तर्क के आधार पर करें फैसला

भारत में कुछ ही पेशे ऐसे हैं, जिन्हें जनता की इतनी सद्‌भावना प्राप्त है, जितनी हमारी रक्षा सेनाओं को हैं। भारतीय सेना (इस लेख में सेना से आशय वायु व नौसेना सहित तीनों सेनाओं से है।) का उल्लेख कीजिए और ज्यादातर भारतीयों का सीना गर्व से फूल जाएगा। सेना पूरी दक्षता से काम करती है, शांत बनी रहती है, राजनीति से उसका कोई लेना-देना नहीं है और वह हमारे उन पड़ोसियों से सीमाओं की रक्षा करने का महान दायित्व निभाती हैं, जो उतने मैत्रीपूर्ण नहीं हैं। दंगों या बाढ़ जैसे घरेलू उपद्रवों व आपदा में भी सेना को बुला लिया जाता है और स्थिति में सुधार होने लगता है। युद्ध अथवा आतंकी हमलों के दौरान हमारे सैनिक कर्तव्य पालन में अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं या गंभीर जख्म झेलते हैं। इन सारे नि:स्वार्थ त्याग और बलिदानों के कारण यह देखना मुश्किल नहीं है कि हमारी सेना को जनता का इतना समर्थन हासिल है, जिसकी वह वाकई हकदार है। हमारी स्थानीय संस्कृति, लोकप्रिय फिल्मों व गीतों में सेना को (पुलिस व नेताओं के विपरीत) सकारात्मक रूप में दिखाया जाता है। हमारे पत्रकार जब सेना का कवरेज करते हैं तो वे उनके त्याग व कड़ी मेहनत पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं।
 
जहां यह सकारात्मक छवि बहुत अच्छी बात है, वहीं इसके कारण कुछ विशेष परिस्थितियों में हम अपने रक्षा संसाधनों का प्रबंधन कैसे करते हैं, इसका वस्तुनिष्ठ विश्लेषण नहीं हो पाता है। ऐसा ही एक मुद्‌दा है ‘समान रैंक, समान पेंशन’ (ओआरअोपी) का। हालांकि, इसे सुनकर थोड़ी गलतफहमी होती है। वास्तव में इसका अर्थ है नवीनतम रैंक और इस रैंक के लिए अधिकतम पेंशन, फिर आप चाहे किसी भी वर्ष में रिटायर क्यों न हुए हों। पूर्व सैनिक, सारे सेवानिवृत्त सैनिकों अथवा उनके पीछे जीवित परिजनों के लिए पेंशन पुनरीक्षण व्यवस्था चाहते हैं। अनुमान है कि ये सारे लोग मिलकर 32 लाख होते हैं। उनकी यह मांग जायज होने के कई कारण हैं। 1990 में रिटायर होने वाले अफसर और उसी रैंक पर 2015 में रिटायर होने वाले अफसर की पेंशन में विसंगति नाटकीय हो सकती है।
 
इसमें किसी प्रकार की संगति आवश्यक है खासतौर पर तब जब सेना मूलभूत रूप से रैंक की अवधारणा में विश्वास करती है और सेवानिवृत्ति के बाद भी इसे रखने का अधिकार देती है। ज्यादातर राजनीतिक दलों ने चुनावी वादों में ओआरओपी को शामिल किया था। इस तरह से सरकार को कभी न कभी तो इसे पूरा करना ही था। सोशल मीडिया सहित सारा मीडिया पूर्व सैनिकों के साथ है। दलीलें यहां तक थीं कि ‘वे हमारी सीमा की रक्षा करते हैं, इसलिए वे जो चाहते हैं, हमें देना चाहिए।’ यह भी दलील थी कि ‘हम अपने सैनिकों का अपमान कैसे कर सकते हैं।’
 
इस सब में कहीं न कहीं मामले को बहुत सरल बना दिया गया है। सेना अच्छी है और पूर्व सैनिक हमेशा सही हैं। राजनीतिक वर्ग और सरकार सब कंजूस, लालची और संवेदनहीन हैं। जो भी हो, हमारी सीमाअों की रक्षा करने वालों के साथ तो अच्छा व्यवहार होना चाहिए। ओआरओपी ऐसा देखा जा रहा है जैसे इसका अर्थ ही है सैनिकों के साथ अच्छा व्यवहार, 
 
इसलिए बेहतर है कि इसे दे दिया जाए, अभी!
 
