'धर्म संकट में' अभिव्यक्ति की आजादी

अपनी कार्यप्रणाली के कारण सर्टिफिकेशन बोर्ड की बजाए सेंसर बोर्ड के नाम से प्रचलित केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात करने के प्रयास लगातार जारी है। नया विवाद निर्देशक फवाद खान की फिल्म 'धर्म संकट में' को अंतिम मंजूरी देने से पूर्व इसे धर्म गुरुओं को दिखाए जाने का है। बताया जाता है कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म के सर्टिफिकेशन के लिए होने वाली स्क्रीनिंग के दौरान हिंदू व मुस्लिम धर्मगुरुओं को आमंत्रित किया। इतना ही नहीं हिंदू धर्म के पंडित जी और मुस्लिम धर्मगुरु मौलवी साहब की सलाह पर फिल्म में कांट छांट भी की गई है। सेंसर बोर्ड द्वारा पूर्व में किसी फिल्म को रिलीज करने से पहले धर्मगुरुओं की सलाह लेने का संभवतः यह पहला मामला है। सेंसर बोर्ड के इस कदम की जितनी निंदा की जाए वह कम है। सेंसर बोर्ड के इस कृत्य ने कहीं ना कहीं अपनी धर्मभीरुता का परिचय दिया है। यह घटना दुनिया को यह संदेश देती है कि इस देश में संविधान में वर्णित नियम कानूनों से ज्यादा धार्मिक भावनाओं और मान्यताओं का आदर किया जाने लगा है। यदि जल्द ही ऐसी प्रवृति को नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब सभी प्रकार के सरकारी व गैर सरकारी फैसलों में धार्मिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाएगा। 
 
अत्यंत आश्चर्य की बात है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी को सेंसर करने वाले कानून 66ए को अनैतिक बताते हुए रद्द किये जाने की घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता है। अभी लोगों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर जश्न मनाने का दौर भी खत्म नहीं हुआ है। लेकिन सेंसर बोर्ड द्वारा एक फिल्म को रिलीज करने से पहले धर्मगुरुओं से अनुमति लेने की घटना यह दर्शाने के लिए काफी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिशें गहरी हैं। कहीं ना कहीं धार्मिक तुष्टीकरण की भावना गहरे घर कर रही है। हालांकि सेंसर बोर्ड के इस कदम की कुछ लोग तारीफ भी कर सकते हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो यह विचारधारा रखते हों कि फिल्म रिलीज होने के बाद विवाद बढ़ने से अच्छा है कि रिलीज से पहले ही धर्मगुरुओं की राय ले ली जाए। लेकिन ऐसे लोगों को समझना होगा कि यदि एक बार कानून के इतर भावनाओं के आहत होने की चिंता होने लगी तो यह प्रवृति कम होने की बजाए बढ़ती ही चली जाएगी और इसके साथ ही कम होती जाएगी अभिव्यक्ति की आजादी। यकीन मानिए यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत घातक साबित होगी। हमारे पास तमाम ऐसे देशों का उदाहरण हैं जहां नियमों कानूनों का स्थान धर्म के बाद आता है और अभिव्यक्ति की आजादी का नामलेवा कोई नहीं है।
 
यह ठीक है कि सेंसर बोर्ड की भावना समाज में किसी प्रकार के विवाद को बढ़ाना न देने की रही हो। किंतु इसके लिए स्वयं सेंसर बोर्ड के भीतर ही प्रावधान मौजूद है। और वह प्रावधान है फिल्म को विभिन्न कैटेगरियों में प्रमाणित करना। उदाहरण के लिए यदि बोर्ड के सदस्य फिल्म में किसी प्रकार हिंसा, अश्लीलता, द्विअर्थी शब्दों-गानों, भड़काऊ व उत्तेजक संवाद आदि नहीं पाते हैं तो ऐसी फिल्म को यू (U) अर्थात अनसेंसर्ड सर्टिफिकेट दे सकते हैं और ऐसी फिल्मों को कोई भी देख सकता है। यदि बोर्ड के सदस्यों को फिल्म में अत्यंत अल्प स्तर पर उपरोक्त वर्णित चीजें दिखतीं हैं तो उसे यूए (U/A) सर्टिफिकेट दिए जाने का प्रावधान है। ऐसी फिल्मों को बच्चे अपने अभिभावकों के सानिध्य में बैठकर देख सकते हैं। यदि फिल्म हिंसा, अश्लीलता, फूहड़ता, भड़काऊ व उत्तेजक दृश्यों व संवादों आदि से भूरपूर है तो ऐसी फिल्मों को ए (A) अर्थात एडल्ट सर्टिफिकेट दिए जाते हैं। ये फिल्में व्यस्कों के लिए होती हैं और इन्हें 18 वर्ष से कम आयु के लोगों को देखने की अनुमति नहीं होती है। ऐसी फिल्मों को राष्ट्रीय चैनलों पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं होती है। इसके अलावा सेंसर बोर्ड के पास सर्टिफिकेशन का एक और प्रावधान है; एस (S)। इस श्रेणी की फिल्में विशुद्ध तौर पर विशेष वर्ग/पेशे से संबंधित के लोगों के लिए ही होती हैं जैसे कि डॉक्टर, रिसर्चर्स इत्यादि। बोर्ड के अध्यक्ष व सदस्यों का चयन भी विभिन्न कार्यक्षेत्रों (कला, नृत्य, संगीत, थिएटर, फिल्म, साहित्य आदि) में महारथ रखने वालों में से ही किया जाता है। निसंदेह उन्हें ऐसे सभी कानूनों और प्रावधानों का ज्ञान होता है जो कि हमें संविधान द्वारा प्रदत है और जो समाज के दीर्घकालीन हित में होता है। यदि बोर्ड की स्थापना के उद्देश्य में धार्मिकता व सांप्रदायिकता को स्थान नहीं दिया गया है और बोर्ड के अध्यक्ष व सदस्यों के चयन में इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया जाता है तो इसका कारण हैं।  
 
आश्चर्य है कि ऐसे प्रावधानों (विशेषकर एस (S) जिसमें थोड़ा संशोधन आदि कर ऐसी फिल्मों को रिलीज किया जा सकता है जो किसी एक वर्ग विशेष से संबंधित हों) के होने बावजूद समय समय पर तुगलकी फरमान जारी किए जाते हैं। हालांकि आदर्श स्थिति तो वह होगी जिसमें सेंसर बोर्ड की भूमिका नगण्य हो। ऐसी स्थिति में फिल्मों को सिर्फ अनसेंसर्ड व एडल्ट के वर्ग में रखा जा सकता है। हमें समझना होगा कि हर किसी को अहिंसक (शारीरिक हिंसा) तरीके से अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति प्रकट करने का अधिकार है। किसी भी सूरत में इस अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए। समाज के किसी वर्ग को किसी अन्य वर्ग के प्रति राय प्रकट करने का अधिकार होना चाहिए। इसके साथ ही दूसरे वर्ग को अपने वर्ग के समर्थन व दूसरे वर्ग के विरोध का अधिकार भी होना चाहिए लेकिन अहिंसक तरीके से। इस अधिकार के सख्ती से अनुपालन किए जाने की आवश्यकता है ना कि बचाव की मुद्रा अपनाने की।
   
- अविनाश चंद्र