खड़ी हो सौ दलित अरबपतियों की कतार

दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) की ओर से बीते 6 जून को एक नया वेंचर कैपिटल फंड शुरू किया गया। इस फंड का मकसद है दलितों और आदिवासियों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में निवेश के लिए निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाना। कृपया इस पहल को सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) के नाम पर उठाए गए एक और सदाशयी कदम की तरह न देखें।

फंड का इरादा निवेशकों को 25 प्रतिशत का सालाना टैक्स-पूर्व लाभ देने का है, जो सेंसेक्स के सबसे अच्छे शेयरों में पैसा लगाने वाले म्यूचुअल फंडों द्वारा दिए जाने वाले रिटर्न के समतुल्य है। क्या यह कोई खयाली पुलाव है? जी नहीं, जोखिम के बावजूद यह एक वास्तविक संभावना है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के नियमों के तहत चोटी के बिजनेस घरानों के लिए अपनी जरूरत का 4 फीसदी सामान दलित विक्रेताओं से सामान खरीदना जरूरी बना दिया गया है। इससे दलित कारोबार में जबर्दस्त तेजी आने की उम्मीद बनी है।

तीन हजार दलित करोड़पति

एक बार उनकी उड़ान शुरू हो गई तो उनमें से कुछ के बड़े बिजनेस में बदलने की संभावना बढ़ जाएगी, और फिर उन्हें किसी मदद की जरूरत नहीं रहेगी। जिस देश में दलितों-आदिवासियों को व्यवस्था के शिकार के रूप में देखते हुए उन्हें सरकारी इमदाद और आरक्षण देने की परंपरा रही हो, वहां यह बदलाव हैरत पैदा करने वाला है। लेकिन 1991 के बाद हुए आर्थिक सुधारों ने एक नया आकाश खोला है, जिसमें कुछ दलित उद्यमियों को भी पंख पसारने का मौका मिला है। डिक्की के अभी कुल 3000 करोड़पति सदस्य हैं। इनमें 1000 से ज्यादा का सालाना टर्नओवर 100 करोड़ रुपये से ऊपर का है। इनमें सबसे अमीर राजेश सरैया यूक्रेन से स्टीलमांट प्राइवेट लिमिटेड चलाते हैं, जिसका कारोबार आठ देशों में फैला हुआ है। उनका टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है और वे पहले दलित अरबपति हैं। लेकिन इस कामयाबी का रास्ता आसान नहीं था।

न्यूनतम निवेश सीमा एक करोड़

दलित उद्यमियों के लिए फंड जुटाना और सही सलाह पाना बहुत मुश्किल रहा है। डिक्की एसएमई फंड इसी काम को आसान बनाने के लिएधन जुटाना चाहता है, ताकि दलितों -आदिवासियों द्वारा चलाए जा रहे उद्यमों के लिए प्रतिभूति (इक्विटी), ऋण और तकनीकी सलाह की व्यवस्था की जा सके। इस पहल का उद्देश्य सहृदय लोगों द्वारा जरूरतमंदों के लिए चंदा वसूली नहीं है। इस फंड में निवेश की न्यूनतम सीमा एक करोड़ रुपये रखी गई है! अमीर लोगों को यह फंड बता रहा है कि दलितों-आदिवासियों की कंपनियों में अपना पैसा लगाकर वे और अमीर बन सकते हैं। यह नजरिया अमीरी के ऊपर से रिसकर नीचे जाने का नहीं बल्कि जातियों के बीच समानता कायम करने का है। इसमें दलित उद्यमियों को पिरामिड के शिखर पर ले जाने की बात है और इस दौरान अपने मुनाफे का साझा वे उन जातियों के निवेशकों के साथ भी करना चाहते हैं, जो ऐतिहासिक रूप से उन पर हावी रहती आई हैं।

