सबके लिए अंग्रेजी

‘हिंदी सीखो, हिंदी बोलो, हिंदी अपनाओ’ की भावुकतापूर्ण अपीलें कम नहीं हुई हैं, लेकिन समाज इन अपीलों को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसका अंदाजा स्कूली शिक्षा के ताजा आंकड़ों से हो जाता है। देश भर के स्कूलों से मिले ब्यौरों के आधार पर नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेंशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (DISE) की ओर से जारी इन आंकड़ों के मुताबिक 2008-09 से 2014-15 के बीच हिंदी माध्यम स्कूलों में नामांकन 25 फीसदी बढ़ा है, जबकि इंग्लिश मीडियम स्कूलों का नामांकन इस दौरान बढ़कर दोगुना हो गया है।

खास बात यह है कि अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की लोकप्रियता में सबसे ज्यादा वृद्धि हिंदी भाषी राज्यों में ही देखने को मिल रही है। बिहार में अंग्रेजी स्कूलों में नाम लिखवाने वाले बच्चों की संख्या में 47 गुनी, जबकि यूपी में 10 गुनी बढ़ोतरी हुई है। इन दोनों राज्यों में इसी अवधि में हिंदी माध्यम स्कूलों में नामांकन क्रमशः 18 फीसदी और 11 फीसदी बढ़ा है। यही हाल कमोबेश पूरी हिंदी पट्टी का है। निश्चित रूप से इसका मतलब यही है कि हिंदी को लेकर छाती पीटने की प्रवृत्ति का समाज के व्यापक हिस्से में कोई असर नहीं है।

दूसरी तरफ यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि आज भी पूरे देश में हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 10 करोड़ 40 लाख है, जबकि इंग्लिश मीडियम से पढ़ रहे बच्चे महज 2 करोड़ 90 लाख हैं। दोनों तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी मीडियम स्कूलों में पढ़ रहे ज्यादातर बच्चे ऐसे हैं जिनके अभिभावक इच्छा होते हुए भी उन्हें अंग्रेजी स्कूलों में नहीं भेज सकते क्योंकि वहां पढ़ाई महंगी है। यह स्थिति समाज में एक ऐसा विभाजन पैदा कर रही है जो आने वाले दिनों में जाति व्यवस्था से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए महंगे स्कूलों में सस्ती पढ़ाई दिलाने की जो विशेष व्यवस्था कई इलाकों में शुरु करवाई गई है, उसके साइड इफेक्ट काफी गंभीर हैं।

हमें समझना होगा कि इस जटिल समस्या को टुकड़ों में हल नहीं किया जा सकता। वक्त की जरूरत है कि या तो तमाम सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी को पढ़ाई का माध्यम बनाया जाए, या फिर अंग्रेजी स्कूलों को सस्ता और सर्वसुलभ बनाया जाए।

साभारः नवभारत टाइम्स

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