विदेशी चंदा और कानूनी शिकंजा

विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी कि फॉरेन कॉंट्रिब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट में एक बार फिर संशोधन किया गया है। विगत दिनों संसद के दोनों सदनों से नए संशोधनों वाले फॉरेन कॉंट्रिब्यूशन (रेग्युलेशन) अमेंडमेंट बिल 2020 को पास करा लिया गया। सरकार का दावा है कि इससे विदेशी चंदा प्राप्त कर देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाली संस्थाओं और संगठनों पर अंकुश लग सकेगा और देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी। साथ ही साथ धर्म परिवर्तन जैसी गतिविधियों पर भी रोक लगाई जा सकेगी।

नये प्रावधानों के मुताबिक विदेशी चंदा पाने वाले एनजीओ को अपने सभी पदाधिकारियों के आधार कार्ड जमा कराने होंगे।  जिस कार्य के लिये चंदा प्राप्त हुआ है उसी में खर्च करना सुनिश्चित करना होगा और एडमिन से जुड़े कार्यों पर अब कुल राशि के 20% से अधिक खर्च नहीं किया जा सकेगा। पहले यह सीमी 50% थी। कानून में संसोधन के बाद कोई संस्था चंदे से प्राप्त राशि को किसी अन्य अन्य व्यक्ति, संगठन या पंजीकृत कंपनी को ग्रांट के रूप में नहीं दे सकेगी। नियमों में किसी प्रकार की भी गड़बड़ी पाए जाने पर संस्था के पंजीकरण को 180 दिनों के लिए स्थगित किया जा सकेगा और जरूरत पड़ने पर स्थगन को और 180 दिनों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

एक नई शर्त यह भी है कि विदेशों से प्राप्त धन को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की दिल्ली की शाखा में खोले गये एफआरसीआए खाते में ही मंगवाया जा सकता है। कानून में सरकारी कर्मचािरयों (प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष) पर भी विदेशों से चंदा लेने पर रोक लगा दी गई है। कुल मिलाकर सरकार के पास ये निर्णायक अधिकार होगा कि किस संगठन को विदेशी चंदा मिलना चाहिए और किसे नहीं। पूर्व के नियमों के तहत सरकार ऐसा किसी संगठन के द्वारा एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाए जाने के बाद ही कर सकती थी।

एक अनुमान के मुताबिक देश में विदेशी चंदा हासिल करने वाले 22,447 संगठन रजिस्टर्ड हैं। मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक वर्ष 2018 में इनमें से 98% संगठनों ने वार्षिक रिटर्न दाखिल किया था। लेकिन सरकारी एजेंसियों के मुताबिक  चंदा हासिल करने वाली कई संस्थाओं ने धनराशि को उस मद में खर्च नहीं किया जिसके लिए उसने चंदा हासिल किया था। इसीलिए पिछले लगभग एक दशक के भीतर 19 हजार से अधिक रजिस्ट्रेशन को रद्द कर दिया गया और वित्तीय गड़बड़ी के दोषी करीब दर्जन भर एनजीओ के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की गयी।

ये पहला मौका नहीं है जब विदेशी चंदे की हेरफेर के आरोप में किसी एनजीओ पर एक्शन लिया गया हो। पूर्व की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार द्वारा भी वर्ष 2010 में अहम बदलाव किये गए थे। उस समय तमिलनाडु के कुडनकुलम में न्यूक्लियर प्लांट के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों में विदेशी संस्थाओं पर अंकुश लगाना इसका कारण बताया गया था। बाद में 2012, 2015 और 2019 में भी अहम बदलाव किये गए। हालांकि एक महत्वपूर्ण संशोधन वर्ष 2016 में भी किया गया था जब राजनैतिक दलों के द्वारा प्राप्त विदेश फंड की जांच पर रोक लगा दी गई थी। जबकि कुछ ही दिनों पूर्व देश की दोनों बड़े राजनैतिक दलों (भाजपा और कांग्रेस) को अदालत ने विदेशी फंड के मामले में अपारदर्शिता न बरतने के मामले में फटकार लगाई थी।

लोकतांत्रिक सरकारों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि विरोध का लोकतांत्रिक माहौल बना रहे लेकिन राष्ट्रहित के नाम पर हो अलग ही रहा है। अक्सर सरकारों द्वारा देश की सुरक्षा आदि के नाम पर लिये जाने वाले फैसले तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। आतंकवाद को रोकने के नाम पर वैध तरीके से विज़ा और पासपोर्ट के माध्यम से देश में प्रवेश करने वालों पर रोक लगाना और कानून के नियमों और प्रावधानों का पालन करते हुए विदेश से चंदा हासिल करने वाली संस्थाओं पर रोक लगाना कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। शायद सरकार में बैठे नीति निर्धारकों को लगता है कि आतंकवादी वैध तरीके से विज़ा लेकर देश में घुसेंगे और कानून की पैनी निगाहों से होकर गुजरने वाले विदेशी चंदे का उपयोग संस्थाएं देशविरोधी गतिविधियों में करेंगी।

संगठनों और शोध आधारित संगठनों की चिंता यह है कि नए प्रावधानों से न सिर्फ राहत और सामाजिक कार्य बल्कि सामुदायिक सहयोग और सामाजिक व वैज्ञानिक शोध के लिए भी हालात कठिन हो जाएंगे। क्योंकि एफसीआरए के तहत विदेशी चंदा हासिल करने वाली संस्था अब परस्पर सहयोग के तहत स्थानीय संगठनों को फंड नहीं कर पाएंगी। पारदर्शिता के मामले में किसी भी प्रकार की जवाबदेही से इंकार नहीं किया जा सकता है फिर चाहे मामला विदेशी फंड का हो या फिर देश के भीतर की इकाईयों से ही प्राप्त धनराशि का हो। हालांकि इसे देश को विकास को रास्ते पर आगे ले जाने के अभियान में एनजीओ, सिविल सोसायटी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को रोकने के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल भी नहीं किया जाना चाहिए। वह भी तब जब खुद प्रधानमंत्री मोदी कई बार गैरसरकारी संगठनों और कार्यकर्ताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित कर चुके हैं।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि देश में अवांछित तत्वों, गतिविधियों या संदिग्ध लेन देन पर नजर रखने या कार्रवाई करने के लिए तमाम सुरक्षा और जांच एजेंसियां हैं और तमाम कानूनी व्यवस्थाएं हैं और डोनर एजेंसियों और बहुराष्ट्रीय इकाईयों की ओर से वही पैसा जब निवेश या सहयोग के रूप में आर्थिक विकास के लिए आ सकता है, राजनैतिक दलों को सहयोग के रूप में मिल सकता है तो सामाजिक विकास के लिए क्यों नहीं? आखिर गैरसरकारी संगठनों पर अविश्वास क्यों? सुरक्षा और जांच एजेंसियों पर अविश्वास क्यों?

- अविनाश चंद्र