डिक्की के चेयरमैन मिलिंद कांबले इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि दलित अब दया के नहीं, ईर्ष्या के पात्र बनना चाहते हैं। कांबले पूंजीवाद को एक क्रांतिकारी शक्ति मानते हैं, जिसने जाति व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया और दलितों को ऊपर आने का मौका दिया। एडम स्मिथ मनु के शत्रु हैं, लिहाजा वे दलितों के मित्र हैं। कांबले का कहना है कि व्यापार पर ऐतिहासिक रूप से पारंपरिक पेशे वाली उन्हीं जातियों का कब्जा रहा है, जिन्होंने किसी और को अपने साथ होड़ में नहीं उतरने दिया। नेहरू और इंदिरा गांधी के लाइसेंस-परमिट राज को समाजवादी माना जाता था, लेकिन उसने नीचे से उभरने वाली होड़ के बरक्स बड़े व्यापारिक घरानों को ही संरक्षण दिया, जो सारे लाइसेंस हड़प ले गए। होड़ के लिए गुंजाइश अंतत: 1991 के बाद आए आर्थिक सुधार और भूमंडलीकरण ने बनाई। कोई गर्ग या अग्रवाल अब सिर्फ किसी गर्ग या अग्रवाल से सप्लाई लेकर बाजार में नहीं टिक सकता था। सबसे सस्ते सप्लायर से माल उठाना उसके लिए जरूरी हो गया, भले ही उसकी जाति कुछ भी क्यों न हो।

इस प्रकार व्यापारिक जातियों का एकाधिकार तोड़ने का श्रेय उदारीकरण और भूमंडलीकरण को जाता है। जो चीजें अब तक सिर्फ कुछेक कंपनियों के दायरे में पैदा की जाती थीं, वे कहीं से भी मंगाई जाने लगीं। इससे नए उद्यमियों को उभरने का मौका मिला और डिक्की का गठन करने वाले 3000 दलित उद्यमियों ने भी इस मौके का भरपूर फायदा उठाया। जाति उत्पीड़न को मिटाने का समाजवादी नुस्खा दलितों को आरक्षण और सरकारी मदद देने का था। कांबले का कहना है कि इन उपायों ने दलितों को शिक्षा और हैसियत दिलाने में निश्चय ही एक भूमिका निभाई है, लेकिन इसका महत्व प्रस्थान बिंदु से ज्यादा नहीं है। उनका कहना है कि दलितों के लिए नौकरी मांगने का दौर अब पीछे छूट चुका है। प्रशासनिक सेवाओं और विविध पेशों में भी उनकी पर्याप्त उपस्थिति दिखने लगी है। अब उन्हें अपने झंडे व्यापार के क्षेत्र में गाड़ने चाहिए। दलित मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति रह चुके हैं। वे उद्योगों के सेनापति क्यों नहीं बन सकते?

अफर्मेटिव एक्शन से आगे

कांबले ने यह दृष्टि दो सोतों से अर्जित की है। एक, आंबेडकर और दो, अमेरिका के अश्वेत उद्यमी। जाति और पेशे की जंजीरें तोड़ने में पूंजीवाद की भूमिका को आंबेडकर पहले ही समझ गए थे, लेकिन यह काम उनके समय में नहीं, 1991 के बाद ही संभव हो सका। अमेरिका ने एक समय अपना सारा ध्यान अश्वेतों के लिए अफर्मेटिव एक्शन पर ही केंद्रित किया था, लेकिन बिल्कुल निचले दायरे के अश्वेतों में से हजारों करोड़पति और कुछ अरबपति पिछले बीस सालों में ही सामने आ सके हैं। संसार की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के सीईओ भी फिलहाल अश्वेत हैं- मसलन, सिटीबैंक (रिचर्ड पार्संस), अमेरिकन एक्सप्रेस (केनेथ चेनो), जीरॉक्स (उर्सुला र्बन्स) और मर्क (केनेथ फ्रेजियर)। ये व्यक्तित्व दलितों के लिए प्रेरणा सोत बन सकते हैं। डिक्की एसएमई फंड सौ दलित अरबपतियों की कतार खड़ी करे, यही कामना है।

 

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः नवभारत टाइम्स

फोटो- साभारः हरियाणाअबतक.कॉम