डा. भीमराव अंबेडकरः एक दूरदृष्टा अर्थशास्त्री

हममें से अधिकांश लोग डा. भीमराव अंबेडकर को एक अधिवक्ता, दलित नेता और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार के तौर पर पहचानते हैं। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि डा. अंबेडकर एक निपुण अर्थशास्त्री भी थे। उनके पास न केवल लॉ की डिग्री थी बल्कि उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी से 1915 व 1927 में क्रमशः अर्थशास्त्र में एमए व पीएचडी भी की थी।  
 
अंबेडकर मुक्त बाजार समर्थक अर्थशास्त्री थे जो व्यक्तिगत अधिकारों और निजी संपत्ति की प्रधानता में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि बाजार, आर्थिक गतिविधियों को सर्वश्रेष्ठ तरीके से व्यवस्थित करता है। उनके कार्यों की महानता आर्थिक मामलों से संबंधित उनके लेखों में देखने को मिलती है। ये लेख न केवल सैद्धांतिक थे बल्कि इनमें व्यापक सार्वजनिक नीतियों का निहितार्थ शामिल था। इनमें से अधिकांश लेख आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना कि 100 साल पहले अपने लिखे जाने के समय थे। 
 
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति 1923 में लिखी गई उनकी पुस्तक ‘द प्रॉब्लम ऑफ रूपीः इट्स ऑरिजिन्स एंड इट्स सॉल्यूशन’ थी। अंबेडकर ने समाज में समृद्धि के लिए सार्थक धन युक्त उत्पादन की विशेषज्ञता और व्यक्तियों के बीच आपसी व्यापार पर जोर दिया। आज जबकि हमारे बैंकर्स मौद्रिक नीतियों के लक्ष्य को स्थापित करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें सार्थक धन को बहाल करने के अंबेडकर के सुझावों पर ध्यान केंद्रीत करना होगा। 
 
1924-25 में रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस (जिसकी अनुशंसा पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना हुई) के बाबत बयान देते हुए अंबेडकर ने मुद्रा जारी करने के सरकारी एकाधिकार की खिलाफत की। उन्होंने मुद्रा के कुप्रबंधन की संभावनाओं को न्यूनतम करने के लिए निजी बैंकों को मुद्रा जारी करने के अधिकार दिए जाने की वकालत की थी। अंबेडकर के इसी मुक्त बैंकर के विचार को बाद में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री एफ ए हायक द्वारा 1976 में प्रचारित किया गया। 
 
अंबेडकर नीति निर्धारण की प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण के भी पक्षधर थे। उन्होंने ये सहज अनुभूति कर ली थी कि चूंकि निर्णय निर्धारण के लिए आवश्यक सभी जानकारियां किसी एक उच्च अधिकारी के पास होना संभव नहीं हैं इसलिए केंद्रीकरण निष्फलता की ओर अग्रसर होता है। ऐसी जानकारियां स्थानीय लोगों के पास होती हैं इसलिए निर्णय लेने का अधिकार उनके पास ही होना चाहिए। इन सलाहों को आप वर्तमान में मोदी सरकार के चुनावी घोषणा पत्र में देख सकते हैं, जहां केंद्र के द्वारा प्रमुख आर्थिक संसाधनों को राज्यों के साथ साझेदारी करते और नीति निर्धारण के कार्य को राज्यों पर छोड़ने के रूप में राजकोषिय संघवाद को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है
 
अंबेडकर ने संविधान की रूपरेखा तय करते समय संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने पर भी जोर दिया था। हालांकि बाद में संविधान में 44 वें संशोधन के माध्यम से आर्टिकल 19 (1) (f) और आर्टिकल 31 को समाप्त कर संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची में से हटा दिया गया था। इसका नतीजा भूमि अधिग्रहण अधिनियम के विवाद के रूप में हमें देखने को मिल रहा है। 
 
आज यदि अंबेडकर होते तो ऐसी परिस्थितियों को देखकर अत्यंत निराश होते। यदि हमारे नेता अंबेडकर की अर्थनीतियों से कुछ सबक लेते हैं तो वे समाज की बेहतर सेवा कर सकेंगे। 
 
    
- कुमार आनंद (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ है)