जो लोग इस मांग का वस्तुनिष्ठ व निष्पक्ष विश्लेषण करना चाहते थे उन्हें एक कोने में दुबक जाना पड़ा, क्योंकि कोई भी ओआरओपी के खिलाफ एक शब्द भी सुनना नहीं चाहता। सेना के पूर्व वरिष्ठ अफसर जब राजधानी में आंदोलनरत थे तो सरकार भी एक कोने में धकेल दी गई। ओआरओपी की घोषणा कर दी गई। सरकार ने अनुमान लगाया है कि सिर्फ इस एक सिफारिश को लागू करने के लिए हर साल करीब 12,000 करोड़ रुपए लगेंगे, लेकिन पूर्व सैनिक खुश नहीं हैं। चूंकि उन्हें लग रहा है कि उनकी मांगें नहीं मानी गई हैं, विरोध प्रदर्शन जारी है। हमें क्या करना चाहिए? क्या हमें अब भी ‘सेना अच्छी, नेता बुरे’ की दलील ही देनी चाहिए? क्या हमें अब भी कहना चाहिए कि चूंकि वे हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं, वे जो चाहते हैं उन्हें दे दिया जाना चाहिए ( वैसे सीमा सुरक्षा बल या बीएसएफ को ओआरओपी नहीं मिला है) या हमें ओआरओपी के विभिन्न पहलुओं पर कम से कम गौर तो करना ही चाहिए और इसके नकारात्मक व सकारात्मक पक्ष देखने चाहिए। यह जरूरी है, क्योंकि भारत जैसे सीमित संसाधनों वाले देश में ओआरअोपी जैसे बड़े खर्च का सावधानी से परीक्षण होना चाहिए और खर्च को सीमा में रखा जाना चाहिए। वर्तमान में हमारा रक्षा बजट 2,50,000 करोड़ रुपए हैं। इसके अलावा हम हर साल 60,000 करोड़ रुपए की रक्षा पेंशन देते हैं। ओआरओपी देने से इसमें सालाना 12,000 करोड़ रुपए का खर्च और जुड़ जाएगा। ध्यान दें कि परिभाषा के मुताबिक यह पेंशन उन सेवाओं के लिए हैं, जो पहले ही दी जा चुकी है। इस पैसे के बदले में कोई उत्पादक कार्य नहीं होगा।
 
जहां हम सब इस बात पर सहमत हैं कि सेना के लोगों के साथ बेहतर व्यवहार होना चाहिए पर बेहतर क्या है? बुजुर्गों को ज्यादा भुगतान या सेना में आने वाले युवाओं को अधिक भुगतान? अफसरों को ज्यादा दें या जवानों को? बेहतर प्रतिभाएं आकर्षित करने पर खर्च होना चाहिए या ज्यादा रोजगार पैदा करने के लिए खर्च करना चाहिए? क्या बुजुर्गों को ज्यादा भुगतान देना चाहिए या उनके लिए अधिक अस्पताल बनाए जाने चाहिए? क्या युद्ध से प्रभावित परिवारों को उन लोगों से अलग भुगतान होना चाहिए जो रणभूमि से बिल्कुल ठीक-ठाक लौट आते हैं? क्या पेंशन के बढ़ते खर्च के समाधान के रूप में पूर्व सैनिकों की सेवाएं कुछ ऐसे क्षेत्रों में ली जा सकती हैं, जो अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी हो? फिर सेनाओं के लिए ओआरओपी है तो अर्द्धसैनिक बलों व पुलिस को क्यों नहीं? क्या हम इन सबको अतिरिक्त राशि देना हमारे लिए संभव है?
 
ये सारे मुद्‌दे, ओआरओपी को जितना नज़र आता है, उससे ज्यादा जटिल बना देते हैं। ऐसे में वक्त आ गया है कि हम- सेना-अद्‌भुत-है-इसलिए-उसे-सबकुछ-दे-डालो- की भावुक बहस की बजाय तर्कसंगत, वस्तुनिष्ठ बहस करें। ओआरअोपी तो छोड़ो, कई क्षेत्रों को तो पेंशन भी नहीं है। यह सही है कि रैंक और वेतन में समानता का कोई स्वरूप तो होना चाहिए ताकि विसंगतियां बहुत अधिक न हो जाएं। हालांकि, ऐसा इन सारे संदर्भों को ध्यान में रखकर करना चाहिए कि क्या मुमकिन है, क्या हम वहन कर सकते हैं, इस पैसे से क्या वैकल्पिक कल्याणकारी मदद दी जा सकती है और इससे अन्य क्षेत्रों के लिए क्या मिसाल कायम होगी। तब जाकर हम ओआरओपी को लेकर सही निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी सेना को दिल की गहराई से प्यार करें, लेकिन इसके साथ इससे जुड़े मुद्‌दों पर दिमाग से विचार करें।
 
 
- चेतन भगत
अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार
साभारः दैनिक भास्कर