगता है कि यदि दूसरे शहर, प्रदेश अथवा देश के लोग उनके शहर, प्रदेश अथवा देश में रहने लगेंगे तो उनका वोटबैंक प्रभावित हो जाएगा और वो यहां शासन करने लगेंगे।

प्रश्नः हाल ही में विदेशी खुदरा क्षेत्र की बड़ी कंपनी वॉलमार्ट द्वारा भारत में समर्थन जुटाने के लिए लॉबिंग के मद में डेढ़ सौ करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही गई। इस बात को लेकर काफी हो हल्ला मचा और सरकार को मामले की जांच के आदेश तक देना पड़ा। इस बारे में आप क्या कहेंगे? क्या वॉलमार्ट व सरकार के बीच कुछ सांठगांठ है?

उत्तरः दरअसल, अमेरिका व यूरोप के कई देशों सहित पश्चिमी देशों में लॉबिंग एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके तहत कंपनियों द्वारा इस मद में किए गए खर्च को सार्वजनिक करना होता है। इसके अतिरिक्त कंपनियों के साथ लिखित करार होता है जिसके तहत लॉबिंग के दौरान किसी को रिश्वत न देने की बात प्रमुख रुप से शामिल होती है। वैसे हमारे देश में लॉबिंग किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है जैसे तमाम कंपनियां मनोरंजन (इंटरटेनमेंट) के मद में खर्च करती हैं। यहां तक कि भारत सरकार भी संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मुद्दे पर समर्थन जुटाने के लिए लॉबिंग कंपनियों की मदद लेती है। कहने का तात्पयर्य यह है कि लॉबिंग का अर्थ किसी तक अपनी बात को अच्छी तरह पहुंचाने के लिए किसी विशेषज्ञ की मदद लेना और बदले में भुगतान करना। हां, यदि कोई कंपनी अथवा संस्था लॉबिंग के नाम पर रिश्वत का लेनदेन करती है तो यह गलत है और देश विशेष के कानून के हिसाब से उसपर कार्रवाई होनी चाहिए।

प्रश्नः लेकिन लोगों के मन में डर बना है कि बड़े विदेशी खिलाड़ी भारत में आकर यहां के रिसोर्सेज पर कब्जा जमा लेंगे, उन्हें बेरोजगार कर देंगे आदि।

उत्तरः देखिए कंपनी यहां व्यवसाय करने आ रही है ना कि कब्जा करने। कंपनियां सेना लेकर नहीं चलती। वे जिस देश में व्यापार करती हैं वहां के कानून से बंधी होती हैं और उन्हें उसी के हिसाब से काम करना होता है। कानून घरेलू व विदेशी दोनों व्यापारियों के लिए एक ही होता है। बल्कि मेरा तो मानना है कि विदेशी कंपनियों के आने से देश में बालश्रम व न्यूनतम मजदूरी जैसे नियमों की अनदेखी नहीं हो सकेगी। जबकि बहुत सारी घरेलू कंपनियां कानून की अनदेखी करते हुए बालश्रम और न्यूनतम मजदूरी जैसे नियमों का उल्लंघन करती हैं। चूंकि विदेशी कंपनियों पर देशभर के लोगों और मीडिया की निगाह रहेगी, इसलिए उनके द्वारा तो ऐसा सोचा जाना भी संभव नहीं होगा।

प्रश्नः चूंकि वॉलमार्ट चीनी वस्तुएं ज्यादा बेचती हैं इसलिए यह भी डर है कि भारतीय उत्पादकों को कोई लाभ नहीं होगा।

उत्तरः बाजार का एक सीधा फंडा होता है। बाजार के लिए मानवीय मूल्य नही आर्थिक हित साबित करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह कहना कि वालमार्ट का चीनी वस्तुओं के प्रति कोई लगाव है, बिल्कुल गलत है। यदि वह चीनी वस्तुओं को बेचता है तो इसका साफ साफ अर्थ यह है कि चीनी वस्तुएं उसे सस्ती पड़ती है। अब यदि भारतीय चीनी वस्तुओं से सस्ता सामान बनाने लगेंगे तो वह उसे खरीदेगा। वैसे भी, भारतीय उपभोक्ता सबसे चालाक और शातिरतम उपभोक्ता माने जाते हैं। वो चीनी प्रोडक्ट सिर्फ इसलिए नहीं खरीद लेंगे क्योंकि वह सस्ता है। उसे टिकाऊपन भी चाहिए। यदि ऐसा होता तो मोबाइल कंपनियां देश से कब को बोरिया बिस्तर बांध चुकी होती क्योंकि चीनी मोबाइल कम कीमत और ज्यादा फीचर के साथ बाजार में उपलब्ध है। यदि कंपनियां यहां न सिर्फ टिकी है और फायदा कमा रही है तो इसका मतलब यह है कि गुणवत्ता भी भारतीयों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि किफायदी होना।

- अविनाश चंद्र

आलोक पुराणिक

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