चार पड़ोसी देशों का सड़कों से जुड़ जाना

भूटान की राजधानी थिंपू में अपने तीन पड़ोसी देशों- बांग्लादेश, भूटान व नेपाल से भारत का मोटर वाहन सड़क-पारगमन समझौता एक नए दौर का आगाज है। शायद कुछ लोगों को ऐतराज हो, लेकिन  इसे ऐतिहासिक कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश यात्रा के दौरान इसका ऐलान करते हुए कहा था कि हमने सार्क में इसे करने की कोशिश की, उसमें सफल नहीं हुए, तो अलग से कर रहे हैं। बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया व नेपाल) नाम वाले इस समझौते का प्रस्ताव भारत की ओर से पिछले साल नवंबर में काठमांडू में आयोजित सार्क सम्मेलन में किया गया था। पाकिस्तान को छोड़कर बाकी देश तैयार थे। उसके न मानने की वजह से इस पर हस्ताक्षर न हो सका। सामान्यत: ऐसी स्थिति के बाद सार्क का कोई प्रस्ताव अलग से साकार होने का इतिहास नहीं रहा है। इस बार भारत ने इतिहास को बदलने की ठानी। अब यह समझौता सामने है।
 
इस समझौते से जहां इन देशों के बीच माल ढुलाई की लागत घटेगी, वहीं मल्टी मॉडल परिवहन और पारगमन सुविधाओं का भी विकास होगा। चारों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में भी इससे तेजी आएगी। इसका मूल उद्देश्य है इन देशों के निवासियों के बीच हर स्तर पर आपसी संपर्क का विस्तार। वह नागरिक संपर्कों का क्षेत्र हो, सांस्कृतिक आदान-प्रदान का, बौद्धिक विमर्श का, शादी-विवाह का या फिर छोटे से बड़े व्यापार सब इसमें समाहित है। हम अपने वाहन से एक दूसरे के यहां चले जाएं, यह कोई सामान्य बात नहीं है। इसमें क्षेत्र की शांति, स्थिरता और समृद्धि तथा इनके लिए क्षेत्रीय एकीकरण का लक्ष्य निहित है। यह समझौता इन लक्ष्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि इसके लिए आगे और भी कदम उठाने होंगे, पर लंबे समय से जिसकी प्रतीक्षा की जा रही थी, वह महत्वपूर्ण कदम उठा लिया गया।
 
समझौते पर हस्ताक्षर के बाद कहा गया है कि भारत, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के बीच सुरक्षित, किफायती, कुशल और पर्यावरण के अनुकूल सड़क परिवहन को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, मल्टी मॉडल परिवहन या पारगमन सुविधाओं का विकास सिर्फ कागज पर लिख देने से तो होगा नहीं। इसके अनुरूप संस्थागत व ढांचागत प्रणाली विकसित करनी होगी। इसमें समस्या आएगी, ऐसा मानने का कारण नहीं है। एक बार इसका संकल्प ले लिया गया, तो फिर प्रणाली कौन-सी बाधा होगी? वैसे भी इसमें मुख्य पहल भारत को करनी है। अन्य तीन देशों को सहयोग देने के लिए हमें आगे आना होगा। समझौते के बाद भारत की ओर से कहा गया कि वह पड़ोसी देशों के समक्ष पेश विभिन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए सजग है और जो कमियां आएंगी, उनको पूरा करने में भारत प्रयासरत रहेगा। फिलहाल जो संबंध इन देशों के बीच हैं, उनमें किसी बाधा का प्रश्न नहीं है। इसमें अगर म्यांमार व थाईलैंड भी शामिल हो जाएं, तो यह बदलाव बहुत बड़ा होगा।
 
- अवधेश कुमार (साभारः livehindustan.com)

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